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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 12
    ऋषिः - अथर्वा देवता - कश्यपः, समस्तार्षच्छन्दांसि, ऋषिगणः छन्दः - जगती सूक्तम् - विराट् सूक्त
    83

    छन्दः॑पक्षे उ॒षसा॒ पेपि॑शाने समा॒नं योनि॒मनु॒ सं च॑रेते। सूर्य॑पत्नी॒ सं च॑रतः प्रजान॒ती के॑तु॒मती॑ अ॒जरे॒ भूरि॑रेतसा ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    छन्द॑:पक्षे॒ इति॒ छन्द॑:ऽपक्षे । उ॒षसा॑ । पेपि॑शाने॒ इति॑ ।स॒मा॒नम् । योनि॑म् । अनु॑ । सम् । च॒रे॒ते॒ इति॑ । सूर्य॑पत्नी॒ इति॒ सूर्य॑ऽपत्नी । सम् । च॒र॒त॒: । प्र॒जा॒न॒ती इति॑ प्र॒ऽजा॒न॒ती । के॒तु॒मती॒ इति॑ के॒तु॒ऽमती॑ । अ॒जरे॒ इति॑ । भूरि॑ऽरेतसा ॥९.१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    छन्दःपक्षे उषसा पेपिशाने समानं योनिमनु सं चरेते। सूर्यपत्नी सं चरतः प्रजानती केतुमती अजरे भूरिरेतसा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    छन्द:पक्षे इति छन्द:ऽपक्षे । उषसा । पेपिशाने इति ।समानम् । योनिम् । अनु । सम् । चरेते इति । सूर्यपत्नी इति सूर्यऽपत्नी । सम् । चरत: । प्रजानती इति प्रऽजानती । केतुमती इति केतुऽमती । अजरे इति । भूरिऽरेतसा ॥९.१२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 9; मन्त्र » 12
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्म विद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (उषसा) उषा [प्रभात वेला] के साथ (पेपिशाने) अत्यन्त सुवर्ण वा रूप करती हुई, (छन्दःपक्षे) स्वतन्त्रता का ग्रहण करती हुईं दोनों (समानम्) एक (योनिम् अनु) घर [परमेश्वर] के पीछे-पीछे (सम् चरेते) मिलकर चलती हैं। (प्रजानती) [मार्ग] जानती हुई, (केतुमती) झण्डा रखती हुई [जैसे], (अजरे) शीघ्र चलनेवाली, (भूरिरेतसा) बड़ी सामर्थ्यवाली, (सूर्यपत्नी) सूर्य की दोनों पत्नियाँ [रात्रि और प्रभातवेलायें] (सम् चरतः) मिलकर विचरती हैं ॥१२॥

    भावार्थ

    उसी विराट् की महिमा से रात्रि और दिन विविध प्रकार संसार का उपकार करते हैं ॥१२॥

    टिप्पणी

    १२−(छन्दःपक्षे) छदि संवरणे-असुन्+पक्ष परिग्रहे-अच्। स्वेच्छया ग्रहीत्र्यौ (उषसा) प्रभातवेलया सह (पेपिशाने) ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश्। पा० ३।३।१२९। पिश अवयवे प्रकाशे-च। यङ्लुकि-चानश्। पेशो हिरण्यनाम-निघ० १।२, रूपनाम-निघ० ३।७। अत्यन्तं पेशो हिरण्यं रूपं वा कुर्वाणे (समानम्) सामान्यम् (योनिम्) गृहम्। परमेश्वरम् (अनु) अनुसृत्य (सम् चरेते) समस्तृतीयायुक्तात्। पा० १।३।५४। आत्मनेपदम्। मिलित्वा चरतः (सूर्यपत्नी) सूर्यस्य पत्न्यौ यथा रात्रिप्रभातवेले (सम्) सम्यक् (चरतः) विचरतः (प्रजानती) मार्गं ज्ञात्र्यौ (केतुमती) पताकावत्यौ तथा (अजरे) अजराः क्षिप्रनाम-निघ० २।१५। क्षिप्रगामिन्यौ (भूरिरेतसा) बहुवीर्यवत्यौ ॥

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    विषय

    वेदवाणी को अपनानेवाली प्रजाएँ

    पदार्थ

    १. उलिखित वेदवाणी गायत्री आदि छन्दों में है। इन (छन्दःपक्षे) = [पक्ष परिग्रहे] छन्दों का परिग्रह करनेवाली पुरुष व स्त्रीरूप प्रजाएँ (उषसा) = [उष दाहे] अपने दोषों को दग्ध करनेवाली और (पेपिशाने) = अपने रूप को अति सुन्दर बनानेवाली होती हैं। ये प्रजाएँ उस (समानम्) = [सम आनयति] सम्यक् प्राणित करनेवाले (योनिम्) = सबके उत्पत्तिस्थान प्रभु की (अनु) = ओर (संचरेते) = सम्यक् गतिवाली होती हैं। २. ये प्रजाएँ (सूर्यपत्नी) = ज्ञानसूर्य का अपने अन्दर रक्षण करनेवाली, प्रजानती प्रकृष्ट ज्ञानवाली, (केतुमती) = प्रशस्त बुद्धि-[intellect]-वाली (अजरे) = अजीर्ण शक्तिवाली व भूरितिसा-पालक व पोषक रेत:कणोंवाली होती हैं।

    भावार्थ

    वेदवाणी को अपनानेवालों के जीवन दाधदोष व सुन्दर बनते हैं। ये प्रभु की ओर गतिवाले होते हैं। अपने अन्दर ज्ञानसूर्य का उदय करते हुए ये ज्ञानी, बुद्धिमान, अजीर्ण व शक्तिशाली होते हैं।

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    भाषार्थ

    (पेपिशाने) प्रत्यवयव में रूपवती, (छन्दः पक्षे) छन्दरूपी पंखों वाली (उषसा) दो उषाएं (समानम्) एक (योनिम्) गृह में (अनु) निरन्तर (संचरेते) संचार करती हैं। (सूर्यपत्नी) ये दोनों सूर्य की पत्नियां, (प्रजानती) निजमार्ग को जानती हुईं, (केतुमती) मानो झण्डा ली हुईं, (अजरे) जरा रहित हुई, (भूरिरेतसा) प्रभूतशक्तिसम्पन्ना हुई, (संचरतः) इकट्ठी विचरती हैं।

    टिप्पणी

    [पेपिशाने = पिश अवयवे (तुदादिः), तथा 'पेशः रूपनाम" (निघं० ३।७)। १छन्दः पक्षे = स्वच्छन्दतारूपी पंखों वाली अर्थात् स्वतन्त्रता पूर्वक द्युलोक में उड़ने वाली पक्षीरूप दो उषाएं, प्रातःकालीन उषा तथा सायं कालीन उषा। अथवा छन्दः अर्थात् वेदमन्त्र, द्विविध वेदमन्त्रों सम्बन्धी दो उषाएं। उषा काल ध्यान का काल है। इन कालों में परमेश्वर का ध्यान करना होता है और द्विविध मन्त्र अर्थात् स्तुति और प्रार्थना सम्बन्धी मन्त्र मानो दो पंख हैं पक्षी के दो ही पंख होते हैं। उपासना के मन्त्र नहीं कहे, उपासना अर्थात् ध्यान में परमेश्वर के समीप बैठना "उप१ + आसना" के अधिकारी सभी मनुष्य नहीं होते। समीप बैठने में वे ही सशक्त हो सकते हैं जो कि निज चित्तवृत्तियों का निरोध कर सकते हैं। सर्व साधारण इस निःशक्त होते हैं। अतः वे केवल स्तुति और प्रार्थना ही कर सकते हैं। समान योनि है द्युलोक। इसी में दोनों उषाएं विचरती हैं। "योनिः गृहनाम" (निघं ३।४)। दोनों उषाएं सूर्य की पत्नी हैं। सूर्य के आगे-आगे चलती हैं और सायंकाल की उषाएं अर्थात् लालिमाएं सूर्य के अस्त होने के समनन्तर द्युलोक में कुछ काल तक चमकती हैं। इन का केतु अर्थात् झण्डा सूर्य ही प्रतीत होता है। ये अजरा हैं। इन पर बुढ़ापा नहीं आता, ये सदा शक्तिमती होती हैं। जब से सृष्टिरचना हुई है तब से निरन्तर द्युलोक में चमकती रही हैं, और जब तक सृष्टि रहेगी, ये निरन्तर चमकती रहेंगीं। अतः ये अजरा हैं]। [१. छन्दस्= wish, desire, Pleasure, Free will (आप्टे)। २. वस्तुतः "उप + आसना" चित्त की वह अवस्था है, जबकि उपासक परमेश्वर का साक्षात दर्शन करता हुआ, परमेश्वरीय आनन्दरस का आस्वादन कर रहा होता है। यह तल्लीनावस्था है। इस अवस्था में स्तुति और प्रार्थना दोनों का अभाव रहता है।]

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    विषय

    सर्वोत्पादक, सर्वाश्रय परम शक्ति ‘विराट’।

    भावार्थ

    (छन्दः-पक्षे) छन्दस् अर्थात् दिशा रूप पक्षों वाली (उषसा) दोनों उषाएं प्रातः और सायं (पेपिशाने) रूप से अपने को सजाती हुई (समानं योनिम् अनु) समान, एक ही स्थान को लक्ष्य करके (चरेते) आरही हैं। वे दोनों (सूर्य-पत्नी) सूर्य की स्त्रियों के समान, सूर्य से भी पालित रात्रि दिन (प्रजानती) सब मनुष्यों को काल का बोध कराती हुई (केतुमती) सब के ज्ञापक सूर्य को साथ लिये हुए (अजरे) कभी भी नाश न होने वाली (भूरि-रेतसा) बहुत वीर्यशाली सहस्रों प्राणियों को उत्पन्न करने वालीं (संचरतः) एक साथ ही विचरती हैं।

    टिप्पणी

    उषसा=दोनों उषाएं अर्थात् प्रातः सायं दोनों। छन्दपक्षे—छन्दांसि दिशः। श० ८। ३। १। १२॥ प्रजापतेर्वा एतान्यंगानि यच्छन्दांसि। ऐत० २। १८॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा काश्यपः सर्वे वा ऋषयो ऋषयः। विराट् देवता। ब्रह्मोद्यम्। १, ६, ७, १०, १३, १५, २२, २४, २६ त्रिष्टुभः। २ पंक्तिः। ३ आस्तारपंक्तिः। ४, ५, २३, २४ अनुष्टुभौ। ८, ११, १२, २२ जगत्यौ। ९ भुरिक्। १४ चतुष्पदा जगती। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Virat Brahma

    Meaning

    Day and Night, free and beautiful of form, consorts of the sun, shining with golden light of the morning and evening dawn, alternate and go round their common centre and origin. Unaging, abundant powerful, with their distinctive flag, they go together in their orbit without missing their mark.

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    Translation

    The two dawns, with metres as their wings, richly adorning themselves, move towards their common abode; these two spouses of the Sun move on together, with good understanding, full of light, ever-unfading and very prolific.

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    Translation

    Both the dawns having the four directions as their wings and shining with red luster move together in the space which is the common abode of them. Both unwasting like the wives of the sun possessing ample power, giving the signal of sunrise and sun-set and telling the people of day and night move together.

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    Translation

    Both morning and evening rich in beauty, independently move on together to their common dwelling. Day and Night, two wives of the sun knowing their path, rich in light, unwasting, most prolific move together.

    Footnote

    Wives of the Sun: Sustained and nourished by the Sun, as wives are by the husband. Common dwelling: The Sun. Most prolific: Day and Night give birth to thousands of creatures.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १२−(छन्दःपक्षे) छदि संवरणे-असुन्+पक्ष परिग्रहे-अच्। स्वेच्छया ग्रहीत्र्यौ (उषसा) प्रभातवेलया सह (पेपिशाने) ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश्। पा० ३।३।१२९। पिश अवयवे प्रकाशे-च। यङ्लुकि-चानश्। पेशो हिरण्यनाम-निघ० १।२, रूपनाम-निघ० ३।७। अत्यन्तं पेशो हिरण्यं रूपं वा कुर्वाणे (समानम्) सामान्यम् (योनिम्) गृहम्। परमेश्वरम् (अनु) अनुसृत्य (सम् चरेते) समस्तृतीयायुक्तात्। पा० १।३।५४। आत्मनेपदम्। मिलित्वा चरतः (सूर्यपत्नी) सूर्यस्य पत्न्यौ यथा रात्रिप्रभातवेले (सम्) सम्यक् (चरतः) विचरतः (प्रजानती) मार्गं ज्ञात्र्यौ (केतुमती) पताकावत्यौ तथा (अजरे) अजराः क्षिप्रनाम-निघ० २।१५। क्षिप्रगामिन्यौ (भूरिरेतसा) बहुवीर्यवत्यौ ॥

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