अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 4
ऋषिः - मयोभूः
देवता - ब्रह्मजाया
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मजाया सूक्त
77
यामा॒हुस्तार॑कै॒षा वि॑के॒शीति॑ दु॒च्छुनां॒ ग्राम॑मव॒पद्य॑मानाम्। सा ब्र॑ह्मजा॒या वि दु॑नोति रा॒ष्ट्रं यत्र॒ प्रापा॑दि श॒श उ॑ल्कु॒षीमा॑न् ॥
स्वर सहित पद पाठयाम् । आ॒हु: । तार॑का । ए॒षा । वि॒ऽके॒शी । इति॑ । दु॒च्छु॒ना॑म्। ग्राम॑म् । अ॒व॒ऽपद्य॑मानाम् । सा । ब्र॒ह्म॒ऽजा॒या । वि । दु॒नो॒ति॒। रा॒ष्ट्रम् । यत्र॑ । प्र॒ऽअपा॑दि । श॒श: । उ॒ल्कु॒षीऽमा॑न् ॥१७.४॥
स्वर रहित मन्त्र
यामाहुस्तारकैषा विकेशीति दुच्छुनां ग्राममवपद्यमानाम्। सा ब्रह्मजाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान् ॥
स्वर रहित पद पाठयाम् । आहु: । तारका । एषा । विऽकेशी । इति । दुच्छुनाम्। ग्रामम् । अवऽपद्यमानाम् । सा । ब्रह्मऽजाया । वि । दुनोति। राष्ट्रम् । यत्र । प्रऽअपादि । शश: । उल्कुषीऽमान् ॥१७.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदार्थ
(ग्रामम्) गाँव पर (अवपद्यमानाम्) गिरती हुई (याम्) जिस (दुच्छुनाम्) दुष्ट गति अविद्या को (आहुः) वे लोग बताते हैं कि (एषा) यह (विकेशी) विरुद्ध प्रकाशवाला (तारका इति) तारा है। (सा) वह (ब्रह्मजाया) ब्रह्मविद्या (राष्ट्रम्) उस राज्य को (वि दुनोति) उलट-पलट कर देती है (यत्र) जिसमें (उल्कुषीमान्) उल्काओं का कोष वा संग्रहवाला (शशः) गतिशील तारा (प्र अपादि) गिरा हो ॥४॥
भावार्थ
जिस राज्य में अविद्या प्रबल होती है, वह अत्याचारी राज्य ऐसे नष्ट हो जाता है, जैसे आकाश से तारा गिरने से नष्ट हो गया हो ॥४॥
टिप्पणी
४−(याम्) (आहुः) ब्रुवन्ति (तारका) तॄ तरणे−ण्वुल्, टाप्। नक्षत्रम् (एषा) समीपस्था (विकेशी) वि+काशृ दीप्तौ−अच्, ङीप्, आकारस्य एकारः। केशी केशा रश्मयस्तैस्तद्वान् भवति काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा−निरु० १२।२५। विरुद्धप्रकाशयुक्ता (इति) प्रकरणसमाप्तौ (दुच्छुनाम्) टुदु उपतापे−क्विप्। शुन गतौ−क, टाप्। दुष्टां गतिम्। अविद्याम् (ग्रामम्) वसतिम् (अवपद्यमानाम्) अधोगच्छन्तीम् (सा) (ब्रह्मजाया) म० २। वेदविद्या (वि) विरोधे (दुनोति) उपतापयति (राष्ट्रम्) राज्यम् (यत्र) यस्मिन् राज्ये (प्र) प्रकर्षेण (अपादि) प्राप्तः (शशः) शश प्लुतगतौ−अच्। गतिशीलमुल्कारूपं नक्षत्रम्। विरुद्धज्ञानमित्यर्थः (उल्कुषीमान्) उल दाहे−क्विप्, कुष निष्कर्षे−क, ङीप्, मतुप्। कुषी कोषः। उलां उल्कानां कुष्या कोषेण संग्रहेण युक्तः ॥
विषय
तारका-विकेशी
पदार्थ
(याम्) = जिस वेदवाणी को (आहुः) = कहते है कि (एषा तारका) = [तारका ज्योतिषि इति इत्वाभाव] यह तारनेवाली है, (विकेशी इति) = यह निश्चत से विशिष्ट प्रकाश की किरणोंवाली है, (दुच्छुनाम्) = दुःखों व दुर्गति के (ग्रामम्) = समूह को (अवपद्यमानाम्) = हमसे दूर करनेवाली है। (सा ब्रह्मजाया) = वह प्रभु से प्रादुर्भूत हुई वेदवाणी (राष्ट्रम्) = राष्ट्र को (विदुनोति) = सन्ताप-शून्य करती है। २. यह उस राष्ट्र को सन्ताप-शुन्य करती है (यत्र) = जहाँ कि (उल्कुषीमान्) = [उल्कुषी-fire] मशाल को हाथ में लिये हुए (शश:) = प्लुतगतिवाला-खूब क्रियाशील पुरुष (प्रापादि) = प्रकृष्ट गतिवाला होता है। यह ज्ञान के प्रकाश को सर्वत्र फैलाता हुआ लोगों को उत्साहित करता है और इसप्रकार राष्ट्र को जागरित करनेवाला होता है।
भावार्थ
वेदवाणी हमें तारनेवाली है, विशिष्ट प्रकार की रश्मियों को प्राप्त करानेवाली है। दु:खों को दूर करनेवाली है। यह देववाणी उस राष्ट्र को सन्ताप-शून्य करती है, जहाँ उत्साही पुरुष इसके सन्देश को राष्ट्र में सर्वत्र सुनाते हैं।
भाषार्थ
(याम्) जिस ब्रह्मजाया को (आहुः) कहते हैं कि (एषा) यह (तारका) राष्ट्र को तैरानेवाली नौका है, वह जब ( विकेशी इति) दुःखी होकर बिखरे केशोंवाली हो जाती है, तब इसे (ग्रामम) ग्राम पर ( अवपद्यमानाम्) गिरती हुई उल्का के सदृश (दुच्छुनाम् ) दुर्गतिरूप (आहुः) कहते हैं। (सा) वह (ब्रह्मजाया) ब्रह्मजाया (राष्ट्रम्) राष्ट्र को (विदुनोति ) विशेषतया उपतप्त कर देती है (यत्र) जिस राष्ट्र में कि यह ( शश:) प्लुत-गतिवाले, शीघ्रगतिवाले (उल्कुषीमान्) उल्का के सदृश जलते हुए पत्थर के रूप में ब्रह्मजाया (प्रापादि) प्रपतन करती है।
टिप्पणी
[दुच्छुनाम्= दुः +शुन गतौ (तुदादि:)। दुनोति= टु दु उपतापे (स्वादिः)। शशः = शश प्लुतगतौ (भ्वादिः) । उल्कुषीमान् = उल्का + उष दाहे (भ्वादिः) । मतुप् । ब्रह्मजाया है ब्रह्म और वेद को जाननेवाली। ऐसी धर्मात्मा और विदुषी को गुणकर्मानुसार योग्य पति के न मिलने पर वह दुःखी होकर विकेशी हो जाती है, केशों को संवारतो नहीं। केशसंवारण तो पति के रञ्जनार्थ होता है।
विषय
ब्रह्मजाया या ब्रह्मशक्ति का वर्णन।
भावार्थ
(ग्रामम् अवपद्यमानाम्) ग्रामों तथा नगरों में बंटी हुई जिस पृथिवी को या राष्ट्र-सभा को जो कि ब्राह्मण के हाथ में न होने के कारण (दुच्छुनाम्) दुःख देने वाली होगई है, परन्तु ब्राह्मण के हाथ में आजाने के कारण जिसे लोग (तारका एषा) दुःख-सागर से तराने वाली तथा (विकेशी इति आहुः) क्लेश हटाने वाली कहते हैं (सा ब्रह्मजाया) उसे वास्तव में ब्राह्मण की जाया ही समझना चाहिये। (यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान्) जिस पृथिवी या राष्ट्र-सभा में, मुखिया रूप से, चञ्चल तथा गरम मिज़ाज वाला मनुष्य होजाता है, अर्थात् ब्राह्मण-स्वभाव का मनुष्य यदि मुखिया नहीं बनता तब (सा) वह पृथिवी या राष्ट्र-सभा (राष्ट्रं विदुनोति) राष्ट्र भर को ही दुःखित कर देती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मयोभूर्ऋषिः। ब्रह्मजाया देवताः। १-६ त्रिष्टुभः। ७-१८ अनुष्टुभः। अष्टादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Brahma-Jaya: Divine Word
Meaning
If Brahma Jaya, Voice Divine, which they say is the saviour of life and free from all bounds, is described as harbinger of calamities befalling human habitations, then it destroys that social order and there meteors of fire and misfortune fall like stars void of light.
Translation
She, whom they call a meteor with dishevelled-hair (vikesi) ` falling upon the village with misfortune, is indeed the wife of an intellectual (brahma-jàya). She disturbs the kingdom; where a hare (sasa) with meteors (ulkusi) arrives.
Translation
The abducted and disrespected Brahmajaya, whom states men treat to be the calamity falling upon the village, is like a star deprived of light or without stress. She (Brahmajaya) disturb the Kingdom where appear the fire-brand hare.
Translation
Ignorance that overtakes a village, is spoken of as a star with contradictory light. Lack of Vedic knowledge disturbs the kingdom, where fall a lot of meteors and shooting stars.
Footnote
Just as meteors and shooting stars falling on a place damage it seriously, so a country is ruined where prevails ignorance and lack of Vedic knowledge.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(याम्) (आहुः) ब्रुवन्ति (तारका) तॄ तरणे−ण्वुल्, टाप्। नक्षत्रम् (एषा) समीपस्था (विकेशी) वि+काशृ दीप्तौ−अच्, ङीप्, आकारस्य एकारः। केशी केशा रश्मयस्तैस्तद्वान् भवति काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा−निरु० १२।२५। विरुद्धप्रकाशयुक्ता (इति) प्रकरणसमाप्तौ (दुच्छुनाम्) टुदु उपतापे−क्विप्। शुन गतौ−क, टाप्। दुष्टां गतिम्। अविद्याम् (ग्रामम्) वसतिम् (अवपद्यमानाम्) अधोगच्छन्तीम् (सा) (ब्रह्मजाया) म० २। वेदविद्या (वि) विरोधे (दुनोति) उपतापयति (राष्ट्रम्) राज्यम् (यत्र) यस्मिन् राज्ये (प्र) प्रकर्षेण (अपादि) प्राप्तः (शशः) शश प्लुतगतौ−अच्। गतिशीलमुल्कारूपं नक्षत्रम्। विरुद्धज्ञानमित्यर्थः (उल्कुषीमान्) उल दाहे−क्विप्, कुष निष्कर्षे−क, ङीप्, मतुप्। कुषी कोषः। उलां उल्कानां कुष्या कोषेण संग्रहेण युक्तः ॥
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