अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 73/ मन्त्र 9
सूक्त - अथर्वा
देवता - घर्मः, अश्विनौ
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - धर्म सूक्त
जुष्टो॒ दमू॑ना॒ अति॑थिर्दुरो॒ण इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमुप॑ याहि वि॒द्वान्। विश्वा॑ अग्ने अभि॒युजो॑ वि॒हत्य॑ शत्रूय॒तामा भ॑रा॒ भोज॑नानि ॥
स्वर सहित पद पाठजुष्ट॑: । दमू॑ना: । अति॑थि: । दु॒रो॒णे । इ॒मम् । न॒: । य॒ज्ञम् । उप॑ । या॒हि॒ । वि॒द्वान् । विश्वा॑: । अ॒ग्ने॒ । अ॒भि॒ऽयुज॑: । वि॒ऽहत्य॑ । श॒त्रु॒ऽय॒ताम् । आ । भ॒र॒ । भोज॑नानि ॥७७.९॥
स्वर रहित मन्त्र
जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्। विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्य शत्रूयतामा भरा भोजनानि ॥
स्वर रहित पद पाठजुष्ट: । दमूना: । अतिथि: । दुरोणे । इमम् । न: । यज्ञम् । उप । याहि । विद्वान् । विश्वा: । अग्ने । अभिऽयुज: । विऽहत्य । शत्रुऽयताम् । आ । भर । भोजनानि ॥७७.९॥
अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 73; मन्त्र » 9
विषय - ब्रह्मानन्द रस।
भावार्थ -
(दमूना:) जितेन्द्रिय, जितचित्त (अतिथिः) अतिथि के समान पूजायोग्य, सर्वत्र शरीर में शक्ति रूप से व्यापक या निरन्तर गतिशील, ज्ञानवान्, (दुरोणे) देहरूप गृह में, (जुष्टः) अति प्रसन्न, अपने कर्म-फलों को करने द्वारा आत्मा (नः) हमारे, हम इन्द्रियगण के (इमं यज्ञम्) इस यज्ञको, परस्पर संगत हुए प्राणों के परस्पर आदानप्रतिदानमय व्यवस्थित जीवनमय यज्ञ को (उप याहि) प्राप्त हो। हे (अग्ने) सबके अग्रणी ! सेनापति या राजा जिस प्रकार परन्तप होकर (विश्वाः) समस्त (अभि-युजः) आक्रमणकारी सेनाओं को (विहत्य) विनाश करके (शत्रूयताम्) अपना बल नाश करने वाले, अपने पर आक्रमणकारी शत्रुओं के (भोजनानि) भोजन सामग्री को छीनकर अपने लोगों को ला देता है, उसी प्रकार हे आत्मन् ! तू (विश्वाः) समस्त (अभियुजः) प्रत्यक्ष रूपसे इन्द्रियों से योग करने हारे पदार्थों को (वि-हत्य) प्राप्त कर उनको अपने अधीन करके (शत्रूयताम्) अपने शत्रु के समान ‘त्वं’ कारास्पद, आत्मा से भिन पदार्थों के (भोजनानि) भोग योग्य फलों को प्राप्त कर, और हम इन्द्रियों के निमित्त प्राप्त करा। इन्द्रियगण का आत्मा के प्रति वचन है। प्रजा या सेनानायक का अपने सेनापति या राजा के प्रति वचन भी स्पष्ट है। आत्मा के अतिथि आदि नाम उपनिषद् में स्पष्ट कहे हैं।
टिप्पणी -
हंसः शुचिषद् वसुरन्तरिक्षसद् होता वेदिषद् अतिथिर्दुरोणसत्॥ (क० उप० वल्ली ४। क०२)
“अस्या ऋग्वेदे वसुश्रुत आभेय ऋषिः॥”
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा ऋषिः। अश्विनौ देवते। धर्मसूक्तम्। १, ४, ६ जगत्यः। २ पथ्या बृहती। शेषा अनुष्टुभः। एकादशर्चं सूक्तम्।
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