अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 6
ऋषिः - गरुत्मान्
देवता - तक्षकः
छन्दः - पथ्यापङ्क्तिः
सूक्तम् - सर्पविषनाशन सूक्त
51
अ॑सि॒तस्य॑ तैमा॒तस्य॑ ब॒भ्रोरपो॑दकस्य च। सा॑त्रासा॒हस्या॒हं म॒न्योरव॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नो॒ वि मु॑ञ्चामि॒ रथाँ॑ इव ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒सि॒तस्य॑ । तै॒मा॒तस्य॑ । ब॒भ्रो: । अप॑ऽउदकस्य । च॒ । सा॒त्रा॒ऽस॒हस्य॑ । अ॒हम् । म॒न्यो: । अव॑ । ज्याम्ऽइ॑व । धन्व॑न: । वि । मु॒ञ्चा॒मि॒ । रथा॑न्ऽइव ॥१३.६॥
स्वर रहित मन्त्र
असितस्य तैमातस्य बभ्रोरपोदकस्य च। सात्रासाहस्याहं मन्योरव ज्यामिव धन्वनो वि मुञ्चामि रथाँ इव ॥
स्वर रहित पद पाठअसितस्य । तैमातस्य । बभ्रो: । अपऽउदकस्य । च । सात्राऽसहस्य । अहम् । मन्यो: । अव । ज्याम्ऽइव । धन्वन: । वि । मुञ्चामि । रथान्ऽइव ॥१३.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
दोषनिवारण के लिये उपदेश।
पदार्थ
(असितस्य) काले वर्णवाले, (तैमातस्य) ओदे स्थान में रहनेवाले, (बभ्रोः) भूरे वर्णवाले, (अपोदकस्य) जल से बाहर रहनेवाले, (च) और (सात्रासहस्य) मिलकर रहनेवाली प्रजाओं के हरानेवाले [सर्प] के (मन्योः) क्रोध के (रथान् इव) रथों को जैसे, (धन्वनः) धनुष की (ज्याम् इव) डोरी को जैसे (अहम्) मैं (अव) अलग (वि मुञ्चामि) ढीला करता हूँ ॥६॥
भावार्थ
मनुष्य सर्परूप भयंकर दुष्ट स्वभावों को ढीला कर दें, जैसे चाप की डोरी को ढीला करके रखते हैं ॥६॥
टिप्पणी
६−(असितस्य) शुक्लविरुद्धस्य कृष्णवर्णस्य (तैमातस्य) तिम क्लेदने−क+अत सातत्यगमने−अण्। इति तिमातः। ततो भवे अण्। तिमाते क्लेदने स्थाने भवस्य सर्पस्य (बभ्रो) पिङ्गलवर्णस्य (अपोदकस्य) अपगत उदकात् अपोदकः, तस्य। अपगतजलस्य (च) (सात्रासहस्य) सत्र सम्बन्धे सन्ततौ च−घञ्। सत्रं यज्ञः, अण्, टाप्। षह अभिभवे−पचाद्यच्। सात्रासां सम्बन्धे भवानां सहस्य अभिभावकस्य सर्पस्य (अहम्) (मन्योः) क्रोधस्य (अव) पृथग्भावे (ज्याम्) अ० १।१।३। ज्या जयतेर्वा जिनातेर्वा−निरु० ९।१७। जयशीलां मौर्वीम् (इव) यथा (धन्वनः) चापस्य (विमुञ्चामि) विमोचयामि। शिथिलीकरोमि (रथान् इव) रथान् यथा ॥
विषय
समुचित प्रयोग द्वारा विष-बाधा को दूर करना
पदार्थ
१. (असितस्य) = काले फनियार साँप के (तैमातस्य) = गीले स्थान पर रहनेवाले [तिम आदीभावे] साँप के (बभ्रो:) = भूरे रंगवाले (च) = और (अपोदकस्य) = जल से दूर रहनेवाले साँप के विष को अहम् मै इसप्रकार (विमुञ्चामि) = छुड़ाता हूँ (इव) = जैसेकि (सात्रासाहस्य) = सबको पराजित करनेवाले (मन्यो:) = क्रोधी राजा के (रथान्) = रथों को समझदार मन्त्री घोड़ों से मुक्त करता है तथा (इव) = जैसे वह इस क्रोधी राजा के (धन्वन:) = धनुष से (ज्याम्) = डोरी को (अव) = दूर करता है । २. यहाँ प्रसङ्गवश यह संकेत स्पष्ट है कि कभी-कभी एक शक्तिशाली क्रोधी राजा जोश में आक्रमण की तैयारी करता है, समझदार मन्त्री को उसे शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। इसीप्रकार वैद्य सर्प विष की बाधा को समुचित प्रयोगों से दूर करने का प्रयत्न करे।
भावार्थ
एक बैद्य तैमात, बभु व अपोदक सों की विष-बाधा को समुचित प्रयोगों द्वारा दूर करने के लिए यत्नशील हो।
भाषार्थ
(तैमातस्य) आद्रस्थान निवासी के (असितस्य) काले साँप के (च) और (अपोदकस्य) उदक के स्थान में रहने वाले के (बभ्रोः) भूरे रंगवाले साँप के, (सात्रासाहस्य) तथा वस्तुत: [काटने में] साहसवाले साँप के (मन्योः = मन्युम्) मन्यु को (अवमुञ्चामि) मैं छुड़ा देता हूं, (इव) जैसेकि (धन्वनाः) धनुष से (ज्याम्) डोरा का, (इव ) तथा जैसेकि (रथान्) रथों को [अश्वों से विमुक्त कर दिया जाता है।
टिप्पणी
[तेमातस्य=तिम आर्द्रीभावे (दिवादिः)। सत्रा सत्यनाम (निघं० ३।१०), जोकि वास्तव में साहसपूर्वक आक्रमण कर देता है।]
विषय
सर्प विष चिकित्सा।
भावार्थ
(असितस्य) असित, (तैमातस्य) तैमात, (बभ्रो) भूरे, गोधुमें और (अपोदकस्य) अपोदक, सूखे रेगिस्तान के सर्प के विषवेगों को (विमुञ्चामि) ऐसे दूर करता हूं जैसे कि (सात्रासाहस्य मन्योः) सदा विजयी राजा के (रथान्) पराक्रमी रथ सदा परे रहते हैं, (धन्वनः ज्यामिव अव) या जिस प्रधार धनुष से डोरी को उतार दिया जाता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गरुत्मान् ऋषिः। तक्षको देवता। १-३, जगत्यौ। २ आस्तारपंक्तिः। ४, ७, ८ अनुष्टुभः। ५ त्रिष्टुप्। ६ पथ्यापंक्तिः। ९ भुरिक्। १०, ११ निचृद् गायत्र्यौ एकादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cure of Snake Poison
Meaning
As we loosen the string of a bow or bonds of a chariot, so do I slacken and remove the deadly poison of the black, marshy, brown, off-water and all subduing snake.
Translation
The fury of the black snake, of taimāta (the snake being in wet places), of the brown snake, of the snake that lives away from water, and of the all-conquering snake, I hereby slacken, just as a string from the bow or, like (unyoking of) chariot.
Translation
I slacken the wrath of black, brown, aquatic and non-aquatic snakes like the chariots of the all-conquering King and Cord of the bow.
Translation
I slacken the venom of a serpent, that is dark, dwells in a wet place, or resides in a dry place far from water, or is full of all conquering wrath, just as the string is loosened from the bow, or the horses of a cart are unyoked in a desert.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(असितस्य) शुक्लविरुद्धस्य कृष्णवर्णस्य (तैमातस्य) तिम क्लेदने−क+अत सातत्यगमने−अण्। इति तिमातः। ततो भवे अण्। तिमाते क्लेदने स्थाने भवस्य सर्पस्य (बभ्रो) पिङ्गलवर्णस्य (अपोदकस्य) अपगत उदकात् अपोदकः, तस्य। अपगतजलस्य (च) (सात्रासहस्य) सत्र सम्बन्धे सन्ततौ च−घञ्। सत्रं यज्ञः, अण्, टाप्। षह अभिभवे−पचाद्यच्। सात्रासां सम्बन्धे भवानां सहस्य अभिभावकस्य सर्पस्य (अहम्) (मन्योः) क्रोधस्य (अव) पृथग्भावे (ज्याम्) अ० १।१।३। ज्या जयतेर्वा जिनातेर्वा−निरु० ९।१७। जयशीलां मौर्वीम् (इव) यथा (धन्वनः) चापस्य (विमुञ्चामि) विमोचयामि। शिथिलीकरोमि (रथान् इव) रथान् यथा ॥
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