ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 107/ मन्त्र 6
ऋषिः - दिव्यो दक्षिणा वा प्राजापत्या
देवता - दक्षिणा तद्दातारों वा
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
तमे॒व ऋषिं॒ तमु॑ ब्र॒ह्माण॑माहुर्यज्ञ॒न्यं॑ साम॒गामु॑क्थ॒शास॑म् । स शु॒क्रस्य॑ त॒न्वो॑ वेद ति॒स्रो यः प्र॑थ॒मो दक्षि॑णया र॒राध॑ ॥
स्वर सहित पद पाठतम् । ए॒व । ऋषि॑म् । तम् । ऊँ॒ इति॑ । ब्र॒ह्माण॑म् । आ॒हुः॒ । य॒ज्ञ॒ऽन्य॑म् । सा॒म॒ऽगाम् । उ॒क्थ॒ऽशास॑म् । सः । शु॒क्रस्य॑ । त॒न्वः॑ । वे॒द॒ । ति॒स्रः । यः । प्र॒थ॒मः । दक्षि॑णया । र॒राध॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्यं सामगामुक्थशासम् । स शुक्रस्य तन्वो वेद तिस्रो यः प्रथमो दक्षिणया रराध ॥
स्वर रहित पद पाठतम् । एव । ऋषिम् । तम् । ऊँ इति । ब्रह्माणम् । आहुः । यज्ञऽन्यम् । सामऽगाम् । उक्थऽशासम् । सः । शुक्रस्य । तन्वः । वेद । तिस्रः । यः । प्रथमः । दक्षिणया । रराध ॥ १०.१०७.६
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 107; मन्त्र » 6
अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 4; मन्त्र » 1
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अष्टक » 8; अध्याय » 6; वर्ग » 4; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(यः प्रथमः) जो प्रमुख दानी (दक्षिणया रराध) दक्षिणादान द्वारा विद्वान् की कामना को साधता है, सिद्घ करता है (तम् एव) उसको ही (ऋषिम्) मनुष्यों में सम्यग् द्रष्टा (तम्-उ) उसे ही (ब्रह्माणम्) यज्ञ में प्रधान ऋत्विक् (यजन्युम्) यज्ञ के नेता अध्वर्यू (सामगाम्) साम के गायक उद्गाता (उक्थशासम्) ऋग्मन्त्र का शंसन करनेवाला होता (आहुः) कहते हैं, क्योंकि उसकी दक्षिणा देने से ये सब यज्ञ का विस्तार करते हैं (सः) वह (शुक्रस्य) प्रकाशमान परमात्मा की (तिस्रः-तन्वः) “अ, उ, म्” इन तीन मात्रारूप देहों को (वेद) जानता है, क्योंकि उसके आदेश से यथायोग्य पात्र में दक्षिणा देता है ॥६॥
भावार्थ
जो यजमान यज्ञ में दक्षिणा देकर विद्वान् की कामना को पूरा करता है, मानो वह यज्ञ का ब्रह्मा है, अध्वर्यु है, उद्गाता है, होता है, उसकी दक्षिणा द्वारा ही ये चारों त्विज् यज्ञ का कार्य करते हैं। वह ऐसा दानी ‘ओम्’ नाम के परमात्मा की अवस्थाओं को जो अ, उ, म् एवं इति मात्राएँ कहलाती हैं, उन्हें जानता है, जानने में समर्थ होता है ॥६॥
विषय
दान से यज्ञों का साधन
पदार्थ
[१] (यः) = जो (प्रथमः) = [प्रथ विस्तारे] अपने हृदय को अत्यन्त विशाल बनाता हुआ (दक्षिणया) = दानवृत्ति से (रराध) = सिद्धि को प्राप्त करता है, दान के द्वारा सब अशुभों को दूर करके शुभों को सिद्ध करता है। (तं एव) = उसको ही (ऋषिं आहुः) = ऋषि कहते हैं 'ऋष गतौ' सब कार्यों का करनेवाला जानते हैं। [२] यज्ञ में सब ऋत्विजों के कार्य इसकी दानवृत्ति से ही परिपूर्ण होते हैं । सो तं उ उस दानी पुरुष को ही (ब्रह्माणम्) = ब्रह्मा कहते हैं, उसी को (यज्ञन्यम्) = यज्ञ का चलानेवाला 'अध्वर्यु' कहते हैं, (सामगाम्) = उसी को साम का गायन करनेवाला 'उद्गाता' जानते हैं और उसी को (उक्थशासम्) = उक्थों का [ शस्त्रों का] शंसन करनेवाला 'होता' कहते हैं। यह दानी ही 'ब्रह्मा, अध्वर्यु, उद्गाता व होता' है । [३] (सः) = वह दानी (शुक्रस्य) = उस ज्योतिर्मय प्रभु की (तिस्रः तन्वः वेद) = तीनों शरीरों को जानता है। प्रभु कृपा से इसके शरीर रूप पृथिवीलोक में तेजस्विता के रूप में अग्नितत्त्व होता है। इसके हृदयान्तरिक्ष में प्रसन्नता के रूप में चन्द्र का निवास होता है और इसके मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान सूर्य का उदय होता है ।
भावार्थ
भावार्थ - दानी ही सब यज्ञों को सिद्ध करता है। यह प्रभु कृपा से शरीर में अग्नि को, हृदय में चन्द्र को व मस्तिष्क में सूर्य को प्राप्त करता है।
विषय
दक्षिणादाता के प्रतिष्ठा-पद।
भावार्थ
(यः) जो (प्रथमः) सब से प्रथम, सर्वश्रेष्ठ पुरुष (दक्षिणया) अन्न आदि बल, उत्साहजनक पदार्थ से (रराध) सब को अपने वश करता है, (सः) वह (शुक्रस्य) कान्तियुक्त, शीघ्र कार्य कराने में समर्थ, और शुद्ध पवित्र शुक्र के (तिस्रः तन्वः) तीन रूपों को (वेद) जानता, या प्राप्त करता है। (तम् एव) उसको ही (ऋषिम् आहुः) ऋषि, तत्वार्थदर्शी बतलाते हैं (तम् ब्रह्माणम् आहुः) उसको ही ब्रह्मा, महान् शक्तिमान्, स्वामी कहते हैं। (तम् उ यज्ञ-न्यं) उसको ही यज्ञ का नेता, (साम-गाम्) साम का गान करने वाला, सब के प्रति शान्तिदायक, समानतायुक्त वचन का उपदेश देने वाला और उसको ही (उक्थ-शासम्) उत्तम वेद वचनों का शासक या उपदेष्टा कहते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्दिव्य आंगिरसो दक्षिणा वा प्राजापत्या॥ देवता—दक्षिणा, तद्दातारो वा॥ छन्द:– १, ५, ७ त्रिष्टुप्। २, ३, ६, ९, ११ निचृत् त्रिष्टुपु। ८, १० पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ४ निचृञ्जगती॥ एकादशर्चं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(यः प्रथमः) यः प्रथमः सन् (दक्षिणया रराध) दक्षिणादानेन विदुषः कामनां साध्नोति, (तम्-एव ऋषिम्) तं हि खल्वृषिं मानवानां सम्यग् द्रष्टारं (तम्-उ ब्रह्माणम्) तमेव यज्ञे ब्रह्माणं प्रधानर्त्विजं (यज्ञन्यम्) यज्ञस्य नेतारमध्वर्युं (सामगाम्) साम्नां गायकमुद्गातारम् (उक्थशासम्) उक्थमृग्मन्त्रं शंसतीति-होतारम् “ऋचः प्रणवः-उक्थशंसिनम्” [तै० ३।२।९।६] (आहुः) कथयन्ति यतस्तस्य दक्षिणादानेन खल्वेते सर्वे यज्ञं तन्वन्ति, (सः) स एव (शुक्रस्य तिस्रः-तन्वः-वेद) प्रकाशमानस्य-परमात्मनः-‘अ-उ-म्’ इति मात्रा तिस्रः-वेदपदादेशेन यथायोग्यं पात्रेभ्यो दक्षिणां प्रयच्छति ॥६॥
इंग्लिश (1)
Meaning
He alone they call Rshi, the seer, Brahma, presiding priest of yajna, Adhvaryu, prime organiser, Samaga, singer of Saman hymns, and Ukthashasa, scholar specialist of the Rks, and he alone is the knower of immaculate divinity, who has first realised the three mantras of Aum, three branches of Veda, Rk, Yajuh and Sama, three orders of yajnic fire, Agni, Vayu and Aditya, and who has first fulfilled the basic part and pre-requisite of yajna, Dakshina.
मराठी (1)
भावार्थ
जो यजमान यज्ञात दक्षिणा देऊन विद्वानाची कामना पूर्ण करतो. तो जणू यज्ञाचा ब्रह्मा आहे. अध्वर्यु, उद्गाता, होता आहे. त्याच्या दक्षिणेद्वारेच हे चारही ऋत्विज यज्ञाचे कार्य करतात. असा दानीच ‘ओम्’ नावाच्या परमात्म्याच्या अवस्थांना, ज्या अ, उ, म् मात्रा म्हणविल्या जातात. त्यांना जाणतो. जाणण्यास समर्थ होतो. ॥६॥
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