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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 129 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 129/ मन्त्र 8
    ऋषिः - परुच्छेपो दैवोदासिः देवता - इन्द्र: छन्दः - स्वराट्शक्वरी स्वरः - धैवतः

    प्रप्रा॑ वो अ॒स्मे स्वय॑शोभिरू॒ती प॑रिव॒र्ग इन्द्रो॑ दुर्मती॒नां दरी॑मन्दुर्मती॒नाम्। स्व॒यं सा रि॑ष॒यध्यै॒ या न॑ उपे॒षे अ॒त्रैः। ह॒तेम॑स॒न्न व॑क्षति क्षि॒प्ता जू॒र्णिर्न व॑क्षति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रऽप्र॑ । वः॒ । अ॒स्मे इति॑ । स्वय॑शःऽभिः । ऊ॒ती । प॒रि॒ऽव॒र्गे । इन्द्रः॑ । दुः॒ऽम॒ती॒नाम् । दरी॑मन् । दुः॒ऽम॒ती॒नाम् । स्व॒यम् । सा । रि॒ष॒यध्यै॒ । या । नः॒ । उ॒प॒ऽई॒षे । अ॒त्रैः । ह॒ता । ई॒म् । अ॒स॒त् । न । व॒क्ष॒ति॒ । क्षि॒प्ता । जू॒र्णिः । न । व॒क्ष॒ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रप्रा वो अस्मे स्वयशोभिरूती परिवर्ग इन्द्रो दुर्मतीनां दरीमन्दुर्मतीनाम्। स्वयं सा रिषयध्यै या न उपेषे अत्रैः। हतेमसन्न वक्षति क्षिप्ता जूर्णिर्न वक्षति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रऽप्र। वः। अस्मे इति। स्वयशःऽभिः। ऊती। परिऽवर्गे। इन्द्रः। दुःऽमतीनाम्। दरीमन्। दुःऽमतीनाम्। स्वयम्। सा। रिषयध्यै। या। नः। उपऽईषे। अत्रैः। हता। ईम्। असत्। न। वक्षति। क्षिप्ता। जूर्णिः। न। वक्षति ॥ १.१२९.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 129; मन्त्र » 8
    अष्टक » 2; अध्याय » 1; वर्ग » 17; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनर्मनुष्याः किं कृत्वा कीदृशा भवेयुरित्याह ।

    अन्वयः

    हे मित्राणि वोऽस्मे इन्द्रो दुर्मतीनां परिवर्गे दुर्मतीनां दरीमंश्च स्वयशोभिरूती प्रप्र वक्षति या सेना न उपेषेऽत्रैः क्षिप्ता सा रिषयध्यै प्रवृत्ता स्वयमीं हतासत् किन्तु सा जूर्णिर्न न वक्षति ॥ ८ ॥

    पदार्थः

    (प्रपा) अत्र पादपूरणाय द्वित्वम्। निपातस्य चेति दीर्घः। (वः) युष्मभ्यम् (अस्मे) अस्मभ्यम् (स्वयशोभिः) स्वकीयाभिः प्रशंसाभिः (ऊती) ऊत्या रक्षया (परिवर्गे) परितः सर्वतः सम्बन्धे (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् (दुर्मतीनाम्) दुष्टानां मनुष्याणाम् (दरीमन्) अतिशयेन विदारणे। अत्रान्येषामपि दृश्यत इत्युपधादीर्घः। सुपामिति सप्तम्या लुक्। (दुर्मतीनाम्) दुष्टाचारिणां मनुष्याणाम् (स्वयम्) (सा) (रिषयध्यै) रिषयितुम् (या) सेना (नः) अस्मान् (उपेषे) (अत्रैः) अतन्तीत्याततायिनस्तान् गच्छन्तीत्यत्राः शत्रवस्तैः (हता) (ईम्) सर्वतः (असत्) भवेत् (न) निषेधे (वक्षति) उच्यात् (क्षिप्ता) प्रेरिता (जूर्णिः) शीघ्रकारिणी (न) इव (वक्षति) प्राप्ता भवतु ॥ ८ ॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। ये दुष्टसङ्गं विहाय सत्सङ्गेन कीर्त्तिमन्तो भूत्वाऽतिप्रशंसितसेनया प्रजा रक्षन्ति ते स्वैश्वर्य्या जायन्ते ॥ ८ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर मनुष्य क्या करके कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे मित्रो ! (वः) तुम लोगों के लिये (अस्मे) और हमारे लिये (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् विद्वान् (दुर्मतीनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले दुष्ट मनुष्यों के (परिवर्गे) सब ओर से सम्बन्ध में और (दुर्मतीनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले दुराचारी मनुष्यों के (दरीमन्) अतिशय कर विदारने में (स्वयशोभिः) अपनी प्रशंसाओं और (ऊती) रक्षा से (प्रप्र, वक्ष्यति) उत्तमता से उपदेश करे (या) जो सेना (नः) हम लोगों के (उपेषे) समीप आने के लिये (अत्रैः) आततायी शत्रुजनों ने (क्षिप्ता) प्रेरित की अर्थात् पठाई हो (सा) वह (रिषयध्यै) दूसरों को हनन कराने के लिये प्रवृत्त हुई (स्वयम्) आप (ईम्) सब ओर से (हता) नष्ट (असत्) हो किन्तु वह (जूर्णिः) शीघ्रता करनेवाली के (न) समान (न)(वक्षति) प्राप्त हो अर्थात् शीघ्रता करने ही न पावे किन्तु तावत् नष्ट हो जावे ॥ ८ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो दुष्टों के सङ्ग को छोड़ सत्सङ्ग से कीर्त्तिमान् होकर अतीव प्रशंसित सेना से प्रजा की रक्षा करते हैं, वे उत्तम ऐश्वर्य्यवाले होते हैं ॥ ८ ॥

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    विषय

    प्रभु का यशोगान व दुष्टों के जाल में न फंसना

    पदार्थ

    १. (इन्द्रः) = शत्रुओं के विद्रावक प्रभु (अस्मे) = हमारे लिए (वः) = तुम्हारे लिए, अर्थात् सबके लिए (स्वयशोभिः) = अपने यशों से युक्त (ऊत्ती) = [ऊतिभिः] रक्षणों से (दुर्मतीनाम्) = दुष्ट बुद्धिवालों के (परिवर्गे) = दूर करने में, दूर ही क्या इन (दुर्मतीनाम्) = दुष्ट बुद्धिवालों के (दरीमन्) = विदारण करने में (प्र प्र) = खूब ही समर्थ होते हैं । प्रभु दुर्मति पुरुषों को हमसे दूर करते हैं और इस प्रकार वे हमारी रक्षा करते हैं । इन दुर्मति पुरुषों से बचने का उपाय ('स्वयशोभिः') = इस शब्द से संकेतित हो रहा है । जब हम प्रभु के यशस्वी कार्यों का स्मरण करते हैं तब वह प्रभु का गुणगान ही हमें इन दुर्मति पुरुषों के आक्रमण से बचाता है । २. प्रभु का यशोगान करने पर (अत्रैः) = औरों का भक्षण करने के स्वभाववाले दुष्ट पुरुषों से (नः उपेषे) = हमें प्राप्त करने के लिए (या) = जो (जूर्णिः) = प्रतिपक्षियों को जीर्ण करनेवाली सेना (क्षिप्ता) = प्रेरित की जाती है (सा) = वह (स्वयम्) = अपने आप (रिषयध्यै) = हिंसा के लिए होती है, नष्ट हो जाती है । वह (ईम्) = निश्चय से (हता असत्) = नष्ट हो जाती है और (न वक्षति) = हमें प्राप्त नहीं होती (न वक्षति) = सचमुच प्राप्त नहीं होती । प्रभु का गुणगान चलने पर दुष्टों के दुष्ट विचार व दुष्टाचार हम पर आक्रमण नहीं कर पाते ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु का स्मरण करने पर हम संसार में दुर्मति पुरुषों के जाल में फंसने से बच जाते हैं ।

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    विषय

    विद्वान् पुरुषों के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे विद्वान् पुरुषो और मित्र वर्गो ! ( इन्द्रः ) ऐश्वर्यवान् शत्रु विनाशक सेनापति ( स्वयशोभिः ) अपने यशों, यशकारी पराक्रम के कामों से ( वः अस्मे ) तुम्हारे और हमारे दोनों के ( ऊती ) रक्षा के लिये और ( दुर्मतीनां परिवर्गे ) दुष्ट मतिवाले पुरुषों के विनाश करने के के लिये और ( दुर्मतीनां ) दुष्टाचार वाले दुर्दमनीय मनुष्यों के ( दरीमन् ) तोड़ फोड़ने के लिये ( प्रप्र असत् ) अच्छी प्रकार समर्थ हो । (या) जो ( जूर्णिः न जूर्णिः ) ज्वर या जरा के समान जीवन का नाश करदेने वाली सेना ( अत्त्रैः ) भोगों के समान पतन के कारण, प्रजाजनों को खा जाने वाले शत्रु पुरुषों से ( नः रिषयध्यै ) हमारे विनाश कर देने के लिये ( उपेषे ) भेजा जावे ( सा स्वयं ) वह स्वयं अपने ही आप ( हता ईम् असत् ) विनाश को प्राप्त हो । वह ( क्षिप्ता ) परास्त होकर (न वक्षति) हम तक न पहुंचे और ( न वक्षति ) लौट कर अपने देश भी न पहुंचे ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    परुच्छेप ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः—१, २ निचृदत्यष्टिः । ३ विराडत्यष्टिः । ४ अष्टिः । ६, ११ भुरिगष्टिः । १० निचृष्टि: । ५ भुरिगतिशक्वरी ७ स्वराडतिशक्वरी । ८, ९ स्वराट् शक्वरी । एकादशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे दुष्टांची संगत सोडून सत्संगाने कीर्तिमान बनतात व अत्यंत प्रशंसनीय सेनेद्वारे प्रजेचे रक्षण करतात ते उत्तम ऐश्वर्यवान होतात. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, lord of power and glory, by his own power and honour, is all for your protection and ours, and he is all out for the total destruction of the men of evil mind and intention. And may that force which is sent by our enemies for our destruction never reach us, but be routed on way as if destroyed of itself even if it is inspired and moved at the fastest speed. (It must be prevented and destroyed on the way itself by defence missiles).

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should men become and by doing what is taught in the 8th Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    o friends, Indra (Commander of the army) is powerful in overcoming the male-volent by his self-glorifying protections, granted unto you and unto us. He is the tearer of the malevolent and the wicked into pieces. The impetuous host that is sent against us by devouring foes to destroy us, has been itself destroyed. It will not reach us, it will not do us any harm.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (परिवर्गे) परितः सर्वत: सम्बन्धे = In contact from all sides. (दरीमन् ) अतिशयेन विदारणे प्रत्र अन्येषामपि दृश्यत इत्युपधा दीर्घ: सुपांसुलुक इति सप्तम्या लुक = In the act of tearing the foes. (अत्रैः ) अतन्तीत्याततायिनः तान् गच्छनतीत्यत्रा: शत्रवस्तैः = By enemies. (जूर्णि:) क्षिप्रकारिणी = Active.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those persons become exceedingly prosperous, who having given up the association of the wicked, keeping company with righteous persons, get good reputation and protect the people with most admirable army.

    Translator's Notes

    जूर्णिरिति क्षिप्रनाम (निघ० ३.२.१५) दरीमन् is from दृ-विदारणे ।

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