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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 15/ मन्त्र 2
    ऋषिः - विश्वामित्रः देवता - मधुलौषधिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - रोगोपशमन सूक्त
    78

    द्वे च॑ मे विंश॒तिश्च॑ मेऽपव॒क्तार॑ ओषधे। ऋत॑जात॒ ऋता॑वरि॒ मधु॑ मे मधु॒ला क॑रः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    द्वे । इति॑ । च॒ । मे॒ । विं॒श॒ति: । च॒ । मे॒ ।। अ॒प॒ऽव॒क्तार॑: । ओ॒ष॒धे॒ । ऋत॑ऽजाते । ऋत॑ऽवारि । मधु॑ । मे॒ । म॒धु॒ला । क॒र॒:॥१५.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    द्वे च मे विंशतिश्च मेऽपवक्तार ओषधे। ऋतजात ऋतावरि मधु मे मधुला करः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    द्वे । इति । च । मे । विंशति: । च । मे ।। अपऽवक्तार: । ओषधे । ऋतऽजाते । ऋतऽवारि । मधु । मे । मधुला । कर:॥१५.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 15; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    विघ्नों के हटाने का उपदेश।

    पदार्थ

    (मे) मेरे लिये (द्वे) दो (च च) और (मे) मेरे लिये (विंशतिः) बीस... म० १ ॥२॥

    भावार्थ

    मनुष्य संसार में अनेक विघ्नों से बचने के लिये पुरुषार्थपूर्वक परमेश्वर का आश्रय लें ॥१॥ इस सूक्त में मन्त्र १ की संख्या ११, म० २ में द्विगुणी बाईस, म० ३ में तीन गुणी तेंतीस, इत्यादि, म० १–० तक एक सौ दस, और म० ११ में एक सहस्र एक सौ है। अर्थात् सम मन्त्रों में सम और विषम में विषम संख्यायें हैं ॥

    टिप्पणी

    १−(एका) एकसंख्या (च च) समुच्चये (मे) मह्यम् (दश) (अपवक्तारः) निन्दका व्यवहाराः (ओषधे) हे तापनाशिके शक्ते परमेश्वर (ऋतजाते) सत्येनोत्पन्ने (ऋतावरि) अ० ३।१३।७। ऋत−वनिप्। हे सत्यशीले (मधु) ज्ञानं माधुर्य्यं वा (मधुला) मधु+ला दाने−क। मधुनो ज्ञानस्य माधुर्यस्य वा दात्री (करः) लेटि रूपम्। त्वं कुर्याः ॥

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    विषय

    बाईस

    पदार्थ

    १. (द्वे च मे विंशतिः च मे) = भौतिक जीवन में 'ऋत' [Regularity] तथा आध्यात्म-जीवन में सत्य और दसों प्राण व दसों इन्द्रियाँ मुझसे (अपवक्तार:) = सब दोषों को दूर करें, मेरे जीवन में दोर्षों को न आने दे। २. हे (ओषधे) = दोषदाहक शक्ति को धारण करनेवाली! (ऋतजात:) = पूर्ण सत्य प्रभु से उत्पन्न ! (ऋतावरि)-सत्यज्ञानवाली बेदवाणि! तू (मधुला) = माधुर्य को लानेवाली है, (मे मधु कर:) = मेरे जीवन को मधुर बना। -

    भावार्थ

    वेदवाणी से मेरा जीवन मधुर बने। ऋत और सत्य तथा दसों इन्द्रियों व दसों प्राण मुझसे बुराई को दूर रखें।

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    भाषार्थ

    (द्वे च) दो इन्द्रियों को द्विविध [दो प्रकार की] वृत्तियाँ, तथा १० आयतनों सम्बन्धी दस-दस प्रकार की २० ईन्द्रियवृत्तियाँ ये २२ अपवक्तारः हैं। दो इन्द्रियों की द्विविध [दो प्रकार की] वृत्तियाँ मन्त्र १ और २ की मिश्रित वृत्तियाँ हैं। (ऋतजाते) हे सत्यमय जीवन मे प्रकट हुई, (ऋतावरि) सत्यमयी (ओषधे) ओषधि ! (मधुला) मधुरस्वरूपा तु ( मे ) मेरे जीवन को ( मधु) मधुमय अर्थात् मीठा (कर:) कर दे, या तूने कर दिया है।

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    विषय

    निन्दकों पर वश प्राप्त करने की साधना।

    भावार्थ

    (मे) मेरे (अप- वक्तारः) निन्दाकारी (विंशतिः च) बीस भी क्यों न हों तो भी (द्वे च मे) हे ओषधे ! मेरी तुम दो अर्थात् दुगुणी बलवाली सत्य वाणी होकर मुझे आनन्द प्रदान कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः। वनस्पतिर्देवता। १-३, ६, १०, ११ अनुष्टुभः। ४ पुरस्ताद् बृहती। ५, ७, ८,९ भुरिजः। एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Antidote of Pollution and Disease

    Meaning

    O Oshadhi, born of the truth and law of existence, observer of the laws of life, creator of the honey sweets of life, let there be two or twenty, any number of distractors, abusers and revilers, create for us the honey sweets of life and joy in spite of them, two, and even twenty may they be.

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    Translation

    Two (females) of mine and twenty of mine are averters of disaster, O herb. O born of right and preserver of right, being sweet yourself, may you create sweetness for me. (2-->20)

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    Translation

    Let this Madhula herb used in performing yajna and full of juicy potentialities make us regain health if we are attacked by two diseases or twenty.

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    Translation

    O God, the Companion and Embodiment of Truth, the Bestower of knowledge and sweetness, grant me knowledge and sweetness, though my revilers be two and twenty!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(एका) एकसंख्या (च च) समुच्चये (मे) मह्यम् (दश) (अपवक्तारः) निन्दका व्यवहाराः (ओषधे) हे तापनाशिके शक्ते परमेश्वर (ऋतजाते) सत्येनोत्पन्ने (ऋतावरि) अ० ३।१३।७। ऋत−वनिप्। हे सत्यशीले (मधु) ज्ञानं माधुर्य्यं वा (मधुला) मधु+ला दाने−क। मधुनो ज्ञानस्य माधुर्यस्य वा दात्री (करः) लेटि रूपम्। त्वं कुर्याः ॥

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