ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 159/ मन्त्र 2
ऋषिः - शची पौलोमी
देवता - शची पौलोमी
छन्दः - निचृदनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
अ॒हं के॒तुर॒हं मू॒र्धाहमु॒ग्रा वि॒वाच॑नी । ममेदनु॒ क्रतुं॒ पति॑: सेहा॒नाया॑ उ॒पाच॑रेत् ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒हम् । के॒तुः । अ॒हम् । मू॒र्धा । अ॒हम् । उ॒ग्रा । वि॒ऽवाच॑नी । मम॑ । इत् । अनु॑ । क्रतु॑म् । पतिः॑ । से॒हा॒नायाः॑ । उ॒प॒ऽआच॑रेत् ॥
स्वर रहित मन्त्र
अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचनी । ममेदनु क्रतुं पति: सेहानाया उपाचरेत् ॥
स्वर रहित पद पाठअहम् । केतुः । अहम् । मूर्धा । अहम् । उग्रा । विऽवाचनी । मम । इत् । अनु । क्रतुम् । पतिः । सेहानायाः । उपऽआचरेत् ॥ १०.१५९.२
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 159; मन्त्र » 2
अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 17; मन्त्र » 2
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अष्टक » 8; अध्याय » 8; वर्ग » 17; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(अहं केतुः) मैं घर में गृहज्ञान को चेतानेवाली हूँ (अहं मूर्धा) मैं परिवार में मूर्धा के समान मान्य हूँ (अहम्-उग्रा विवाचनी) मैं तेजस्वी तथा विशिष्ट मधुरभाषिणी हूँ (मम सेहानायाः-इत्) मुझ सहनशीला के ही (अनुक्रतुं पतिः-उपाचरेत्) संकल्प के अनुसार पति व्यवहार करता है ॥२॥
भावार्थ
विदुषी गुणवती स्त्री को अपनी विद्वत्ता और गुणवत्ता पर विश्वास या गर्व होना चाहिए, घर में सब मेरे संकेत पर चलते हैं, पति भी मेरे संकल्प के अनुसार व्यवहार करता है, ऐसे कहनेवाली नारी सौभाग्यशालिनी है ॥२॥
विषय
आदर्श माता
पदार्थ
[१] माता कहती है कि (अहं केतुः) = मैं ज्ञानवाली बनती हूँ। (अहं मूर्धा) = मैं अपने क्षेत्र में शिखर [top most ] घर पहुँचने का प्रयत्न करती हूँ। (अहं उग्रा) = मैं तेजस्विनी बनती हूँ । (विवाचनी) = प्रभु के नामों का विशेषरूप से उच्चारण करनेवाली होती हूँ। मस्तिष्क में ज्ञान, मन में शिखर पर पहुँचने की भावनावाली तथा शरीर में तेजवाली, प्रभु के नाम का सदा जप करनेवाली माता ही आदर्श है । [२] (सेहानायाः) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं का पराभव करनेवाली (मम) = मेरे (क्रतुं अनु) = संकल्प के अनुसार (इत्) = ही (पतिः) = मेरे पति उपाचरेत् कार्यों को करनेवाले हों। पत्नी तेजस्विनी व शान्त स्वभाववाली हो, क्रोध आदि से सदा दूर हो। इसके विचारों के अनुसार ही पति कार्यों को करते हैं । इस प्रकार पति-पत्नी का समन्वय होने पर ही उत्तम सन्तान हुआ करते हैं।
भावार्थ
भावार्थ- आदर्श माता में 'ज्ञान- शिखर पर पहुँचने की भावना, तेज व प्रभु स्मरण की वृत्ति' होनी चाहिये। इस पत्नी को पति की अनुकूलता प्राप्त होती है और ये उत्तम सन्तानों को प्राप्त करते हैं ।
विषय
सेना और स्त्री का आत्मपति-वरण और उद्योग-उत्साहयुक्त भाव। दोनों के पतियों के कर्त्तव्य।
भावार्थ
(अहं केतुः) मैं ध्वजा के समान यश-वैभव को बतलाने वाली, एवं ज्ञानयुक्त और (अहं मूर्धा) मैं सिर के समान आदरणीय और मूल आश्रय को धारण करने वाली, (अहम्) मैं (उग्रा) बलवती, शत्रु को भय देने वाली (वि-वाचनी) विविध वचनों को बोलने और पालन करने वाली होऊं। (मम सेहानायाः) शत्रु का विजय करने वाली मेरे ही (क्रतुम् अनु) कर्म वा इच्छा, संकल्प के अनुकूल (पतिः उप आ चरेत्) मेरा पालक पति कार्य करे। इसी प्रकार स्त्री भी ज्ञान वाली, गृहस्थ में शिरोमणि, उत्तम वाणी युक्त, साक्षर, सहनशील हो, पति उसके मन के अनुकूल कर्म करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः शची पौलोमी॥ देवता—शची पौलोमी॥ छन्दः–१–३, ५ निचृदनुष्टुप्। ४ पादनिचृदनुष्टुप्। ६ अनुष्टुप्॥ षडृचं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(अहं केतुः) गृहेऽहं केतयित्री गृहज्ञानस्य सूचयित्री (अहं मूर्धा) अहं परिवारे मूर्धा, मूर्धेव मान्याऽस्मि (अहम्-उग्रा विवाचनी) अहं तेजस्विनी तथा विशिष्टमधुरभाषिणी (मम सेहानायाः-इत्-अनुक्रतुं पतिः-उपाचरेत्) मम सहनशीलायाः साफल्यमनु खल्वेव पतिः-उपाचरति ॥२॥
इंग्लिश (1)
Meaning
I am my own refulgence, I am the one on top, I am the passion and the fire. I speak and I must have the response. I am the challenger, my master would surely know my acts and intentions positively and would respond favourably.
मराठी (1)
भावार्थ
विदुषी गुणवती स्त्रीला आपली विद्वत्ता व गुणवत्तेवर विश्वास किंवा गर्व असला पाहिजे. घरात सर्व जण माझ्या संकेतानुसार चालतात, माझे म्हणणे मान्य करतात. पतीही माझ्या संकल्पानुसार वागतो, असे म्हणणारी नारी सौभाग्यशालिनी असते. ॥२॥
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