ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 31/ मन्त्र 2
परि॑ चि॒न्मर्तो॒ द्रवि॑णं ममन्यादृ॒तस्य॑ प॒था नम॒सा वि॑वासेत् । उ॒त स्वेन॒ क्रतु॑ना॒ सं व॑देत॒ श्रेयां॑सं॒ दक्षं॒ मन॑सा जगृभ्यात् ॥
स्वर सहित पद पाठपरि॑ । चि॒त् । मर्तः॑ । द्रवि॑णम् । म॒म॒न्या॒त् । ऋ॒तस्य॑ । प॒था । न॒म॒सा । वि॒वा॒से॒त् । उ॒त । स्वेन॑ । क्रतु॑ना । सम् । व॒दे॒त॒ । श्रेयां॑सम् । दक्ष॑म् । मन॑सा । ज॒गृ॒भ्या॒त् ॥
स्वर रहित मन्त्र
परि चिन्मर्तो द्रविणं ममन्यादृतस्य पथा नमसा विवासेत् । उत स्वेन क्रतुना सं वदेत श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात् ॥
स्वर रहित पद पाठपरि । चित् । मर्तः । द्रविणम् । ममन्यात् । ऋतस्य । पथा । नमसा । विवासेत् । उत । स्वेन । क्रतुना । सम् । वदेत । श्रेयांसम् । दक्षम् । मनसा । जगृभ्यात् ॥ १०.३१.२
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 31; मन्त्र » 2
अष्टक » 7; अध्याय » 7; वर्ग » 27; मन्त्र » 2
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अष्टक » 7; अध्याय » 7; वर्ग » 27; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(मर्तः-द्रविणं परिचित्-ममन्यात्) मनुष्य ज्ञानधन की सब ओर से कामना करे (ऋतस्य पथा मनसा विवासेत्) अमृत अर्थात् मोक्ष के मार्ग से अपने अन्तःकरण अर्थात् श्रद्धा से उसे सेवन करे (उत स्वेन क्रतुना सं वदेत) और अपने प्रज्ञान से-चिन्तन से विचार करे (श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्) श्रेष्ठ बल अर्थात् आत्मबल को मनोभाव से पकड़े ॥२॥
भावार्थ
ज्ञानधन जहाँ से भी मिले ले लेना चाहिये और उसका सबसे अधिक सदुपयोग मोक्षमार्ग में लगाना है। वह मानव का श्रेष्ठ बल है ॥२॥
विषय
यज्ञार्थ - धन
पदार्थ
[१] (मर्तः) = मनुष्य (परिचित्) = सब ओर से ही, अर्थात् पूर्ण पुरुषार्थ से (द्रविणम्) = धन को (ममन्यात्) = [कामयेत्] चाहे । धन की कामना तो करे, परन्तु (ऋतस्य पथा) = ऋत के मार्ग से ही धन को कमाने की अभिलाषा करे। धन को कमाता हुआ (नमसा) = नमन के द्वारा (विवासेत्) = उस प्रभु की परिचर्या करे। यह प्रभु स्मरण उसे अन्याय मार्ग से धन कमाने से रोकेगा। 'अग्ने नय सुपथा राये, भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम'। [२] (उत) = और इस प्रकार प्रभु स्मरण के साथ न्याय्य मार्ग से धनों को कमाता हुआ यह व्यक्ति (स्वेन क्रतुना) = अपने यज्ञों के साथ (संवदेत) = संवादवाला हो । अपने जीवन को यह यज्ञमय बनाये। धनों का विनियोग यह यज्ञों में ही करे। [३] इन यज्ञों को करता हुआ यह (मनसा) = मन से (श्रेयांसम्) = अतिशयेन कल्याणकर (दक्षम्) = प्रवृद्ध उस प्रभु को (जगृभ्यात्) = ग्रहण करे । यज्ञों को करते हुए, मन से प्रभु स्मरण करना इसलिए आवश्यक है कि हम उन यज्ञों के अहंकारवाले न हो जाएँ। यह प्रभु स्मरण हमें कल्याण को प्राप्त करानेवाला होगा तथा सब प्रकार से हमारी वृद्धि का कारण बनेगा, श्रेयान् = [दक्ष] ।
भावार्थ
भावार्थ- हम धन कमायें। धनों का विनियोग यज्ञों में करें। उन यज्ञों को प्रभु कृपा से होता हुआ जानकर अहंकारवाले न हों।
विषय
गुरु-शुश्रूषा और मनोदमन, वाग्-दमन श्रेष्ठ कर्म का उपदेश।
भावार्थ
(मर्त्तः) मनुष्य (परि चित् द्रविणं) चारों ओर दौड़ने वाले मन को धन के तुल्य (ममन्यात्) स्तम्भित करे, वश करे और (नमसा) विनय, सत्कारपूर्वक (ऋतस्य) सत्य ज्ञान के मार्ग से (आ विवासेत्) बड़ों की परिचर्या शुश्रूषा करे। (उत) और (स्वेन क्रतुना) अपने उत्तम ज्ञान से (सं वदेत) सम्यक प्रकार बोले, ज्ञानपूर्वक भाषण करे। और (श्रेयांसं दक्षं) सर्वश्रेष्ठ कर्म को (मनसा जगृभ्यात्) मन से स्वीकार करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
कवष ऐलूष ऋषिः॥ विश्वे देवा देवताः॥ छन्द:-१, ८ निचृत् त्रिष्टुप्। २, ४,५, ७, ११ त्रिष्टुप्। ३, १० विराट् त्रिष्टुप्। ६ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ६ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप् ॥ एकादशर्चं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(मर्तः द्रविणं परि चित्-ममन्यात्) मनुष्यो ज्ञानधनं सर्वतोऽपि कामयेत (ऋतस्य पथा मनसा विवासेत्) अमृतस्य-मोक्षस्य “ऋतममृतमित्याह” [जै०२।१६] मार्गेण स्वान्तःकरणेन श्रद्धया सेवेत (उत स्वेन क्रतुना संवदेत) अपि स्वकीयेन प्रज्ञानेन “क्रतुः प्रज्ञानाम” [निघं०३।९] विचारयेत् (श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्) श्रेष्ठमात्मबलं मनसा-मनोभावेन गृह्णीयात् ॥२॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Let mortal man love and desire wealth, honour and excellence in the comprehensive context of the world and divinity, shine and refine it with faith and reverence by the path of truth and universal law, speak of it, think and define it with his own conscience in communion with divinity, and then, with his own mind and soul, realise the high degree of expertise, vision and perfection of thought, action and achievement for himself. (Divinity, humanity, nature, the world around, these are the context of our success and achievement.)
मराठी (1)
भावार्थ
ज्ञानधन जिथून मिळेल तिथून घेतले पाहिजे व त्याचा सर्वांत चांगला उपयोग ते मोक्षमार्गात खर्चले पाहिजे. तेच मानवाचे श्रेष्ठ बल आहे. ॥२॥
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