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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 102 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 102/ मन्त्र 3
    ऋषिः - मुद्गलो भार्म्यश्वः देवता - द्रुघण इन्द्रो वा छन्दः - निचृद्बृहती स्वरः - मध्यमः

    अ॒न्तर्य॑च्छ॒ जिघां॑सतो॒ वज्र॑मिन्द्राभि॒दास॑तः । दास॑स्य वा मघव॒न्नार्य॑स्य वा सनु॒तर्य॑वया व॒धम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒न्तः । य॒च्छ॒ । जिघां॑सतः । वज्र॑म् । इ॒न्द्र॒ । अ॒भि॒ऽदास॑तः । दास॑स्य । वा॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । आर्य॑स्य । वा॒ । स॒नु॒तः । य॒व॒य॒ । व॒धम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अन्तर्यच्छ जिघांसतो वज्रमिन्द्राभिदासतः । दासस्य वा मघवन्नार्यस्य वा सनुतर्यवया वधम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अन्तः । यच्छ । जिघांसतः । वज्रम् । इन्द्र । अभिऽदासतः । दासस्य । वा । मघऽवन् । आर्यस्य । वा । सनुतः । यवय । वधम् ॥ १०.१०२.३

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 102; मन्त्र » 3
    अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (मघवन्-इन्द्र) विजय करानेवाले विद्युद्रूप अग्नि ! (जिघांसतः) हनन करने की इच्छा रखनेवाले के (अभिदासतः) सामने आकर क्षीण करनेवाले के (वज्रम्) शस्त्रास्त्र (अन्तः-यच्छ) अपने अधीन कर (दासस्य वा) स्वराष्ट्र में आश्रय पाते हुए के या (आर्यस्य वा) बाहर देश से आये हुए के (वधम्) हिंसासाधन को (सनुतः-यवय) अन्तर्हित विलीन कर या पृथक्-पृथक् चूर-चूर कर ॥३॥

    भावार्थ

    मारने की इच्छा रखनेवाले सामने से आकर क्षीण करनेवाले के शस्त्रास्त्र को अपने अधीन कर तथा स्वदेश में बसनेवाले स्वाधीन के या स्वतन्त्र देश में बसनेवाले शत्रु के वधसाधन को विलीन करना-क्षीण करना चाहिये ॥३॥

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    विषय

    त्रिगुणातीत

    पदार्थ

    [१] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् (इन्द्र) = शत्रु विनाशक प्रभो! (जिघांसतः) = हमारे हनन की कामना करते हुए (अभिदासतः) = [ दसु उपक्षये] हमारा (उपक्षय) = विनाश करनेवाले वासनारूप शत्रु के (वज्रम्) = वज्र को (अन्तः यच्छ) = बीच में ही रोकनेवाले होइये । इस शत्रु का हमारे पर आक्रमण न हो पाये। [२] (दासस्य वा) = चाहे हमें नष्ट करनेवाले दास का (वधम्) = हनन साधन आयुध हो (वा) = अथवा (आर्यस्य) = श्रेष्ठ का (सनुतः) = अन्तर्हित रूप में प्रभुज्यमान आयुध हो उसे (यवय) = हमारे से पृथक् करिये। 'तमस् व रजस्' यदि दास हैं तो 'सत्त्व' आर्य है । 'तमस्' प्रमाद, आलस्य व निद्रा के द्वारा आक्रमण करता है और रजस्, लोभ व तृष्णा के द्वारा आक्रमण करता है । सत्त्वगुण भी ज्ञान व सुख के द्वारा हमें बाँधता है। प्रभु की कृपा से हम इन सब बन्धनों से ऊपर उठें, त्रिगुणातीत बनें। रजस् व तमस् से ऊपर उठने के लिए सत्त्व को अपनाएँ और इस प्रकार नित्य सत्त्वस्थ होकर अन्ततः सत्त्वगुण से भी ऊपर उठें।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम दासरूप तमस् व रजस् के तथा आर्यरूप सत्व के बन्धन से ऊपर उठें।

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    विषय

    वीर पुरुष का रक्षा का कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे (इन्द्र) ऐश्वर्यशालिन ! शत्रु को नाश करने हारे ! (जिघांसतः) मारना चाहने वाले (अभिदासतः) नाश करने वाले शत्रु के (अन्तः) भीतर तू अपने (वज्रम्) बल वीर्य को वा शस्त्र बल को (यच्छ) स्थापित कर। हे (मघवन्) ऐश्वर्यवन् ! (दासस्य वा आर्यस्य वा) अपने सेवक और श्रेष्ठ पुरुष के (सनुतः) सदा गूढ रूप से किये (वधम्) नाशकारी वध-प्रयोग को (यवय) दूर कर। अथवा—(दासस्य आर्यस्य) नाशकारी और चढ़ाई करने योग्य शत्रु के वधकारी शस्त्र वा घातक प्रयोग को हम से दूर कर।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्मुद्गलो भार्म्यश्वः॥ देवता—द्रुघण इन्द्रो वा॥ छन्दः- १ पादनिचृद् बृहती। ३, १२ निचृद् बृहती। २, ४, ५, ९ निचृत् त्रिष्टुप्। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। ७, ८, १० विराट् त्रिष्टुप्। ११ पादनिचृत् त्रिष्टुप्।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (मघवन्-इन्द्र) हे विजयप्रद विद्युद्रूपाग्ने ! (जिघांसतः-अभिदासतः) हन्तुमिच्छतः-अभिक्षयं कुर्वतः (वज्रम्-अन्तः-यच्छ) शस्त्रास्त्रं स्वाधीने वशे नय (दासस्य वा-आर्यस्य वा वधम्) स्वराष्ट्रे खल्वाश्रयो दीयते यस्मै तस्य बहिर्देशतः प्राप्तस्य च शत्रुभूतस्य वधसाधनं शस्त्रम् (सनुतः-यवय) अन्तर्हितं विलीनं पृथक् पृथक् कणशश्चूर्णय “सनुतर्निर्णीतान्तर्हितनाम” [निघ० ३।२५] ॥३॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Indra, lord of glory, ruling soul of the human system, blunt, revert and recycle the weapons of hate and enmity of the violent who destroy and enslave the spirit of love and freedom. Whether the weapon of negativity belongs to a destroyer or a dynamic person, always turn it off from negativity and re-employ the energy for positive good.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    मारण्याची इच्छा करणाऱ्यांच्या व समोरून येऊन क्षीण करणाऱ्याच्या शस्त्रास्त्रांना आपल्या अधीन करून स्वदेशात निवास करणाऱ्या किंवा स्वतंत्र देशात वसणाऱ्या शत्रूंच्या हिंसक साधनांना क्षीण केले पाहिजे. ॥३॥

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