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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 25 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 25/ मन्त्र 7
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - योनिः, गर्भः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - गर्भाधान सूक्त
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    गर्भो॑ अ॒स्योष॑धीनां॒ गर्भो॒ वन॒स्पती॑नाम्। गर्भो॒ विश्व॑स्य भू॒तस्य॒ सो अ॑ग्ने॒ गर्भ॒मेह धाः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    गर्भ॑: । अ॒सि॒ । ओष॑धीनाम् । गर्भ॑: । वन॒स्पती॑नाम् । गर्भ॑: । विश्व॑स्य । भू॒तस्य॑ । स: । अ॒ग्ने॒ । गर्भ॑म् । आ । इ॒ह ।धा॒: ॥२५.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्। गर्भो विश्वस्य भूतस्य सो अग्ने गर्भमेह धाः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    गर्भ: । असि । ओषधीनाम् । गर्भ: । वनस्पतीनाम् । गर्भ: । विश्वस्य । भूतस्य । स: । अग्ने । गर्भम् । आ । इह ।धा: ॥२५.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 25; मन्त्र » 7
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    हिन्दी (4)

    विषय

    गर्भाधान का उपदेश।

    पदार्थ

    (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! तू (ओषधीनाम्) सोम लता, अन्न, आदि ओषधियों का (गर्भः) स्तुतियोग्य आश्रय, (वनस्पतीनाम्) सेवनीय गुणों के पदार्थों का (गर्भः) ग्रहण करनेवाला और (विश्वस्य) सब (भूतस्य) पञ्च भूत का (गर्भः) आधार (असि) है, (सः) सो तू (इह) इसमें (गर्भम्) गर्भ शक्ति (आ) अच्छे प्रकार (धाः=धेयाः) धारण कर ॥७॥

    भावार्थ

    जैसे परमेश्वर सब उत्तम पदार्थों को अपने में धारण करता है, वैसे ही समर्थ, पराक्रमी स्त्री-पुरुष उत्तम सन्तान का कारण पराक्रम, विद्या आदि अपने में रखके गर्भाधान करें ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है−अ० १२। म० ३७ ॥

    टिप्पणी

    ७−(गर्भः) अ० ३।१०।१२। गरणीयः स्तुत्यः (असि) (ओषधीनाम्) सोमलतान्नादीनाम् (गर्भः) ग्रहीता (वनस्पतीनाम्) अ० १।३५।३। सेवनीयगुणानां (गर्भः) आधारः (विश्वस्य) सर्वस्य (भूतस्य) पृथिव्यादिभूतपञ्चकस्य (सः) स त्वम् (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् (गर्भम्) सन्तानजनकं सामर्थ्यम् (आ) समन्तात् (इह) अत्र (धाः) आशिषि लिङि छान्दसं रूपम्। धेयाः ॥

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    विषय

    गर्भस्थिति में अग्नितत्व का महत्व

    पदार्थ

    १. हे (अग्ने) = तेजस्विन प्रभो ! आप (ओषधीनां गर्भ: असि) = फलपाकान्त सब ओषधियों के गर्भ हैं। सब ओषधियों में अग्नितत्त्व के रूप में प्रभु का निवास है। (वनस्पतीनाम्) = वनस्पतियों के आप (गर्भ:) = गर्भ हैं। वनस्पतियों में भी अग्निरूप से प्रभु विद्यमान हैं। (विश्वस्य भूतस्य) = सब भूतों के (गर्भ:) = आप गर्भ हैं-सब प्राणियों में अग्नितत्व की स्थिति है। यही उनके जीवन का कारण है। २.हे अने। तू (सः) = वह (इह) = इस 'देवी सरस्वती' में (गर्भ आधा:) = गर्भ का धारण कर। माता में उचित अग्नितत्त्व होने पर ही गर्भ की स्थिति होती है, निर्बला स्त्री में गर्भ की स्थिति नहीं हो पाती।

    भावार्थ

    ओषधियों, वनस्पतियों व सब भूतों में अग्नितत्त्व की स्थिति है। माता में भी यह अग्नितत्त्व ही गर्भ का धारण करता है, निर्बला स्त्री के शरीर में गर्भ स्थिर नहीं हो पाता।

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    भाषार्थ

    (ओषधीनाम्) ओषधियों में ( गर्भः) गर्भ-धारणकर्ता असि) तू है, (वनस्पतीनाम् ) वनस्पतियों में ( गर्भ:) गर्भ-धारणकर्त्ता [तू है]। (विश्वस्य भूतस्य) सब भूत-भौतिक, या सब सत्तावान् जगत् में ( गर्भ ) गर्भ-धारण-कर्ता [तू है], (स: अग्ने) वह तू हे अग्नि! (इह) इस पत्नी में ( गर्भम् ) गर्भ (आ धाः) आधान कर।

    टिप्पणी

    [समग्र जगत् में जो उत्पत्तियाँ हो रही हैं उनका कारण अग्नि है। अग्नि की इच्छा हो उत्पत्तियों का बीज है। उससे पति प्रार्थना करता है कि इस मेरी पत्नी में भी गर्भधारण करने की इच्छा कर। अग्नि है परमेश्वर, यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्र तद् ब्रह्म ता: आपः स प्रजापतिः” (यजुः० ३२।१)। परमेश्वरीय इच्छा से ही सब उत्पत्तियां हो रही है।]

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    विषय

    गर्भाशय में वीर्यस्थापन का उपदेश।

    भावार्थ

    हे अग्ने ! तू (ओषधीनां गर्भः असि) ओषधियों का भी गर्भ है, उनके भीतर सार रूप से विद्यमान है। और (वनस्पतीनाम् गर्भम् असि) वनस्पति=विशाल वृक्षों का भी गर्भ है, उनका भी सार है और तू (विश्वस्य भूतस्य) समस्त उत्पन्न जगत् का भी (गर्भः) गर्भ-ग्रहण करने वाला आश्रय है (सः) वह तू (इह) इस योनि में भी (गर्भं) गर्भ को (धाः) धारण करा।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। योनिगर्भो देवता। १-१२ अनुष्टुभः। १३ विराट् पुरस्ताद् बृहती। त्रयोदशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Garbhadhanam

    Meaning

    O Agni, vitality of life, you are the life sustainer of herbs, you are the life sustainer of trees, you are the life sustainer of all living beings of the world. Pray sustain and mature the foetus here in the womb.

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    Translation

    O biological fire (Agni), you are the embryo of medicinal herbs; you are the embryo of trees; you are the embryo of all the existence; as such may you set the embryo here.

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    Translation

    This heat is the germ of plants and herbs, this is the germ of trees and this is the germ of trees and this is the germ all born-object. Let this heat set the germ of embryo in the womb.

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    Translation

    O God, Thou art the stay of plants and herbs, Thou art the support of forest trees, Thou art the Refuge of all existing things. Develop the child in my womb!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(गर्भः) अ० ३।१०।१२। गरणीयः स्तुत्यः (असि) (ओषधीनाम्) सोमलतान्नादीनाम् (गर्भः) ग्रहीता (वनस्पतीनाम्) अ० १।३५।३। सेवनीयगुणानां (गर्भः) आधारः (विश्वस्य) सर्वस्य (भूतस्य) पृथिव्यादिभूतपञ्चकस्य (सः) स त्वम् (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् (गर्भम्) सन्तानजनकं सामर्थ्यम् (आ) समन्तात् (इह) अत्र (धाः) आशिषि लिङि छान्दसं रूपम्। धेयाः ॥

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