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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 102 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 102/ मन्त्र 8
    ऋषिः - मुद्गलो भार्म्यश्वः देवता - द्रुघण इन्द्रो वा छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    शु॒नम॑ष्ट्रा॒व्य॑चरत्कप॒र्दी व॑र॒त्रायां॒ दार्वा॒नह्य॑मानः । नृ॒म्णानि॑ कृ॒ण्वन्ब॒हवे॒ जना॑य॒ गाः प॑स्पशा॒नस्तवि॑षीरधत्त ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    शु॒नम् । अ॒ष्ट्रा॒ऽवी । अ॒च॒र॒त् । क॒प॒र्दी । व॒र॒त्रायाम् । दारु॑ । आ॒ऽनह्य॑मानः । नृ॒म्नानि॑ । कृ॒ण्वन् । ब॒हवे॑ । जना॑य । गाः । प॒स्प॒शा॒नः । तवि॑षीः । अ॒ध॒त्त॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    शुनमष्ट्राव्यचरत्कपर्दी वरत्रायां दार्वानह्यमानः । नृम्णानि कृण्वन्बहवे जनाय गाः पस्पशानस्तविषीरधत्त ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    शुनम् । अष्ट्राऽवी । अचरत् । कपर्दी । वरत्रायाम् । दारु । आऽनह्यमानः । नृम्नानि । कृण्वन् । बहवे । जनाय । गाः । पस्पशानः । तविषीः । अधत्त ॥ १०.१०२.८

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 102; मन्त्र » 8
    अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 21; मन्त्र » 2
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (वरत्रायाम्) विद्युत् वाली डोरी में (दारु) काष्ठ से (आनह्यमानः) भलीभाँति बन्ध जानेवाला (कपर्दी) कुत्सित शब्दकारी-भयड्कर ध्वनि करनेवाला (अष्ट्रावी) दष्ट्रावाला-डाढ के समान चक्र की कीलियोंवाला (शुनम्-अचरत्) सुख से गति करता है (बहवे जनाय) बहुजन समूह को ले जाने के लिये (नृम्णानि) बलों को (कृण्वन्) करने के हेतु (गाः) रश्मियों-तरङ्गों को (पस्पशानः) बाँधता हुआ-संयुक्त करता हुआ (तविषीः) बलों को (अधत्त) धारण करता है-प्रवृत्त करता है ॥८॥

    भावार्थ

    वृषभाकृति यान विद्युत् की डोरी में काष्ठ जैसे साधन द्वारा बान्धकर भयङ्कर घोष करता हुआ डाढ़ों के समान लोह कीलवाले चक्रवाला भलीभाँति चलता है, विद्युत् तरङ्गों के योग से बल प्रदर्शित करता हुआ ॥८॥

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    विषय

    प्रभु-भक्त के लक्षण

    पदार्थ

    [१] (अष्टावी) = चाबुकवाला, व्रतरूप प्रतोद से इन्द्रियरूप गौवों को हाँकनेवाला, (कपर्दी) = [क- पर्+द] सुख की पूर्ति को देनेवाला, अर्थात् अधिक से अधिक औरों के जीवनों को सुखी बनानेवाला व्यक्ति (शुनम्) = उस सुखस्वरूप प्रभु की ओर (व्यचरत्) = विशेषरूप से चलनेवाला होता है। प्रभु को प्राप्त करनेवाला [क] इन्द्रियों को व्रतों के बन्धन में बाँधना है तथा [ख] औरों के लिए सुख को प्राप्त कराने का प्रयत्न करता है । [२] [ग] यह दारु - इस अन्ततः विदीर्ण करने योग्य शरीर को (दारु) = 'दृ', शरीर = शृ] (वरत्रायाम्) = व्रतरज्जु में (आनह्यमानः) = समन्तात् बाँधनेवाला होता है । इन व्रतों के बन्धनों के बिना उच्छृंखल क्रियाओंवाला यह शरीर उन्नति का साधन नहीं होता । [३] [घ] यह प्रभु-भक्त (बहवे जनाय) = बहुत लोगों के लिए (नृम्णानि कृण्वन्) = धनों व सुखों को करनेवाला होता है । धनों का उपभोग स्वयं अकेले में नहीं कर लेता, यह औरों के साथ बाँट करके ही धनों का उपभोग करता है । यह इस बात को अच्छी तरह समझता है कि 'केवलाघो भवति केवलादी' । [४] [ङ] (गाः पस्पशान:) = यह ज्ञान की वाणियो का देखनेवाला होता है और (तविषीः) = बलों को (अधत्त) = धारण करता है। ज्ञान और बल का अपने जीवन में समन्वय करके चलता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्रभु-भक्त के लक्षण निम्न हैं- [क] जितेन्द्रियता, [ख] औरों को सुखी करने का प्रयत्न, [ग] शरीर को व्रत बन्धनों में बाँधना, [घ] सबके साथ बाँट करके खाना, [ङ] स्वाध्यायशीलता, [च] शक्ति सम्पन्न | - धैवतः ॥

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    विषय

    सर्वव्यापक सर्वप्रबन्धक प्रभु।

    भावार्थ

    (कपर्दी) सुख से जगत् भर को पूर्ण करने वाला महान् सामर्थ्य वाला, (अष्ट्रावी) व्यापक शक्तिमान् होकर (वरत्रायाम्) सर्वोत्तम रक्षाकारक शक्ति में (दारू) छिन्न भिन्न होने वाले जगत् को (आनह्यमानः) सब प्रकार से बांधता हुआ, (शुनम् अचरत्) सुखपूर्वक व्याप रहा है। वह (बहवे जनाय) बहुतसे उत्पन्न होने वाले जीवों के सुखार्थ (नृम्णानि) मनुष्यों के चाहने योग्य अनेक ऐश्वर्यों को उत्पन्न करता हुआ, (पस्पशानः) जगत् को अध्यक्षवत् देखता हुआ (तविषी गाः अधत्त) अनेक बलवती संञ्चालक शक्तियों को धारण करता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिर्मुद्गलो भार्म्यश्वः॥ देवता—द्रुघण इन्द्रो वा॥ छन्दः- १ पादनिचृद् बृहती। ३, १२ निचृद् बृहती। २, ४, ५, ९ निचृत् त्रिष्टुप्। ६ भुरिक् त्रिष्टुप्। ७, ८, १० विराट् त्रिष्टुप्। ११ पादनिचृत् त्रिष्टुप्।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (वरत्रायां दारु-आनह्यमानः) वैद्युतरज्ज्वां काष्ठेनाबध्यमानः (कपर्दी-अष्ट्रावी) कमुदकमिव पर्दः कुत्सितः शब्दो घोषोऽस्येति कपर्दी शब्दकारी अष्ट्रावी-द्रष्ट्रावी ‘दकारलोपश्छान्दसः’ द्रष्ट्रावच्चक्रकीलवान् (शुनम्-अचरत्) सुखं चलति-सुखेन गच्छति (बहवे जनाय) बहुजनसमूहं नेतुं (नृम्णानि कृण्वन्) बलानि “नृम्णं बलनाम” [निघ० २।९] कुर्वन्-करिष्यतीति हेतोः (गाः-पस्पशानः) रश्मीन् बध्नन्निव “पस्पशानः पस्पाशयमानः” [निरु० १०।२०] (तविषीः-अधत्त) बलतरङ्गान् “तविषी बलनाम” [निघं० २।९] धारयति ॥८॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    The dynamic disciplined soul, Indra, insulated within the circuitous energies of the self by inviolable control of the fluctuations of mind, moves on happily on way to spiritual progress, and similarly the self- disciplined leader and ruler, concentrating on social welfare against outer disturbances, creating many positive gifts for all people, watching his personal actions and movements of society, bears and commands the strength and glory of the nation.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    विद्युत दोरीने लाकडाच्या साधनांद्वारे बांधून वृषभाकृती यान भयंकर आवाज करत दाढेप्रमाणे लोखंडाचे खिळे बसविलेले असून, ते चांगल्या प्रकारे चालते व विद्युत तरंगाच्या योगाने बल प्रदर्शित करते. ॥८॥

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