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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 50 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 50/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - विजय सूक्त
    74

    तु॒राणा॒मतु॑राणां वि॒शामव॑र्जुषीणाम्। स॒मैतु॑ वि॒श्वतो॒ भगो॑ अन्तर्ह॒स्तं कृ॒तं मम॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तु॒राणा॑म् । अतु॑राणाम् । वि॒शाम् । अव॑र्जुषीणाम् । स॒म्ऽऐतु॑ । वि॒श्वत॑: । भग॑: । अ॒न्त॒:ऽह॒स्तम् । कृ॒तम् । मम॑ ॥५२.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तुराणामतुराणां विशामवर्जुषीणाम्। समैतु विश्वतो भगो अन्तर्हस्तं कृतं मम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तुराणाम् । अतुराणाम् । विशाम् । अवर्जुषीणाम् । सम्ऽऐतु । विश्वत: । भग: । अन्त:ऽहस्तम् । कृतम् । मम ॥५२.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 50; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (तुराणाम्) शीघ्रकारी, (अतुराणाम्) अशीघ्रकारी (अवर्जुषीणाम्) [शत्रुओं को] न रोक सकनेवाली (विशाम्) प्रजाओं का (भगः) धन (विश्वतः) सब प्रकार (मम) मेरे (अन्तर्हस्तम्) हाथ में आये हुए (कृतम्) कर्म को (समैतु) यथावत् प्राप्त हो ॥२॥

    भावार्थ

    बलवान् राजा सब प्रकार प्रजा के धन को अपने वश में रख कर रक्षा करे ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(तुराणाम्) तुर त्वरणे-क। शीघ्रकारिणीनाम् (अतुराणाम्) अशीघ्रकारिणीनाम् (विशाम्) प्रजानाम् (अवर्जुषीणाम्) पॄनहिकलिभ्य उषच्। उ० ४।७५। नञ्+वृजी वर्जने-उषच्, ङीप्। शत्रूणामवर्जनशीलानाम् (समैतु) सम्यक् प्राप्नोतु (विश्वतः) सर्वतः (भगः) धनम् (अन्तर्हस्तम्) हस्तमध्ये गतम् (कृतम्) कर्म (मम) ॥

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    विषय

    श्री का निवास कहाँ?

    पदार्थ

    १. (तुराणाम्) = जल्दबाजों का, बिना विचारे शीघ्रता से कार्य करनेवालों का, (अतुराणाम्) = आलस्य के कारण स्फूर्ति से कार्य न कर सकनेवालों का, (अवर्जुषीणाम्) = बुराइयों को, अन्याय्य मार्गों को न छोड़नेवाली (विशाम्) = प्रजाओं का (भग:) = ऐश्वर्य (विश्वत:) = सब ओर से (समैतु) = मुझे प्राप्त हो। इन दोषों से रहित यह ऐश्वर्य (मम अन्तः हस्तं कृतम्) = मेरे हाथों के अन्दर किया जाए।

    भावार्थ

    ऐश्वर्य [श्री] का निवास वहाँ होता है जहाँ १. सब कार्य विचारपूर्वक किये जाएँ, जल्दबाजी में नहीं २. जहाँ आलस्य न करके कार्यों को स्फूर्ति से किया जाए और ३. जहाँ अशुभ व अन्याय्य मार्ग का वर्जन हो।

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    भाषार्थ

    (तुराणाम्) त्वरया अर्थात् शीघ्रतापूर्वक अर्थात् सहसा काम करने वाली, (अतुराणाम्) न शीघ्रतापूर्वक अर्थात् सोच विचार कर काम करने वाली, (अवर्जुषीणाम्१) परन्तु द्यूतकर्म से वर्जित न होने वाली [सायण] (विशाम्) [उभयविध] प्रजाओं का (भगः) ऐश्वर्य अर्थात् धन (विश्वतः) सब ओर से (समैतु) मुझे सम्यक्त्तया प्राप्त हो जाय, क्योंकि (कृतम्१) यह काम (मम) मेरे (अन्तर्हस्तम्) हाथों में है। अवर्जुषीणाम्= अथवा अवः२ (अर्थस्वामित्व के लिये) + जुषीणाम् (द्यूत को सेवित करने वाली) विशाम्।

    टिप्पणी

    [राज्याधिकारी द्यूत क्रीड़ा के लिये सब ओर बैठे जुधारियों को आदेश देता है कि तुम लोग जो धन द्यूतक्रिया के लिये लाए हो वह सब मुझे सौंप दो। इस प्रकार का अधिकार मेरे हाथों में है। पैप्पलाद शाखा में "अन्तर्हस्त्यं कृतं मनः" पाठ है, "कृतं मनः"= "मनः कृतम्" मैंने निश्चय किया है। जो निश्चय करना मेरे हाथ में हैं ? राज्याधिकारी "अक्षराज" ने मानो द्यूत स्थान पर छापा मार कर कितनों को आदेश दिया है] [१. मन्त्रोक्त “कृतम्" के नानार्थ सम्भव है। (यजु० ३०।१८) में कृत, त्रेता तथा द्वापर शब्दों में “कृत" "सत्ययुग" वाचक प्रतीत होता है। ऋग्वेद में अक्षैर्मा दीव्य" (१०।३४।१३) द्वारा द्यूतक्रीड़ा की निषेधविधि है। वेदों में परस्पर विरोधी विधियां नहीं हो सकतीं। अतः सूक्त (५२) के मन्त्रार्थ विवेक पूर्वक किये हैं। २. "अव" धातु के नाना अर्थों में "स्वाम्यर्थ याचन" अर्थ भी हैं (भ्वादिः)।]

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    विषय

    आत्म-संयम।

    भावार्थ

    (तुराणां) अति शीघ्रता करने वाली चञ्चल, अविवेकी, (अतुराणाम्) मन्द, जो शीघ्रता न कर सकें अर्थात् तामस, (अवर्जुषीणाम्) तथा जो अपने दोषों को या प्रकृतिसिद्ध स्वभावों को परित्याग नहीं कर सकतीं ऐसी (विशाम्) प्रजाओं अर्थात् प्राणेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय रूप अध्यात्म प्रजाओं में से (विश्वतः) जो सब से अधिक (भगः) सम्पत्तिमान् ऐश्वर्यवान् है वह आत्मा (सम्-आ-एतु) मुझे प्राप्त हो। क्योंकि (कृतं) समस्त मेरी क्रिया शक्ति अथवा पुरुषार्थ अर्थात् धर्म, अर्थ काम और मोक्ष, कर्म और कर्मफल सब (मम) मेरे (अन्तर्हस्तम्) अपने हाथ के भीतर हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कितववधनकामोंगिरा ऋषिः। इन्द्रो देवता। १, २, ५, ९ अनुष्टुप्। ३, ७ त्रिष्टुप्। ४, जगती। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। नवर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory by Karma

    Meaning

    Whether they are smart rich wasters or simple hard-pressed fools, let the entire power and money of people addicted to gambling come under my control confiscated under law by Aksharaja, controller of gambling.

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    Translation

    May the fortune of the hasty (turanam) unhasty (aturanam) and of the people not abstaining from evil, come from all sides together to be placed in my hand.

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.52.2AS PER THE BOOK

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    Translation

    Let all the fortune of folk—from hale, sek and impotent to defend them come to me as industry and perseverance is in my hand.

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    Translation

    May the fortune of the quick, show subjects, who cannot cast away their weaknesses, pass into my hands. My action is the creation of my hand.

    Footnote

    The king should collect money from his strong and weak subjects, and spend it for their amelioration.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(तुराणाम्) तुर त्वरणे-क। शीघ्रकारिणीनाम् (अतुराणाम्) अशीघ्रकारिणीनाम् (विशाम्) प्रजानाम् (अवर्जुषीणाम्) पॄनहिकलिभ्य उषच्। उ० ४।७५। नञ्+वृजी वर्जने-उषच्, ङीप्। शत्रूणामवर्जनशीलानाम् (समैतु) सम्यक् प्राप्नोतु (विश्वतः) सर्वतः (भगः) धनम् (अन्तर्हस्तम्) हस्तमध्ये गतम् (कृतम्) कर्म (मम) ॥

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