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अथर्ववेद > काण्ड 7 > सूक्त 73

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 73/ मन्त्र 3
    सूक्त - अथर्वा देवता - घर्मः, अश्विनौ छन्दः - जगती सूक्तम् - धर्म सूक्त

    स्वाहा॑कृतः॒ शुचि॑र्दे॒वेषु॑ य॒ज्ञो यो अ॒श्विनो॑श्चम॒सो दे॑व॒पानः॑। तमु॒ विश्वे॑ अ॒मृता॑सो जुषा॒णा ग॑न्ध॒र्वस्य॒ प्रत्या॒स्ना रि॑हन्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स्वाहा॑ऽकृत: । शुचि॑: । दे॒वेषु॑ । य॒ज्ञ: । य: । अ॒श्विनो॑: । च॒म॒स॒: । दे॒व॒ऽपान॑: । तम् । ऊं॒ इति॑ । विश्वे॑ । अ॒मृता॑स: । जु॒षा॒णा: । ग॒न्ध॒र्वस्य॑ । प्रति॑ । आ॒स्ना । रि॒ह॒न्ति॒ ॥७७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स्वाहाकृतः शुचिर्देवेषु यज्ञो यो अश्विनोश्चमसो देवपानः। तमु विश्वे अमृतासो जुषाणा गन्धर्वस्य प्रत्यास्ना रिहन्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स्वाहाऽकृत: । शुचि: । देवेषु । यज्ञ: । य: । अश्विनो: । चमस: । देवऽपान: । तम् । ऊं इति । विश्वे । अमृतास: । जुषाणा: । गन्धर्वस्य । प्रति । आस्ना । रिहन्ति ॥७७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 73; मन्त्र » 3

    भावार्थ -
    (यज्ञः) यज्ञस्वरूप, आत्मस्वरूप (शुचिः) सब तामस आवरणों से रहित होकर (देवेषु) विषयों में क्रीड़ाशील इन्द्रियों, विद्वानों, द्विव्य पदार्थों या अन्य प्राणों के भीतर (स्वाहा-कृतः) स्वयम् अपनी शक्ति से प्रविष्ट होकर विराजमान है। (यः) जो आत्मा (अश्विनोः) अश्वि = प्राण और अपान दोनों को (चमसः) शक्ति प्राप्त करने या अन्नरस के भोजन का साधन है वही (देव-पानः) देव इन्द्रियों के रक्षा करने वाला है। (विश्वे) समस्त (अमृतासः) अमर आत्मा (तम् उ) उसकी ही (जुषाणाः) सेवा करते हुए (गन्धर्वस्य) गौ वेद वाणी को धारण करने हारे परमात्मा के (आस्ना) मुख अर्थात् मुखवत् ब्राह्मणों के हेतु उनके उपदेशों द्वारा (प्रति-हन्ति) परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा ऋषिः। अश्विनौ देवते। धर्मसूक्तम्। १, ४, ६ जगत्यः। २ पथ्या बृहती। शेषा अनुष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्।

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