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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 35 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 35/ मन्त्र 7
    ऋषिः - प्रजापतिः देवता - अतिमृत्युः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - मृत्युसंतरण सूक्त
    64

    अव॑ बाधे द्वि॒षन्तं॑ देवपी॒युं स॒पत्ना॒ ये मेऽप॑ ते भवन्तु। ब्र॑ह्मौद॒नं वि॑श्व॒जितं॑ पचामि शृ॒ण्वन्तु॑ मे श्र॒द्दधा॑नस्य दे॒वाः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अव॑ । बा॒धे॒ । द्वि॒षन्त॑म् । दे॒व॒ऽपी॒युम् । स॒ऽपत्ना॑: । ये । मे॒ । अप॑ । ते । भ॒व॒न्तु॒ । ब्र॒ह्म॒ऽओ॒द॒नम् । वि॒श्व॒ऽजित॑म् । प॒चा॒मि॒ । शृ॒ण्वन्तु॑ । मे॒ । श्र॒त्ऽदधा॑नस्य । दे॒वा: ॥३५.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अव बाधे द्विषन्तं देवपीयुं सपत्ना ये मेऽप ते भवन्तु। ब्रह्मौदनं विश्वजितं पचामि शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अव । बाधे । द्विषन्तम् । देवऽपीयुम् । सऽपत्ना: । ये । मे । अप । ते । भवन्तु । ब्रह्मऽओदनम् । विश्वऽजितम् । पचामि । शृण्वन्तु । मे । श्रत्ऽदधानस्य । देवा: ॥३५.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 35; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (द्विषन्तम्) द्वेष करनेवाले (देवपीयुम्) देवताओं के हिंसक को (अव बाधे) मैं हटाता हूँ। (ये) जो (मे) मेरे (सपत्नाः) प्रतियोगी हैं, (ते) वे (अप भवन्तु) हट जावें। (विश्वजितम्) संसार के जीतनेवाले (ब्रह्मौदनम्) सबसे बड़े सींचनेवाले वा अन्नरूप परमात्मा को (पचामि) पक्का [हृदय में दृढ़] करता हूँ। (देवाः) व्यवहारकुशल विद्वान् लोग (श्रद्दधानस्य) श्रद्धा रखनेवाले (मे) मेरी [वार्ता] (शृण्वन्तु) सुनें ॥७॥

    भावार्थ

    मनुष्य जगदीश्वर में पूरी भक्ति करके पुरुषार्थपूर्वक अपने सब विघ्नों को हटा कर आनन्द भोगें ॥७॥ इति सप्तमोऽनुवाकः ॥

    टिप्पणी

    ७−(अव बाधे) अपवारयामि (द्विषन्तम्) हिंसन्तम् (देवपीयुम्) पीयतिर्हिंसाकर्मा-निरु० ४।२५। खरुशङ्कुपीयु०। उ० १।३६। इति पीयतेः-कु। देवानां हिंसकम् (सपत्नाः) अ० १।९।२। शत्रवः (ये) (मे) मम (अपभवन्तु) दूरे गच्छन्तु (ते) शत्रवः (ब्रह्मौदनम्) ओदन इति व्याख्यातम्-सू० ३४ म० १। प्रवृद्धं सेचकं प्रवर्धकम् अन्नरूपं वा परमात्मानम् (विश्वजितम्) सर्वस्य जेतारम् (पचामि) परिपक्वं दृढं करोमि (शृण्वन्तु) आकर्णयन्तु (मे) मम वाक्यम् (श्रद्दधानस्य) श्रद्धाधारकस्य (देवाः) व्यवहारिणो विद्वांसः ॥

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    विषय

    विश्वजित् ब्रह्मौदन का पाक

    पदार्थ

    १. मैं ज्ञान के द्वारा (द्विषन्तम्) = द्वेष करनेवाले शत्रु को (अवबाधे) = अपने से दूर रखता हूँ द्वेष की भावना को अपने समीप नहीं आने देता, (देवपीयुम्) = देवों की हिंसक-दिव्य गुणों को नष्ट करनेवाली बृत्ति को दूर रखता हूँ। (ये) = जो (मे) = मेरे (सपत्ना:) = रोगरूप शत्रु हैं, (ते अपभवन्तु) = वे सब दूर हों। २. मैं (विश्वजितम्) = सम्पूर्ण संसार का विजय करनेवाले-काम आदि सब शत्रुओं को पराजित करनेवाले (ब्रह्मौदनम्) = ज्ञान के भोजन को (पचामि) = पकाता हूँ-अपने में ज्ञानवृद्धि के लिए यत्नशील होता हूँ। (श्रत्-दधानस्य) = श्रद्धा से युक्त मे मेरी प्रार्थना को (देवा:) = ज्ञानी पुरुष शृण्वन्तु-सुनें, सब देव मुझे ज्ञान भोजन देने का अनुग्रह करें। इनकी कृपा से ही मुझे ज्ञान प्राप्त होगा|

    भावार्थ

    ज्ञान से द्वेष व अन्य काम-क्रोधादि शत्रु नष्ट हो जाते हैं। यह ज्ञानभोजन सबका विजय करता है। श्रद्धायुक्त होकर मैं देवों से ज्ञान प्राप्त करता हूँ।

    विशेष

    ज्ञान के द्वारा शत्रुओं को नष्ट करनेवाला यह 'चातन' बनता है [one who destroys]। यही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (देवपीयुम्) दिव्य भावनाओं के हिंसक, (द्विषन्तम्) द्वेषी असुर का (अव बाधे) मैं ध्यानी हनन करता हूँ, (मे) मुझ ध्यानी के (सपत्नाः) शत्रु जो असुर हैं (ते) वे (अप भवन्तु) अपगत हो जाएँ; (विश्वजितम्) विश्वविजयी (ब्रह्मौदनम्) ब्रह्मरूपी ओदन का (पचामि) मैं परिपाक करता हूँ, (देवाः) देव अर्थात् श्रेष्ठ लोग (श्रद्दधानस्य) श्रद्धा सम्पन्न (मे) मेरे [वचन] (शृण्वन्तु) सुनें।

    टिप्पणी

    [देवासुर-संग्राम का वर्णन है। श्रद्धा है सत्य का धारण करना। श्रत् सत्यनाम (निघं० ३।१०)+धा (धारणे)।]

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    विषय

    प्रजापति की उपासना से मृत्यु को तरना।

    भावार्थ

    मैं (देव-पीयुं) दिव्य गुणों और भावों के विनाशक, एवं मेरे इन्द्रिय सामर्थ्यों के प्रतिघातक, (द्विषन्तं) मुझ से अप्रीति करने वाले एवं मैरे अप्रीति के पात्र, विरोधी दुर्भावों और दुष्ट पदार्थों को मैं (अव बाधे) अपने अधीन करके उनकी शक्ति को रोक दूं। और (ये मे स-पत्नाः) जो मेरे सपत्न अर्थात् काम क्रोध आदि शत्रु हैं ऐसे (ते) वे आक्रमक शत्रु (अप भवन्तु) मुझ से दूर रहें। मैं (विश्वजितं) समस्त विश्व को विजय करने में समर्थ (ब्रह्म-ओदनं) ब्रह्मरूप शक्ति को (पचामि) परिपक्व करता हूं। उसका अभ्यास करता हूं। उसको अपने हृदय में दृढ़ता से जमाता हूं। (देवाः) समस्त विद्वान् लोग (श्रत्-दधानस्य) सत्य को धारण करने हारे (मे) मेरे इस संकल्प का (शृण्वन्तु) श्रवण करें और मुझे इस कार्य में साहाय्य दें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    प्रजापतिर्ऋषिः। मृत्योरेतिक्रमण देवताः। ३ भुरिक्। ४ जगती, १, २, ५-७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Conquest of Death

    Meaning

    I stop and ward off those hostilities which forestall or distract my thoughts of divinity. Let all adversaries, all negativities get off my mind. I have developed and perfected the all-world-victorious food of divinity for my soul. Listen ye all, divine, brilliant sages, this voice of the faithful me.

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    Translation

    I hereby beat off the malicious dispiser of the enlightened ones. Whoever are my adversaries, may they be away form me. Here I cook the brahman rice- mess of knowledge, conqueror of all - may all the enlightened ones listen to me, full of faith and trust.

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    Translation

    I drive away the hostile persons who are despisers of Good Knowledge, good qualities and good acts and those who are our adversaries be far off. I prepared the Brahmaudama which conquers all things. May the learned persons hear me who believe and trust this.

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    Translation

    I drive away passions inimical to finer sentiments, and baser intentions. Far off be lust and anger, which are my foes. I firmly fix in my heart the might of God, which is the winner of all things. May all the learned persons listen to the resolve, I, a believer in Truth, make.

    Footnote

    Griffith translates Brahmandana as the Odana or mess of rice and milk distributed to Brahmans and especially to priests at a sacrifice. This interpretation is unacceptable. The word means, the might of God.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(अव बाधे) अपवारयामि (द्विषन्तम्) हिंसन्तम् (देवपीयुम्) पीयतिर्हिंसाकर्मा-निरु० ४।२५। खरुशङ्कुपीयु०। उ० १।३६। इति पीयतेः-कु। देवानां हिंसकम् (सपत्नाः) अ० १।९।२। शत्रवः (ये) (मे) मम (अपभवन्तु) दूरे गच्छन्तु (ते) शत्रवः (ब्रह्मौदनम्) ओदन इति व्याख्यातम्-सू० ३४ म० १। प्रवृद्धं सेचकं प्रवर्धकम् अन्नरूपं वा परमात्मानम् (विश्वजितम्) सर्वस्य जेतारम् (पचामि) परिपक्वं दृढं करोमि (शृण्वन्तु) आकर्णयन्तु (मे) मम वाक्यम् (श्रद्दधानस्य) श्रद्धाधारकस्य (देवाः) व्यवहारिणो विद्वांसः ॥

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