अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 7
ऋषिः - गरुत्मान्
देवता - तक्षकः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सर्पविषनाशन सूक्त
56
आलि॑गी च॒ विलि॑गी च पि॒ता च॑ म॒ता च॑। वि॒द्म वः॑ स॒र्वतो॒ बन्ध्वर॑साः॒ किं क॑रिष्यथ ॥
स्वर सहित पद पाठआऽलि॑गी । च॒ । विऽलि॑गी । च॒ । पि॒ता । च॒ । मा॒ता । च॒ । वि॒द्म । व॒: । स॒र्वत॑: । बन्धु॑। अर॑सा: । किम् । क॒रि॒ष्य॒थ॒ ॥१३.७॥
स्वर रहित मन्त्र
आलिगी च विलिगी च पिता च मता च। विद्म वः सर्वतो बन्ध्वरसाः किं करिष्यथ ॥
स्वर रहित पद पाठआऽलिगी । च । विऽलिगी । च । पिता । च । माता । च । विद्म । व: । सर्वत: । बन्धु। अरसा: । किम् । करिष्यथ ॥१३.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
दोषनिवारण के लिये उपदेश।
पदार्थ
(च) और (आलिगी) चारों ओर घूमनेवाली (च) और (विलिगी) टेढ़ी-टेढ़ी चलनेवाली [साँपिनी] (च) और (पिता) उसका पिता [साँप] (च) और (माता) उसकी माता [साँपिनी] तुम सब, (वः) तुम्हारे (बन्धु) बन्धुपन को (सर्वतः) सब प्रकार से (विद्म) हम जानते हैं। (अरसाः) निर्वीर्य तुम (किम्) क्या (करिष्यथ) करोगे ॥७॥
भावार्थ
मनुष्य कुवासनाओं का और उनके कारणों का इस प्रकार नाश करें, जैसे साँप और उनके माता पिता आदि का नाश करते हैं ॥७॥
टिप्पणी
७−(आलिगी) लिगि गतौ−पचाद्यच्, गौरादित्वात् नलोपः, ङीष्, समन्ताद् गमनशीला (च) (विलिगी) पूर्ववत्सिद्धिः। विरुद्धगतिशीला (च) (पिता) जनकः सर्पः (माता) जननी सर्पिणी (च) (विद्म) जानीमः (वः) युष्माकम् (सर्वतः) सर्वप्रकारेण (बन्धु) बन्धुत्वम् (अरसाः) निर्वीर्याः (किम्) तिरस्कारे (करिष्यथ) ॥
विषय
आलिगी व विलिगी की बन्धनशक्ति
पदार्थ
१. (आलिगी) = चारों ओर घूमनेवाली (च) = और विलिगी (च) = टेढ़ी चालवाली सर्पिणी (पिता च माता च) = चाहे वह नर है, चाहे मादा हम (वः) = तुम्हारे (बन्धुः) = बन्धन को (सर्वत:) = सब प्रकार से (विद्म) = जानते हैं। किस प्रकार तुम लिपट जाती हो, वह हम समझते हैं। २. अत: (अरसा:) = हमारे लिए नि:सार होती हुई तुम (किं करिष्यथ) = क्या करोगी? तु हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
भावार्थ
हम सपो की बन्धन-शक्ति को समझें और अपने लिए उन्हें नि:सार करनेवाले हों। उनके बन्धन को हम सरलता से पृथक् कर सकें।
भाषार्थ
(आलिगी च) सर्वत्र गति करनेवाला चुस्त (पिता ) पिता है, (च) और (विलिगी) गतिरहित सुस्त (माता) माता है और (सर्वतः) सर्वत्र फैला हुआ (व:) तुम्हारा (बन्धु) जो बन्धुसमूह है, ( अरसा) तुभ वे सब विष रस से रहित हो गये हो, यह (विद्म) हम जानते हैं तुम अब ( किम् ) क्या (करिष्यथ) करोगे?
टिप्पणी
[आलिगी=आ+लिगि गत्यर्थः (भ्वादिः) + अच् +इतिः (अत इनिठनौ, अष्टा० ५।२।११५)। पिता पद पुंलिङ्गी है, अतः आलिगी पद भी पुलिङ्गी ही होना चाहिए। विलिगी१ पद स्त्रीलिङ्गी है माता का विशेषण है। आलिगी, विलिगी आदि विषरहित सर्प हैं, जिनका विष विषैला नहीं रहता।] [१. विलिग+ङीप्।]
विषय
सर्प विष चिकित्सा।
भावार्थ
(आ-लिगी च) सब प्रकार से चिपटने वाली, कानखजूरा (वि-लिगी) विपरीत रूप से चिपटने वाली जोंक और (पिता च माता च) इन जातियों के नर और मादा इन (व सर्वतः बन्धु) तुम्हारे सब बन्धुओं को (विद्म) हम खूब अच्छी प्रकार जानते हैं। ये सब (अरसा) निर्विष हैं इसलिये ये (किं करिष्यथ) मनुष्य का क्या बिगाड़ सकेंगे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गरुत्मान् ऋषिः। तक्षको देवता। १-३, जगत्यौ। २ आस्तारपंक्तिः। ४, ७, ८ अनुष्टुभः। ५ त्रिष्टुप्। ६ पथ्यापंक्तिः। ९ भुरिक्। १०, ११ निचृद् गायत्र्यौ एकादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cure of Snake Poison
Meaning
We know the stickers and burrowers, non¬ stickers, males and females, and all their different classes in every way. They are non-poisonous. What harm can they do?
Translation
Aligi (that sticks while biting) and viligi (that does not stick after biting), their father and mother (i.e., male and female), we thoroughly know your relations; yon are powerless. What will you do ?
Translation
I make Powerless the terrible poison of the progeny of llrgula (female snake of such a kind) and often-biting offspring’s of Asikni (the black female snake) and those female snakes whose biting creates itch in the skin.
Translation
O serpents, your father and mother are movers in all directions, and are movers awry. We know all your kinsfolk; deprived of venom, what will ye do!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(आलिगी) लिगि गतौ−पचाद्यच्, गौरादित्वात् नलोपः, ङीष्, समन्ताद् गमनशीला (च) (विलिगी) पूर्ववत्सिद्धिः। विरुद्धगतिशीला (च) (पिता) जनकः सर्पः (माता) जननी सर्पिणी (च) (विद्म) जानीमः (वः) युष्माकम् (सर्वतः) सर्वप्रकारेण (बन्धु) बन्धुत्वम् (अरसाः) निर्वीर्याः (किम्) तिरस्कारे (करिष्यथ) ॥
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