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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 13 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 11
    ऋषिः - गरुत्मान् देवता - तक्षकः छन्दः - निचृद्गायत्री सूक्तम् - सर्पविषनाशन सूक्त
    65

    त॒स्तुवं॒ न त॒स्तुवं॒ न घेत्त्वम॑सि त॒स्तुव॑म्। त॒स्तुवे॑नार॒सं वि॒षम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त॒स्तुव॑म् । न । त॒स्तुव॑म् । न । घ॒ । इत् । त्वम् । अ॒सि॒ । त॒स्तुव॑म् । त॒स्तुवे॑न । अ॒र॒सम् । वि॒षम् ॥१३.११॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्तुवं न तस्तुवं न घेत्त्वमसि तस्तुवम्। तस्तुवेनारसं विषम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्तुवम् । न । तस्तुवम् । न । घ । इत् । त्वम् । असि । तस्तुवम् । तस्तुवेन । अरसम् । विषम् ॥१३.११॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 13; मन्त्र » 11
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    दोषनिवारण के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (तस्तुवं न) निन्दानाशक वस्तु के समान (तस्तुवम्) निन्दाप्रापक (न) नहीं है, (त्वम्) तू (घ इत्) अवश्य ही (तस्तुवम्) निन्दाप्रापक वस्तु (असि) है। (तस्तुवेन) निन्दानाशक कर्म से (विषम्) तेरा विष (अरसम्) शक्तिहीन होवे ॥११॥

    भावार्थ

    मनुष्य प्रशंसनीय कर्म करके दुष्ट कर्मों को छोड़ें ॥११॥

    टिप्पणी

    ११−(तस्तुवम्) सितनिगमि०। उ० १।९९। इति तसु उपक्षये−तुन्। उपक्षयो निन्दा। वा गन्धने−क। निन्दानाशकं वस्तु (न) इव (तस्तुवम्) तस्तु+वा गतौ−क। निन्दाप्रापकं वस्तु (न) निषेधे (घ इत्) अवश्यमेव (त्वम् असि) (अरसम्) (विषम्) (तस्तुवम्) निन्दाप्रापकं वस्तु (तस्तुवेन) निन्दानाशकेन कर्मणा ॥

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    विषय

    ताबुब-तस्तुव

    पदार्थ

    १. ताबुव शब्द [तु+इण, वा +क] तु तथा वा धातु से बना है। तु के अर्थ वृद्धि, गति व हिंसा है। 'वा' के गति तथा गन्धन [हिंसन]। इसप्रकार ताबुव का अर्थ है वृद्धि तथा हिंसा को प्राप्त करानेवाली। ताबुव एक ओषधि है। सर्प भी ताबुव है। वृद्धि को प्रास कराने से ओषधि 'ताबुव' है, हिंसा को प्राप्त कराने से सर्प ताबुव' है। (ताबुवम्) = यह ताबुव ओषधि (न ताबुवम्) = हिंसा को प्राप्त करानेवाली नहीं। हे सर्प! इस ओषधि के प्रयोग से (त्वम् घ इत्) = तू भी निश्चय से (न ताबुवम् असि) = हिंसा को प्राप्त करानेवाला नहीं रहता। (ताबुवेन) = इस ताबुव ओषधि से (विषम् अरसम्) = विष नि:सार हो जाता है। २. तस्तुव शब्द भी 'तस उपक्षये' तथा 'वा गतिगन्धनयोः' से बनता है। तस्तुव ओषधि उपक्षय का नाश करती है। सर्प भी तस्तुव है-यह उपक्षय को प्राप्त कराता है। (तस्तुवम्) = उपक्षय का विनाश करनेवाली यह तस्तुव ओषधि न तस्तुवम्-विनाश को पास करानेवाली नहीं। ३. हे सर्प ! इस (तस्तुवे) = तस्तुव औषधि का प्रयोग होने पर (घ इत्) = निश्चय से (त्वम्) = तू (तस्तुवं न असि) = उपक्षय को प्राप्त करानेवाला नहीं है। (तस्तुवेन) = इस तस्तुव ओषधि के प्रयोग से (विषम् अरसम्) = सर्प विष नि:सार हो जाता है।

    भावार्थ

    ताबुब व तस्तुव ओषधि के प्रयोग से सर्प-विष नि:सार हो जाता है।

    विशेष

    अपने को सर्प-विष आदि के भय से सुरक्षित करके अपने जीवन को शक्तिशाली बनानेवाला शुक्र अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    [हे विष ] (तस्तुवम्) तू स्तुतियोग्य अर्थात् प्रशंसनीय है [क्या ? ] (न तस्तुवम्) नहीं है तु स्तुतियोग्य अर्थात् प्रशंसनीय; ( घ इत्) निश्चय से ही (त्वम् ) तु (न असि) नहीं है (तस्तुवम् ) स्तुतियोग्य अर्थात् प्रशंसनीय (तस्तुवेन) स्तुतियोग्य अर्थात् प्रशंसनीयरूप द्वारा (अरसम्) नीरस हुआ है (विषम्) विष ।

    टिप्पणी

    [ अभिप्राय यह कि सर्प का विष प्रशंसनीय नहीं है । यह घातक है । परन्तु सर्प-विष के, प्रशंसनीयरूप द्वारा, रोगजनित विष को नीरस किया जा सकता है। होमियोपैथिक चिकित्सा द्वारा, सर्प के विष को सूक्ष्म रूप में 'सशक्त' करके, नाना रोगों द्वारा जन्य विषों का विनाश हो सकता है । एतदर्थ देखो लेकेसिस [Lachesis] तथा क्रोटेलस होराइड्स [Crotalus Horridus] आदि सर्पविषों के प्रयोग। (मैटिरया मैडिका, द्वारा विलियम वोरिक, एम० डी०) । तस्तूवम्= ष्टुञ स्तुतौ (अदादिः), यङ्लुक रूप। 'सशक्त' पद में शक्ति का अभिप्राय है, होम्योपैथिक "पोटैसी"]

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    विषय

    सर्प विष चिकित्सा।

    भावार्थ

    (तस्तुवं न तस्तुवं) तस्तुव = हिंसक औषध के समान ‘तस्तुव’ नामक सर्प भी अपनी जाति का एक ही है। (न घ इत् त्वम् तस्तुवम् असि) ‘तस्तुव’ भी तू अब नहीं, क्योंकि (तस्तुवेन विषम् अरसम्) तस्तुव नामक औषध से इसका विष भी निर्बल पड़ जाता है। इन विषधरों की चिकित्सा भी इनके विषों से ही होती है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गरुत्मान् ऋषिः। तक्षको देवता। १-३, जगत्यौ। २ आस्तारपंक्तिः। ४, ७, ८ अनुष्टुभः। ५ त्रिष्टुप्। ६ पथ्यापंक्तिः। ९ भुरिक्। १०, ११ निचृद् गायत्र्यौ एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Snake Poison

    Meaning

    Tastuva snake is like Tastuva, antidote of poison. But, O Tastuva, you are surely not the destroyer. You are the antidote that renders snake poison ineffective. Note: This hymn should be read with Rgveda 1, 191, where various kinds of snakes and many other poisonous creatures are mentioned along with many herbs and bird antidotes. Here also some antidotes are mentioned specially in mantras 10 and 11. There are many stories, reports and direct experiences of miraculous cures of poison in India. Snake poison is cured with snake poison itself. ‘Poison kills poison.’

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    Translation

    Tastuva is not (real) tastuva. And you tastuva are certainly not the genuine one. By tastuva the poison becomes powerless.

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    Translation

    The thing which is trouble-inflicting is not the thing which removes trouble. the snake or its poison is certainly not a thing which removes troubles. Tastuva is the medicine with which poison is made ineffectual.

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    Translation

    A censurable object is not like an object free from censure. Thou, O Serpent art verily a censurable object. May thy poison be removed through the medicine Tastuva.

    Footnote

    Tabuva and Tastuva (Mantra 10 and 11) are supposed antidotes that render snakes poison ineffectual. Snake-charmers at the present day exhibit stones which they say havethe power of drawing the poison out of a wound inflicted by a snake. The exact significance of the antidotes Tabuva and Trastuva is not known.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ११−(तस्तुवम्) सितनिगमि०। उ० १।९९। इति तसु उपक्षये−तुन्। उपक्षयो निन्दा। वा गन्धने−क। निन्दानाशकं वस्तु (न) इव (तस्तुवम्) तस्तु+वा गतौ−क। निन्दाप्रापकं वस्तु (न) निषेधे (घ इत्) अवश्यमेव (त्वम् असि) (अरसम्) (विषम्) (तस्तुवम्) निन्दाप्रापकं वस्तु (तस्तुवेन) निन्दानाशकेन कर्मणा ॥

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