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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 54 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 54/ मन्त्र 7
    ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - पूषा छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः

    माकि॑र्नेश॒न्माकीं॑ रिष॒न्माकीं॒ सं शा॑रि॒ केव॑टे। अथारि॑ष्टाभि॒रा ग॑हि ॥७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    माकिः॑ । नेश॑म् । माकी॑म् । रिष॑न् । माकी॑म् । सम् । शा॒रि॒ । केव॑टे । अथ॑ । अरि॑ष्टाभिः । आ । गा॒हि॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    माकिर्नेशन्माकीं रिषन्माकीं सं शारि केवटे। अथारिष्टाभिरा गहि ॥७॥

    स्वर रहित पद पाठ

    माकिः। नेशम्। माकीम्। रिषन्। माकीम्। सम्। शारि। केवटे। अथ। अरिष्टाभिः। आ। गहि ॥७॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 54; मन्त्र » 7
    अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 20; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    केनापि हिंसा नैव कार्येत्याह ॥

    अन्वयः

    हे विद्वन् ! यः कदाचिन्माकिर्नेशत्किंचन माकीं रिषदथ केवटे माकीं सं शारि तं प्राप्यारिष्टाभिस्त्वमस्माना गहि ॥७॥

    पदार्थः

    (माकिः) निषेधे (नेशत्) नश्येत् (माकीम्) (रिषत्) हिंस्यात् (माकीम्) (सम्) (शारि) हिंस्यात् (केवटे) कूपे। केवट इति कूपनाम। (निघं०३.२३) (अथ) (अरिष्टाभिः) अहिंसिताभिः क्रियाभिः (आ) (गहि) आगच्छ ॥७॥

    भावार्थः

    हे मनुष्या ! यो नष्टं कर्म न करोति नापि कञ्चन हिनस्ति कूपोदकेनापि कञ्चिन्न पीडयति स एव सर्वान् सङ्गन्तुमर्होऽहिंस्रो जायते ॥७॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    किसी को हिंसा नहीं करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे विद्वन् ! जो कभी (माकिः)(नेशत्) नष्ट हो तथा किसी को (माकीम्)(रिषत्) नष्ट करे (अथ) इसके अनन्तर (केवटे) कुँए में (माकीम्)(सम्, शारि) नष्ट करे वा कुँए के निमित्त किसी को न नष्ट करे उसको पाकर (अरिष्टाभिः) अहिंसित क्रियाओं से आप हम लोगों को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये ॥७॥

    भावार्थ

    हे मनुष्यो ! जो नष्ट कर्म नहीं करता न किसी को नष्ट करता है तथा कुँए के जल से भी किसी को नहीं पीड़ा देता, वही सब से सङ्ग करने योग्य और न हिंसा करनेवाला होता है ॥७॥

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    विषय

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    भावार्थ

    हे राजन् ! प्रजाजन ( माकि: नेशत् ) कभी किसी प्रकार नष्ट हो, (माकीं रिषत्) किसी अन्य द्वारा पीड़ित भी न हो । वह ( केवटे ) कूप या गढ़े के समान, अवनत दशा में भी ( माकीं सं शारि ) कभी शीर्ण न हो । ( अथ ) और ( अरिष्टाभिः ) अहिंसित प्रजाओं सहित तू, सुखी गौओं से गोपाल के समान, ( आ गहि ) हमें प्राप्त हो ।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ॥ पूषा देवता ॥ छन्दः - १, २, ४, ६, ७, ८, ९ गायत्री । ३, १० निचृद्गायत्री । ५ विराङ्गायत्री ।। षड्ज: स्वरः ।।

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    विषय

    अरिष्टा गौवें

    पदार्थ

    [१] हे पूषन् ! आपके अनुग्रह से हमारा यह इन्द्रियरूप गोधन (माकिः नेशत्) = मत नष्ट हो । इन इन्द्रियों की शक्ति बनी रहे। यह गोधन (माकीं रिषत्) = विषयरूप व्याघ्रों से भी हिंसित न किया जाये। हमारी इन्द्रियाँ विषयों का शिकार न हो जायें। यह गोधन (केवटे) = विषय कूप में गिरकर (माकीं) = मत (संशारि) = शीर्ण हो जाए। [२] (अथ) = अब (अरिष्टाभिः) = इन अहिंसित इन्द्रियरूप गौवों के साथ (आगहि) = आप हमें प्राप्त होइये ।

    भावार्थ

    भावार्थ- इन्द्रियाँ न नष्ट हों, वासनाओं से हिंसित न हों, विषयकूप में इनका पतन न हो जाए। अहिंसित इन्द्रियों के साथ प्रभु हमें प्राप्त हों ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे माणसांनो ! जो अहितकारक कर्म करीत नाही किंवा कुणाला नष्ट करीत नाही, विहिरीतील जलाने त्रस्त करीत नाही त्याची संगती सर्वांनी धरावी, असा तो अहिंसक असतो. ॥ ७ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Let none be frustrated. Let none frustrate anyone. Let none throw anyone into the pit of darkness and nothingness. 0 lord of nourishment and growth, come, bless us with everything whole and unhurt, with inviolable acts and unchallengeable policies.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    None should resort to violence--is told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O highly learned person! he who does not perform any action that may destroy others, does not resort to violence and does not harm any one by polluting the water of the well; having the association of such a good man, come to us with non-violent activities.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    He alone is fit to unite all and becomes non-violent (in mind, word and deed), who does not perform a destructive ignoble act, who does not resort to violence to any one and who does not harm any one by polluting the water of the well.

    Translator's Notes

    रिष-हिन्सायाम् (दिवा.) शू-हिन्सायाम (क्रया.) What a noble ideal of non-violence has been set forth in the mantra. How wrong it is on the part of any impartial scholar of the Vedas to say, that they advocate the killing of animals in the Yajnas or other performances.

    Foot Notes

    (रिषत्) हिस्यात् । (शारि) हिस्यात् । = Kill, destroy, harm. (केवटे) कूपे। केवत it कूपनाम (NG 3, 23)। = In the well. (अरिष्टाभिः) अहिंसिताभिः क्रियाभिः । = By inviolable and non-violent activities.

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