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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 49 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 49/ मन्त्र 6
    ऋषिः - इन्द्रो वैकुण्ठः देवता - इन्द्रो वैकुण्ठः छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    अ॒हं स यो नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं॒ सं वृ॒त्रेव॒ दासं॑ वृत्र॒हारु॑जम् । यद्व॒र्धय॑न्तं प्र॒थय॑न्तमानु॒षग्दू॒रे पा॒रे रज॑सो रोच॒नाक॑रम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒हम् । सः । यः । नव॑ऽवास्त्वम् । बृ॒हत्ऽर॑थम् । सम् । वृ॒त्राऽइ॑व । दास॑म् । वृ॒त्र॒ऽहा । अरु॑जम् । यत् । व॒र्धय॑न्तम् । प्र॒थय॑न्तम् । आ॒नु॒षक् । दू॒रे । पा॒रे । रज॑सः । रो॒च॒ना । अक॑रम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहं स यो नववास्त्वं बृहद्रथं सं वृत्रेव दासं वृत्रहारुजम् । यद्वर्धयन्तं प्रथयन्तमानुषग्दूरे पारे रजसो रोचनाकरम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहम् । सः । यः । नवऽवास्त्वम् । बृहत्ऽरथम् । सम् । वृत्राऽइव । दासम् । वृत्रऽहा । अरुजम् । यत् । वर्धयन्तम् । प्रथयन्तम् । आनुषक् । दूरे । पारे । रजसः । रोचना । अकरम् ॥ १०.४९.६

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 49; मन्त्र » 6
    अष्टक » 8; अध्याय » 1; वर्ग » 8; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (अहं सः) मैं वह परमात्मा हूँ, जो (वृत्रहा) पाप का नाशक (वृत्रा-इव दासम्-अरुजम्) पापों को जैसे नष्ट करता हूँ, वैसे उपक्षय करनेवाले कामभाव को नष्ट करता हूँ, उस ऐसे को (यः-नववास्त्वं बृहद्रथं सम्) जो मेरे अन्दर नव आयुवाले वसने योग्य ब्रह्मचारी के तथा महद्रमणकारी संन्यासी के योगी के अन्दर प्रवेश करके क्षीण करता है (यत्) जो (वर्धयन्तं प्रथयन्तम्-आनुषक्) शरीर में बढ़ते हुए ब्रह्मचारी को ज्ञान में विस्तार पाते हुए संन्यासी को लिप्त हो जाता है, उसको (रजसः-रोचना दूरे पारे-अकरम्) रञ्जनात्मक लोक अर्थात् शरीर से दूर तथा प्रकाशमान-ज्ञानप्रकाशमय मन से पार करता हूँ-पृथक् करता हूँ-हटाता हूँ ॥६॥

    भावार्थ

    जो ब्रह्मचारी परमात्मा की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्यसेवन करता है और जो संन्यासी परमात्मा में रमण करता है, उनके अन्दर प्रविष्ट कामभाव को परमात्मा ऐसे हटाता है कि ब्रह्मचारी के शरीर की वृद्धि होती चली जाये और संन्यासी के मन में ज्ञान की वृद्धि होती चली जाये ॥६॥

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    विषय

    सर्वतारक प्रभु।

    भावार्थ

    (सः) वह जो (अहम्) मैं (वृत्रहा) समस्त विघ्नों का नाश करने वाला, अज्ञान को दूर करने वाला हूं। वह मैं (नव-वास्त्वम्) नव गृह वाले, नये ही मेरे पास बसने वाले, (बृहद्रथं) महान् ब्रह्म वा वेद ज्ञान में रमण करने वाले, (दास) सेवक के समान सेवा-शुश्रूषा करने वाले को (अरुजम् अकरम्) पीड़ारहित सुखी कर देता हूं। और (आनुषक्) समीप (दूरे) और दूर (वर्धयन्तम् प्रथयन्तम्) ज्ञान और कीर्ति बढ़ाते और फैलाते हुए को (रजसः पारे) रजोगुण से भी पार, वा इस लोक से भी पार (रोचना अकरम्) अति तेजस्वी, सर्वप्रिय बना देता हूं। तरा देने से इसी कारण गुरु को ‘तीर्थ’ कहते हैं। अथवा—नये गृहों के स्वामी, बड़े रथवान् को भी, यदि वह (दासं) प्रजा का नाशकारी है तो उसको (अरुजम्) तोड़ डालता हूं। (रजसः प्रथयन्तं वर्धयन्तं) इस लोक में वाणियों को बढ़ाने वा फैलाने वाले को मैं दूर वा पास सर्वत्र सर्वप्रिय बना देता हूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    इन्द्र वैकुण्ठ ऋषिः। देवता—वैकुण्ठः। छन्द:- १ आर्ची भुरिग् जगती। ३, ९ विराड् जगती। ४ जगती। ५, ६, ८ निचृज्जगती। ७ आर्ची स्वराड् जगती। १० पादनिचृज्जगती। २ विराट् त्रिष्टुप्। ११ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। एकादशर्चं सूक्तम्॥

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    विषय

    नववास्त्व बृहद्रथ दास का हनन

    पदार्थ

    [१] प्रभु कहते हैं कि (अहम्) = मैं (सः) = वह हूँ (यः) = जो (वृत्रहा) = वृत्र का नाश करनेवाला होता हुआ (वृत्रेव) = वृत्र की तरह ही (नववास्त्वम्) = नौ महलोंवाले [ वास्तु - polace] (बृहद्रथम्) = बड़ी-बड़ी कारोंवाले (दासम्) = औरों का उपक्षय करनेवाले को (सं अरुजम्) = पूर्णतया नष्ट करता हूँ । आसुर वृत्तिवाले लोग अन्याय से अर्थ का संचय करके अपने आराम के लिये बड़ी-बड़ी कोठियाँ बना लेते हैं, बड़ी-बड़ी कारें रख लेते हैं, ये अपने सुख भोग के लिए औरों का क्षय करते हैं । इन दस्यु वृत्तिवाले लोगों को प्रभु नष्ट करते हैं । [२] (यद्) = जब यह दस्यु वृत्तिवाला व्यक्ति (आनुषक्) = निरन्तर (वर्धयन्तम्) = अपने धनों व सुख-साधनों को बढ़ाता चलता है, (प्रथयन्तम्) = अपने को फैलाता चलता है, तो मैं उसे रोचना (रजसः) = [रोचनस्य रजसः] चमकते हुए लोक के दूरे (पारे अकरम्) = दूर पार कर देता हूँ । देदीप्यमान लोकों से दूर करके इसे मैं 'असुर्यानाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः'=अन्धतमस से आवृत असुर्यलोकों को प्राप्त करानेवाला होता हूँ। [३] मनुष्य अन्धाधुन्ध धन तो अन्याय से ही कमा पाता है। यह अन्याय्य धन थोड़ी देर के लिये उसके जीवन में चहल- पहल को पैदा कर देता है। फिर प्रभु इसे समाप्त कर देते हैं और अन्धकारमय लोकों में जन्म देते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ- न तो हम अन्याय से धन कमाएँ और नांही उस धन को विलास में व्ययित करें ।

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (अहं सः) अहं परमात्मा सोऽस्मि (वृत्रहा) पापनाशकः “पाप्मा वै वृत्रः” [श० ११।१।५।७] (वृत्रा-इव दासम्-अरुजम्) वृत्राणि यथा पापानि यथा नाशयामि तथा दासमुपक्षयकर्त्तारं कामं नाशयामि, कथम्भूतं दासं नाशयामि-उच्यते (यः-नववास्त्वं बृहद्रथं सम्) मयि नववास्तव्यं ब्रह्मचारिणं महद्रमणकारिणं संन्यासिनं योगिनं संविशति संविश्य क्षयं करोति (यत्) यतः (वर्धयन्तं प्रथयन्तम्-आनुषक्) शरीरे वर्धयन्तं ब्रह्मचारिणं मज्ज्ञाने प्रथमानमनुषक्तोऽनुलिप्तोऽस्ति तम् (रजसः रोचना दूरे पारे-अकरम्) लोकात्-लोकनीयशरीरात् दूरे तथा प्रकाशमानात्-ज्ञानप्रकाशमयान्मनसः पारे करोमि ॥६॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    I am that who, like breaking of the cloud, destroy the evil tendencies of body and mind extending to new areas like epidemics expanding and covering large terrilories, and thus I am that who throw away for all time all that sin and darkness which would otherwise go on rising and expanding in effect and intensity.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो ब्रह्मचारी परमात्म्याच्या प्राप्तीसाठी ब्रह्मचर्याचे पालन करतो व जो संन्यासी परमात्म्यामध्ये रमण करतो. त्यांच्यातील काम भाव परमात्मा असा दूर करतो, की ब्रह्मचाऱ्याच्या शरीराची वृद्धी होत राहावी व संन्याशाच्या मनात ज्ञानाची वृद्धी होत राहावी. ॥६॥

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