अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 50/ मन्त्र 4
व॒यं ज॑येम॒ त्वया॑ यु॒जा वृत॑म॒स्माक॒मंश॒मुद॑वा॒ भरे॑भरे। अ॒स्मभ्य॑मिन्द्र॒ वरी॑यः सु॒गं कृ॑धि॒ प्र शत्रू॑णां मघव॒न्वृष्ण्या॑ रुज ॥
स्वर सहित पद पाठव॒यम् । ज॒ये॒म॒ । त्वया॑ । यु॒जा । वृत॑म् । अ॒स्माक॑म् । अंश॑म् । उत् । अ॒व॒ । भरे॑ऽभरे । अ॒स्मभ्य॑म् । इ॒न्द्र॒ । वरी॑य: । सु॒ऽगम् । कृ॒धि॒ । प्र । शत्रू॑णाम् । म॒घ॒ऽव॒न् । वृष्ण्या॑ । रु॒ज॒ ॥५२.४॥
स्वर रहित मन्त्र
वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे। अस्मभ्यमिन्द्र वरीयः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज ॥
स्वर रहित पद पाठवयम् । जयेम । त्वया । युजा । वृतम् । अस्माकम् । अंशम् । उत् । अव । भरेऽभरे । अस्मभ्यम् । इन्द्र । वरीय: । सुऽगम् । कृधि । प्र । शत्रूणाम् । मघऽवन् । वृष्ण्या । रुज ॥५२.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्र) हे सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त इन्द्र राजन् ! (त्वया) तुझ (युजा) सहायक वा ध्यानी के साथ (वयम्) हम लोग (वृतम्) घेरनेवाले शत्रु को (जयेम) जीत लेवें, (अस्माकम्) हमारे (अंशम्) भाग को (भरेभरे) प्रत्येक संग्राम में (उत्) उत्तमता से (अव) रख। (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (वरीयः) विस्तीर्ण देश को (सुगम्) सुगम (कृधि) कर दे, (मघवन्) हे बड़े धनी ! (शत्रूणाम्) शत्रुओं के (वृष्ण्या) साहसों को (प्र रुज) तोड़ दे ॥४॥
भावार्थ
सब योधा लोग सेनापति की सहायता लेकर अपने धन जन आदि की रक्षा करके शत्रुओं को जीतें ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१।१०२।४ ॥
टिप्पणी
४−(वयम्) योद्धारः (जयेम) अभिभवेम (त्वया) (युजा) सहायेन ध्यानिना वा (वृतम्) वृणोतेः-क्विप्। आवरकं शत्रुम् (अस्माकम्) (अंशम्) धनजनविभागम् (उत्) उत्कर्षेण (अव) रक्ष (भरेभरे) सर्वस्मिन् संग्रामे (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (वरीयः) उरु-ईयसुन्, वरादेशः। उरुतरम्। विस्तीर्णतरं देशम् (सुगम्) सुगमम् (कृधि) कुरु (प्र) (शत्रूणाम्) (मघवन्) हे बहुधनवन् (वृष्ण्या) वृष्णि भवानि। सामर्थ्यानि (रुज) रुजो भङ्गे। भङ्ग्धि ॥
विषय
विजय
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = शत्रुओं के विद्रावक प्रभो! (त्वया युजा) = आपके साथ मिलकर (वयम्) = हम (वृतम्) = हमें घेर लेनेवाले व हमपर आवरण के रूप में आ जानेवाले 'काम,क्रोध,लोभ' रूप शत्रुओं को (जयेम) = जीतें। (अस्माकम् अंशम्)= हमारे अंश [भाग] को भरेभरे-प्रत्येक संग्राम में आप उद् अव प्रकर्षेण रक्षित कीजिए। २. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (सुगं वरीयः कृधि) = सुगमता से प्राप्य श्रेष्ठ धन दीजिए, हम कुटिल मार्गों से धनार्जन करनेवाले न हों। हे (मघवन्) = परमैश्वर्यशाली प्रभो। (शत्रूणां वृष्णया) = शत्रुओं के बलों को प्ररुज-प्रकर्षेण भग्न कीजिए, आपके साथ हम शत्रुओं पर विजय पानेवाले बनें।
भावार्थ
जीवन-संग्राम में प्रभु का स्मरण करते हुए हम काम, क्रोध आदि शत्रुओं को परास्त करें और उत्तम मार्गों से न्याय्य धनों का अर्जन करें।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे सम्राट ! या सेनापति ! (त्वया युजा) तुछ सहायक द्वारा (वयम्, जयेम) हम सैनिक विजयी हों, (भरेभरे) संग्राम-संग्राम में (वृतम्) घेरे हुए (अस्माकम्, अंशम्) हमारे धनांश को (उदव) उद्गमय, समुन्नत कर (अस्मभ्यम्) हम सैनिकों के लिये (वरीयः) विस्तृत अर्थात् लम्बा मार्ग (सुगम्) सुगम (कृधि) कर दे, (मघवन्) हे सम्पत्तिशालिन् ! (शत्रूणाम्) शत्रुओं के (वृष्ण्या) बलों को (प्ररुज) पूर्णतया भग्न कर दे।
टिप्पणी
[इन्द्र के दो अर्थ मन्त्र में हैं, सम्राट और सेनापति। वरीयः= युद्धस्थल यदि दूर हो तो रथों द्वारा उसे सुगम्य कर देना चाहिये ताकि सैनिक युद्ध से पूर्व थकावट अनुभव न करें। सैनिक, शत्रु की जिस धनराशि को घेर लें उस का कतिपय अंश सैनिकों का भी होना चाहिये ताकि उन की धन वृद्धि होती जाय। भरेभरे= संग्रामनाम (निघं० २।१७)। "कृतम्" का अर्थ यदि द्यूताक्ष किया जाय तो उस द्वारा क्या सांग्रामिक विजय प्राप्त हो सकता है ?]।
विषय
आत्म-संयम।
भावार्थ
हे इन्द्र परमेश्वर ! (त्वया) तुझ (युजा) सहायक की सहायता से (वयं) हम (वृतं) आवरणकारी, घेरने वाले तामस आवरण का (जयेम) विजय करें। जिस प्रकार ऐश्वर्यवान् राजा की सहायता से उसके सैनिक अपने नगर को घेरने वाले शत्रु पर विजय प्राप्त करते हैं उसी प्रकार ईश्वर की सहायता से हम साधकगण आत्मा को घेरने वाले तामस आवरण अथवा राजस इन्द्रियगण को अपने वश करें। हे प्रभो ! (भरे-भरे) प्रत्येक संग्राम में (अस्माकम्) हमारे (अंशम्) व्यापक आत्मा को (उत् अव) उन्नति की तरफ ले जाओ। हे इन्द्र ! (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (वरीयः) सबसे उत्कृष्ट और महान् मोक्ष-पद को भी (सुगम्) सुखसे प्राप्त करने योग्य (कृधि) कर। और (शत्रूणां*) हमारे बल और ज्ञान का नाश करने वाले काम, क्रोध आदि शत्रुओं के (वृष्ण्या) बलों को (प्ररुज) अच्छी प्रकार तोड़ डाल। इस मन्त्र का भी द्यूतक्रीड़ा से कोई सम्बन्ध नहीं। अतः सायण आदि का द्यूतपरक अर्थ असंगत है।
टिप्पणी
(तृ०) ‘वरिवः’ इति ऋ०। ऋग्वेदे कुत्स आंगिरस ऋषिः इन्द्रो देवता। *शातनं-नाशः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कितववधनकामोंगिरा ऋषिः। इन्द्रो देवता। १, २, ५, ९ अनुष्टुप्। ३, ७ त्रिष्टुप्। ४, जगती। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। नवर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Victory by Karma
Meaning
With you as Ruler and leader for our guidance, let us win over the surrounding rivals and adversaries. Pray reserve for us our share in every struggle for victory and prosperity. O Indra, lord of glory, whatever is best for us, make that simple and straight for us to achieve, and break down the force and morale of the opponents.
Translation
With you as an ally, May we conquer the surrounded (enemy). May you keep us to have an upper-hand in each and every battle (bhare-bhare). O resplendent one (Indra), make the superior easily approachable to us. O bounteous Lord, shatter the strength of the enemy.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.52.4AS PER THE BOOK
Translation
O mighty King, may we with you to aid us win over the enemy who has surrounded us, please reserve our share in every battle; make for us wide room and easy way, break down O, richest one! the enterprise of foemen.
Translation
O God, with Thy help, may we subdue evil-propensities. O God, in each struggle of life, elevate our soul. O God, make salvation the highest stage of spiritual advancement easily attainable by ns. O opulent God, break down the forces of lust, and anger, etc. the enemies of the soul.
Footnote
Sayana has applied this verse on gambling. This is irrational. There is no reference to gambling in the verse.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(वयम्) योद्धारः (जयेम) अभिभवेम (त्वया) (युजा) सहायेन ध्यानिना वा (वृतम्) वृणोतेः-क्विप्। आवरकं शत्रुम् (अस्माकम्) (अंशम्) धनजनविभागम् (उत्) उत्कर्षेण (अव) रक्ष (भरेभरे) सर्वस्मिन् संग्रामे (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (वरीयः) उरु-ईयसुन्, वरादेशः। उरुतरम्। विस्तीर्णतरं देशम् (सुगम्) सुगमम् (कृधि) कुरु (प्र) (शत्रूणाम्) (मघवन्) हे बहुधनवन् (वृष्ण्या) वृष्णि भवानि। सामर्थ्यानि (रुज) रुजो भङ्गे। भङ्ग्धि ॥
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