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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 13 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 9
    ऋषिः - गरुत्मान् देवता - तक्षकः छन्दः - भुरिग्जगती सूक्तम् - सर्पविषनाशन सूक्त
    48

    क॒र्णा श्वा॒वित्तद॑ब्रवीद्गि॒रेर॑वचरन्ति॒का। याः काश्चे॒माः ख॑नि॒त्रिमा॒स्तासा॑मर॒सत॑मं वि॒षम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क॒र्णा । श्वा॒वित् । तत् । अ॒ब्र॒वी॒त् । गि॒रे: । अ॒व॒ऽच॒र॒न्ति॒का । या: । का: । च॒ । इ॒मा: । ख॒नि॒त्रिमा॑: । तासा॑म् । अ॒र॒सऽत॑मम् । वि॒षम् ॥१३.९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कर्णा श्वावित्तदब्रवीद्गिरेरवचरन्तिका। याः काश्चेमाः खनित्रिमास्तासामरसतमं विषम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कर्णा । श्वावित् । तत् । अब्रवीत् । गिरे: । अवऽचरन्तिका । या: । का: । च । इमा: । खनित्रिमा: । तासाम् । अरसऽतमम् । विषम् ॥१३.९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 13; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    दोषनिवारण के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (गिरेः) पहाड़ के (अवचरन्तिका) नीचे घूमनेवाली (कर्णा) कानवाली (श्वावित्) साही (तत्) यह (अब्रवीत्) बोली, (याः काः) जो कोई (च) (इमाः) यह सब (खनित्रिमाः) खनती में रहनेवाली [साँपिनी] हैं, (तासाम्) उनका (विषम्) विष (अरसतमम्) अत्यन्त निर्बल होवे ॥९॥

    भावार्थ

    मनुष्य अपने हृदय की कुवासनाओं को नष्ट करे, जैसे बनैले जन्तुओं के विष को ॥९॥

    टिप्पणी

    ९−(कर्णा) कर्ण−पचाद्यच्। कर्णयुक्ता (श्वावित्) शुना आविध्यते श्वन्+आ−व्यध ताडने−क्विप्। शल्यकी (तत्) (अब्रवीत्) अकथयत् (गिरेः) शैलस्य (अवचरन्तिका) चर−शतृ, ङीप्, स्वार्थे कन्, टाप्। अधोभागे चरणशीला (याः) (काः) (च) पादपूरणे (इमाः) (खनित्रिमाः) राशदिभ्यां त्रिप्। उ० ४।६७। इति खनु विदारणे−त्रिप्, इडागमः। खनित्रिं मायते। माङ् माने−क। खनित्रौ गर्ते मानशीला निवासशीलाः। सर्पिण्यः (तासाम्) सर्पिणीनाम् (अरसतमम्) अतिशयेन निर्बलम् (विषम्) सरलम् ॥

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    विषय

    कर्णा श्वावित्

    पदार्थ

    १. (कर्णा श्वावित्) = बड़े-बड़े कानोंवाली साही (गिरेः अवचरन्तिका) = पर्वत से नीचे उतरती हुई (तत् अब्रवीत्) = मानो यह कहती है कि (या: का: च इमाः खनित्रिमा:) = जो कोई ये भूमि खोदकर, बिल बनाकर रहनेवाले (कृमि) = कीट हैं (तासाम्) = उनका (विषम्) = विष (अरसतमम्) = अतिशयेन नि:सार है।

    भावार्थ

    सम्भवतः बिल बनाकर रहनेवाले इन कृमियों का विष उसी बिल से निकली मिट्टी के प्रयोग से दूर हो जाते हैं।

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    भाषार्थ

    (कर्णा) कानोंवाली (श्वावित्) सेही (गिरः) पर्वत से (अवचरन्तिका) नीचे विचरती हुई (तद् अब्रवीत्) वह बोली कि (याः का: च) जो कोई (इमाः) ये (खनित्रिमा:) खनियों में रहनेवाली सर्पिणियाँ है, (तासाम् ) उनका (विषम्) विष (अरसतमम् ) अत्यन्त नीरस होता है।

    टिप्पणी

    [श्वावित्=श्वाविध् ? कुत्ते को बींधनेवाली। सेही के शरीर पर काँटे होते हैं । कुत्ता यदि सेही पर आक्रमण करता है तो सेही काँटों द्वारा उसे बींध देती है। मन्त्र का अभिप्राय अनुसंधेय है।]

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    विषय

    सर्प विष चिकित्सा।

    भावार्थ

    (कर्णा श्वावित्) इसी प्रकार कानों वाली साही (गिरेः) पर्वत से (अव चरन्तिका) नीचे उतरती हुई (तत् अब्रवीत्) यह बात जतलाती है कि (याः काः च इमाः) ये जो कोई जन्तु (खनित्रिमाः) भूमि खोदकर बिल बना कर रहते हैं (तासाम्) उनका भी विष (अरसतमं) सर्वथा नीरस, निर्बल, विष-रहित होता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गरुत्मान् ऋषिः। तक्षको देवता। १-३, जगत्यौ। २ आस्तारपंक्तिः। ४, ७, ८ अनुष्टुभः। ५ त्रिष्टुप्। ६ पथ्यापंक्तिः। ९ भुरिक्। १०, ११ निचृद् गायत्र्यौ एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Snake Poison

    Meaning

    The porcupine with ears found in the valley said thus: Let the poison of these creatures which live in burrows be the most ineffective.

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    Translation

    Thus said the quick-eared hedgehog, moving about the foothills; whosoever female reptiles live digging down the earth, their poison is most powerless (ineffective).

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    Translation

    The quick-earned porcupine which lives in the low places of mountain reveals this fact that most powerless is the poison of those living-creatures which make their home in the holes underground.

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    Translation

    Dwelling beside the mountain's slope, the quick-cared porcupine exclaimed: Of all these she-snakes homed in earth the poison is most powerless.

    Footnote

    The quills of the porcupine protect her from the attacks of snakes.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९−(कर्णा) कर्ण−पचाद्यच्। कर्णयुक्ता (श्वावित्) शुना आविध्यते श्वन्+आ−व्यध ताडने−क्विप्। शल्यकी (तत्) (अब्रवीत्) अकथयत् (गिरेः) शैलस्य (अवचरन्तिका) चर−शतृ, ङीप्, स्वार्थे कन्, टाप्। अधोभागे चरणशीला (याः) (काः) (च) पादपूरणे (इमाः) (खनित्रिमाः) राशदिभ्यां त्रिप्। उ० ४।६७। इति खनु विदारणे−त्रिप्, इडागमः। खनित्रिं मायते। माङ् माने−क। खनित्रौ गर्ते मानशीला निवासशीलाः। सर्पिण्यः (तासाम्) सर्पिणीनाम् (अरसतमम्) अतिशयेन निर्बलम् (विषम्) सरलम् ॥

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