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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 50 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 50/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - इन्द्रः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - विजय सूक्त
    67

    उ॒त प्र॒हामति॑दीवा जयति कृ॒तमि॑व श्व॒घ्नी वि चि॑नोति का॒ले। यो दे॒वका॑मो॒ न धनं॑ रु॒णद्धि॒ समित्तं रा॒यः सृ॑जति स्व॒धाभिः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त । प्र॒ऽहाम् । अति॑ऽदीवा । ज॒य॒ति॒ । कृ॒तम्ऽइ॑व । श्व॒ऽघ्नी । वि । चि॒नो॒ति॒ । का॒ले । य: । दे॒वऽका॑म: । न । धन॑म् । रु॒णध्दि॑ । सम् । इत् । तम् । रा॒य: । सृ॒ज॒ति॒ । स्व॒धाभि॑: ॥५२.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले। यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित्तं रायः सृजति स्वधाभिः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत । प्रऽहाम् । अतिऽदीवा । जयति । कृतम्ऽइव । श्वऽघ्नी । वि । चिनोति । काले । य: । देवऽकाम: । न । धनम् । रुणध्दि । सम् । इत् । तम् । राय: । सृजति । स्वधाभि: ॥५२.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 50; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (उत्) और (अतिदीवा) बड़ा व्यवहारकुशल पुरुष (प्रहाम्) उपद्रवी शत्रु को (जयति) जीत लेता है, (श्वघ्नी) धन नाश करनेवाला जुआरी (काले) [हार के] समय पर (इव) ही (कृतम्) अपने काम का (वि चिनोति) विवेक करता है। (यः) जो (देवकामः) शुभगुणों का चाहनेवाला (धनम्) धन को [शुभ काम में] (न) नहीं (रुणद्धि) रोकता है, (रायः) अनेक धन (तम्) उसको (इत्) ही (स्वधाभिः) आत्मधारण शक्तियों के साथ (सम् सृजति) मिलते हैं ॥६॥

    भावार्थ

    प्रतापी पुरुष दुष्ट को जीतकर उसे उसके दोष का निश्चय करा देता है, शुभगुण चाहनेवाला उदारचित्त मनुष्य अनेक धन और आत्मबल पाता है ॥६॥ मन्त्र ६, ७ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१०।४२।९, १० ॥

    टिप्पणी

    ६−(उत) अपि च (प्रहाम्) जनसनखन–०। पा० ३।२।६७। इति बाहुलकात् हन्तेर्विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। पा० ६।४।४१। नस्य आत्वम्। प्रहन्तारम्। उपद्रविणम् (अतिदीवा) कनिन् युवृषितक्षि०। उ० १।१५६। दिवु क्रीडाव्यवहारादिषु-कनिन्, दीर्घश्च। अतिव्यवहारकुशलः (जयति) (कृतम्) कर्म (इव) अवधारणे (श्वघ्नी) अ० ४।१६।५। धनहन्ता कितवः (वि चिनोति) विवेकेन प्राप्नोति (काले) पराजयकाले (यः) (देवकामः) शुभगुणान् कामयमानः (न) निषेधे (धनम्) (रुणद्धि) वर्जयति (इत्) एव (तम्) देवकामम् (रायः) धनानि (सम् सृजति) बहुवचनस्यैकवचनम्। सं सृजन्ति। संयोजयन्ति (स्वधाभिः) आत्मधारणशक्तिभिः ॥

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    विषय

    लोभ-विजय

    पदार्थ

    १. (उत) = और (अतिदीवा) = [दिव् विजिगीषायाम्] अतिशयेन विजय की कामनावाला यह साधक (प्रहाम्) = प्रकर्षेण नष्ट करनेवाले इस लोभ को (जयति) = जीतता है, लोभ को पराजित करके व्यसनवृक्ष के मूल को काटनेवाला बनता है। (श्वघ्नि) = [श्वघ्नि स्वं हन्ति-नि०५।२२] लोभाभिभूत होकर आत्मघात करनेवाला यह व्यक्ति (कृतम् इव) = अपने किये हुए कर्मों के अनुसार (काले विचिनोति) = समय पर फल को संचित [प्राप्त] करता है। लोभ अन्तत: उसके विनाश का कारण बनता है ('अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति')|| लोभ के कारण न्याय्य-अन्याय्य सभी मार्गों से धनार्जन करता हआ यह फलता फलता है और खूब ऊँचा उठकर इसप्रकार गिरता है कि इसका समूल विनाश हो जाता है। २. (यः देवकाम:) = जो दिव्यगुणों व प्रभुप्राप्ति की कामनावाला होता है, वह (धनं न रुणद्धि) = धन को अपने समीप रोकता नहीं, अपितु यज्ञादि उत्तम कर्मों में उसे प्रवाहित होने देता है, (तम् इत्) = उस देवकाम पुरुष को ही प्रभु (स्वधाभिः) = आत्मधारण-शक्तियों के साथ रायः संसजति धन देता है। असुरकाम पुरुष धनों के द्वारा ही व्यसनाक्रान्त होकर निधन को प्राप्त होता

    भावार्थ

    विजिगीषु पुरुष लोभाभिभूत न होकर धनों को यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवाहित करता है। प्रभु इसे आत्मधारणशक्ति के साथ धनों को प्राप्त कराते हैं, परन्तु लोभाभिभूत होकर यह आत्मघात करता है, अपने किये कर्मों के परिणामस्वरूप कुछ देर चमककर समूल नष्ट हो जाता है।

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    भाषार्थ

    (उत) तथा (अतिदीवा) अतिविजिगीषु अर्थात् प्रबल सैन्यशक्तिसम्पन्न सेनापति, (प्रहाम्) रण को त्याग कर भागे हुए को, (जयति) सुगमता से जीत लेता है, (श्वघ्नी इव) निज भविष्य के हन्ता के सदृश [शत्रु] (कृतम्) किये शत्रुत्व को (काले) समय पर (विचिनोति) विचारता है। (यः) जो (देवकाम ) अग्निदेव की कामना वाला [मन्त्र ३] (धनम्) धन को [द्यूतकर्म में] (न रुणद्धि) नहीं रोकता (तम्) उसे [अग्नि, मन्त्र ३] (स्वधाभिः) निज धारण-पोषण शक्तियों द्वारा (रायः संसृजति, इत्) सम्पत्ति के साथ सम्बद्ध करता ही है।

    टिप्पणी

    [प्रहाम्=प्र + ओहाक् त्यागे (जुहोत्यादिः), प्रबल सैन्यशक्ति को देख कर जो युद्धभूमि को त्याग कर भाग जाता है, उसे "जयति"। (श्वघ्नी= श्वः घ्नी, "कल" अर्थात् भविष्य का हनन करने वाला, अथवा श्वघ्नी= स्वघ्नी, निज स्व अर्थात् धन का हनन करने वाला, (द्यूतकर्म में)। रायः = राया (ऋग्वेद १०।४२।९)। विचिनोति; विचयः= search; looking out; investigation (आप्टे)।]

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    विषय

    आत्म-संयम।

    भावार्थ

    (उत) और ‘इन्द्र’ ईश्वर या राजा या ऐश्वर्यवान् जीव ही समस्त प्राणों में (अति-दीवा) अत्यन्त अधिक तेजस्वी क्रियावान्, व्यवहारवान्, आनन्दी, हर्षवान् होने के कारण (प्र-हाम् जयति) अपने मारने वाले को भी जीत लेता है। (काले) उचित समय पर (श्वघ्नी) चतुर द्यूतकार जिस प्रकार (कृतम्-इव) अपने जयप्रद ‘कृत’ नामक अक्ष को खोज लेता है उसी प्रकार वह आत्मा (काले) अपने उचित अवसर में अपने (कृतम्) किये कर्म अर्थात् इष्ट और आपूर्त्त अर्थात् उपकार के कर्मों को (विचिनोति) अपनी सुख प्राप्ति के निमित्त चुनता और करता है। (यः) जो पुरुष (देवकामः) विद्वान् महात्मा, देवतुल्य पुरुषों के निमित्त अपने (धनं) धन को (न रुद्धि) रोके नहीं रखता प्रत्युत उत्तम सज्जन पुरुषों के उपकार तथा उनकी अभिलाषा के अनुकूल व्यय करता है, इन्द्र अर्थात् परमेश्वर (तम् इत्) उसको ही (स्वधाभिः) अपनी दानशक्तियों से (रायः) धन, सम्पत्तियां (सं सृजति) प्रदान करता है। ऋग्वेद में यह मन्त्र इन्द्र की स्तुति में है। सायण ने वहां उत्तम अर्थ करके भी इस स्थल पर इस मन्त्र को भारी जुआरिये पर लगा दिया है।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘अतिदिव्यो जयाति’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कितववधनकामोंगिरा ऋषिः। इन्द्रो देवता। १, २, ५, ९ अनुष्टुप्। ३, ७ त्रिष्टुप्। ४, जगती। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। नवर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory by Karma

    Meaning

    And an expert player with initiative and at calculated risk takes on the advancing adversary and wins and, like a master gamesman, collects his innings at the end of game time. Then, if he, like a lover of divinities and positive achievement, preserves but does not block his money, the wealth, of its own productive nature and potential, creates more and more for him (he being an expert player and user of money).

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    Translation

    A warrior, very keen to win, conquers even a hard-hitting rival. A gambler, fighter gains spoils in due course, as if he had acted with purpose. Whoever, willing to conquer, keeps not back the money, (is not niggard in spending money), him the wealth joins with sustaining powers-

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.52.6AS PER THE BOOK

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    Translation

    The man who is efficient in his enterprises overcome and subjugate his enemy as the gambler piles his spoils in time. The man who does not keep back his riches from spending in good works, overwhelms with wealth’s inherent power.

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    Translation

    An energetic, sagacious, jubilant soul conquers the assailant. A gambler who wastes his money realises his wrong act when he suffers loss. A devotee who keeps not back his riches for himself, but spends them for the good of humanity, is overwhelmed with wealth’s inherent powers.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(उत) अपि च (प्रहाम्) जनसनखन–०। पा० ३।२।६७। इति बाहुलकात् हन्तेर्विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। पा० ६।४।४१। नस्य आत्वम्। प्रहन्तारम्। उपद्रविणम् (अतिदीवा) कनिन् युवृषितक्षि०। उ० १।१५६। दिवु क्रीडाव्यवहारादिषु-कनिन्, दीर्घश्च। अतिव्यवहारकुशलः (जयति) (कृतम्) कर्म (इव) अवधारणे (श्वघ्नी) अ० ४।१६।५। धनहन्ता कितवः (वि चिनोति) विवेकेन प्राप्नोति (काले) पराजयकाले (यः) (देवकामः) शुभगुणान् कामयमानः (न) निषेधे (धनम्) (रुणद्धि) वर्जयति (इत्) एव (तम्) देवकामम् (रायः) धनानि (सम् सृजति) बहुवचनस्यैकवचनम्। सं सृजन्ति। संयोजयन्ति (स्वधाभिः) आत्मधारणशक्तिभिः ॥

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