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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 69 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 69/ मन्त्र 5
    ऋषिः - सुमित्रो वाध्र्यश्चः देवता - अग्निः छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    भवा॑ द्यु॒म्नी वा॑ध्र्यश्वो॒त गो॒पा मा त्वा॑ तारीद॒भिमा॑ति॒र्जना॑नाम् । शूर॑ इव धृ॒ष्णुश्च्यव॑नः सुमि॒त्रः प्र नु वो॑चं॒ वाध्र्य॑श्वस्य॒ नाम॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भव॑ । द्यु॒म्नी । वा॒ध्रि॒ऽअ॒श्व॒ । उ॒त । गो॒पाः । मा । त्वा॒ । ता॒री॒त् । अ॒भिऽमा॑तिः । जना॑नाम् । शूरः॑ऽइव । घृ॒ष्णुः । च्यव॑नः । सु॒ऽमि॒त्रः । प्र । नु । वो॒च॒म् । वाध्रि॑ऽअश्वस्य । नाम॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भवा द्युम्नी वाध्र्यश्वोत गोपा मा त्वा तारीदभिमातिर्जनानाम् । शूर इव धृष्णुश्च्यवनः सुमित्रः प्र नु वोचं वाध्र्यश्वस्य नाम ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भव । द्युम्नी । वाध्रिऽअश्व । उत । गोपाः । मा । त्वा । तारीत् । अभिऽमातिः । जनानाम् । शूरःऽइव । घृष्णुः । च्यवनः । सुऽमित्रः । प्र । नु । वोचम् । वाध्रिऽअश्वस्य । नाम ॥ १०.६९.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 69; मन्त्र » 5
    अष्टक » 8; अध्याय » 2; वर्ग » 19; मन्त्र » 5
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (वाध्र्यश्य) हे मुझ जितेन्द्रियवाले संयमी अथवा देहबन्धन करानेवाली वासनाओं में पड़े हुए के स्तुति करने योग्य परमात्मन् ! तू (द्युम्नी गोपाः-भव) मेरे लिए अध्यात्मधनवाला तथा रक्षक हो (जनानाम्-अभिमातिः-अतारीत्) उत्पन्न हुओं की अभिमन्यता-नास्तिकभावना तुझे बाधित न करे (शूरः-इव) तू प्रतापी वीरसमान (धृष्णुः) विरोधियों का दबानेवाला है (च्यवनः) हमारा प्रेरक है (सुमित्रः) शोभनमित्रयुक्त (वाध्र्यश्वस्य नाम नु प्रवोचम्) मुझ जितेन्द्रिय अथवा वासना में बँधे हुए का स्तोतव्य परमात्मन् ! तेरे महत्त्वपूर्ण नाम की मैं स्तुति करता हूँ-प्रशंसा करता हूँ ॥५॥

    भावार्थ

    मानव चाहे जितेन्द्रिय हो या वासना में बँधा हुआ हो, प्रत्येक अवस्था में उसका स्तुत्य देव परमात्मा है, वही रक्षक है। मनुष्य संसार में उत्पन्न होकर अभिमान कर बैठते हैं, नास्तिक बन जाते हैं, परन्तु वे परमात्मा के ईश्वरत्व को मिटा नहीं सकते, किन्तु उसके अधीन कर्मफलों को भोगते हैं। उसका महत्त्वपूर्ण स्वरूप समरण करने योग्य है ॥५॥

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    विषय

    राजा के कर्त्तव्य।

    भावार्थ

    हे (वाध्र्यश्व) जितेन्द्रिय, एवं तेज, बलशाली अन्नादि साधनों से सम्पन्न पुरुषों के बीच में उत्पन्न एवं प्रतिष्ठित राजन् ! प्रभो ! तू (द्युम्नी) महान् ऐश्वर्य का स्वामी (भव) हो। (उत) और (गोपा) तू समस्त राष्ट्रैश्वर्य का रक्षक और भूमि का पालक हो। (अभि-मातिः) अभिमानी और सब ओर प्रजाओं का हिंसक शत्रु पुरुष (त्वा मा तारात्) तुझ तक प्राप्त न हो, तुझे न नाश करे, तुझे पराजित न करे। तू (जनानां) समस्त जनों का (शूरः इव) शूरवीर के समान (धृष्णुः) सब का धर्षण, पराजय करने वाला और (च्यवनः) सब में व्यापक, सब का सञ्चालक और (सु-मित्रः) सबका सुखदायी, शोभन स्नेही और सत्संगी हो। मैं (वध्रि-अश्वस्य) तुझ सूर्यवत् वेगवान् गतिशील पदार्थों के स्वामी का (नाम प्र नु वोचम्) नाम और स्वरूप का सदा प्रवचन, उपदेश अन्यों को करूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    सुमित्रो वाध्र्यश्वः॥ अग्निर्देवता॥ छन्दः- १ निचृज्जगती। २ विराड् जगती। ३, ७ त्रिष्टुप्। ४, ५, १२ निचृत् त्रिष्टुप्। ६ आर्ची स्वराट् त्रिष्टुप्। ८, १० पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ९, ११ विराट् त्रिष्टुप्॥ द्वादशर्चं सूक्तम॥

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    विषय

    द्युम्नी गोपा

    पदार्थ

    [१] वाध्र्यश्व हे संयम रज्जु से इन्द्रियाश्वों को बाँधनेवाले पुरुष ! (द्युम्नी भवा) = तू ज्योतिर्मय हो । इन्द्रियों के संयम से तेरी ज्ञान की ज्योति चमके । (उत) = और (गोपाः) = इन्द्रियों व वेदवाणियों का तू रक्षक हो । इन्द्रियों को स्वस्थ बनाकर तू ज्ञानवाणियों का रक्षण करनेवाला बन । ऐसा बन जाने पर (जनानाम्) = सामन्यतः सब लोगों के अन्दर आ जानेवाली (अभिमातिः) = अभिमान की वृत्ति (त्वा मा तारीत्) = तुझे हिंसित करनेवाली न हो। द्युम्नी व गोपा बन जाने का तुझे अभिमान न हो जाए। [२] (शूरः इव) = जैसे एक शूर पुरुष संग्राम में शत्रुओं का धर्षण करनेवाला होता है, इसी प्रकार तू (धृषणुः) = काम-क्रोधादि शत्रुओं का धर्षक हो । (च्यवनः) = [च्यु to couse to go away] कामादि शत्रुओं का दूर भगानेवाला तू (सुमित्रः) = बड़ी उत्तमता से रोगों व पापों से अपने को बचानेवाला हो। [३] सुमित्र बन करके यह निश्चय कर कि मैं (वाध्यश्वस्य) = संयमी पुरुष को प्राप्त होनेवाले प्रभु के [ वध्र्यश्वस्य अयं वाथ्र्यश्वः ] (नाम) = नाम को (नु) = निश्चय से (प्रवोचम्) = प्रकर्षेण उच्चारित करूँ, मैं प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाला बनूँ, प्रभु को ही अपने संयम आदि गुणों का कारण समझँ । तभी तो मैं उनके अभिमान से बच सकूँगा ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम ज्योतिवाले व जितेन्द्रिय बनें। पर इन उत्तमताओं को प्रभु कृपा से होता हुआ जावें, और इनका गर्व न करें। ,

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (वाध्र्यश्व) हे मम नियन्त्रितेन्द्रियाश्ववतः स्तोतव्य ! यद्वा देहबन्धनेषु वासनासु बद्धस्य स्तोतव्य परमात्मन् ! राजन् वा ! त्वं (द्युम्नी गोपाः-भव) मदर्थमध्यात्मधनवान् तथा रक्षको भव (जनानाम्-अभिमातिः-अतारीत्) जन्यमानानामभिमन्यता नास्तिक-भावना त्वां नैव बाधेत (शूरः-इव) त्वं शूरः प्रतापी वीरसमानः (धृष्णुः) विरोधिनां धर्षयिता (च्यवनः) प्रेरयिता (सुमित्रः) शोभनमित्रयुक्तः (वाध्र्यश्वस्य नाम नु प्रवोचम्) जितेन्द्रियस्य वासनाबन्धनीयुक्तस्य मम स्तोतव्य ! तव महत्त्वपूर्णं नाम स्तौमि प्रशंसामि वा ॥५॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Agni, power of controlled light and flames of fire, be our protector and harbinger of splendour, and let no enemy of humanity challenge and assail you. Like a mighty warrior, Agni is all surpassing, all inspirer, a noble friend, and this is how I celebrate the name of the blazing power of self-control and splendour.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    मानव जितेंद्रिय असो किंवा वासनेने बांधलेला असो. प्रत्येक अवस्थेत त्याचा स्तुत्यदेव परमात्मा आहे, तोच रक्षक आहे. माणसे जगात उत्पन्न होऊन अभिमान करतात, नास्तिक बनतात; परंतु ते परमात्म्याचे ईश्वरत्व मिटवू शकत नाही; परंतु त्याच्या अधीन राहून कर्मफल भोगतात. त्याचे महत्त्वपूर्ण स्वरूप स्मरण करण्यायोग्य आहे. ॥५॥

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