अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 94/ मन्त्र 1
आ या॒त्विन्द्रः॒ स्वप॑ति॒र्मदा॑य॒ यो धर्म॑णा तूतुजा॒नस्तुवि॑ष्मान्। प्र॑त्वक्षा॒णो अति॒ विश्वा॒ सहां॑स्यपा॒रेण॑ मह॒ता वृष्ण्ये॑न ॥
स्वर सहित पद पाठआ । या॒तु॒ । इन्द्र॑: । स्वऽप॑ति: । मदा॑य । य: । धर्म॑णा । तू॒तु॒जा॒न: । तुवि॑ष्मान् ॥ प्र॒ऽत्व॒क्षा॒ण: । अति॑ । विश्वा॑ । सहां॑सि । अ॒पा॒रेण॑ । म॒ह॒ता । वृष्ण्ये॑न ॥९४.१॥
स्वर रहित मन्त्र
आ यात्विन्द्रः स्वपतिर्मदाय यो धर्मणा तूतुजानस्तुविष्मान्। प्रत्वक्षाणो अति विश्वा सहांस्यपारेण महता वृष्ण्येन ॥
स्वर रहित पद पाठआ । यातु । इन्द्र: । स्वऽपति: । मदाय । य: । धर्मणा । तूतुजान: । तुविष्मान् ॥ प्रऽत्वक्षाण: । अति । विश्वा । सहांसि । अपारेण । महता । वृष्ण्येन ॥९४.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 94; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(स्वपतिः) समग्रैश्वर्यों का पति परमेश्वर (मदाय) उपासकों की प्रसन्नता और तृप्ति के लिए (आ यातु) हम उपासकों में प्रकट हो। (यः) जो परमेश्वर (तुविष्मान्) बहुविध पदार्थों का स्वामी है, वह (धर्मणा) वैदिक धर्म के द्वारा (तूतुजानः) हमारा पालन कर रहा है। वह (अपारेण) असीम (महता) और महान् (वृष्ण्येन) सामर्थ्य द्वारा (विश्वा) सब (सहांसि) पराभवकारी राग-द्वेष और तज्जन्य बुराइयों का (अति प्रत्वक्षाणः) अत्यन्त और पूर्ण विनाश करता है, या उन्हें तनूकृत कर देता है।
टिप्पणी -
[तूतुजानः=तुजि पालने+कानच्। त्वक्ष्=तनूकरणे।]