यजुर्वेद - अध्याय 1/ मन्त्र 24
ऋषिः - परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः
देवता - द्योविद्युतौ देवते
छन्दः - स्वराट् ब्राह्मी पङ्क्ति,
स्वरः - पञ्चमः
143
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑देऽध्वर॒कृतं॑ दे॒वेभ्य॒ऽइन्द्र॑स्य बा॒हुर॑सि॒ दक्षि॑णः स॒हस्र॑भृष्टिः श॒तते॑जा वा॒युर॑सि ति॒ग्मते॑जा द्विष॒तो व॒धः॥२४॥
स्वर सहित पद पाठदे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। आ। द॒दे॒। अ॒ध्व॒र॒कृत॒मित्य॑ध्वर॒ऽकृत॑म् दे॒वेभ्यः॑। इन्द्र॑स्य। बा॒हुः। अ॒सि॒। दक्षि॑णः। स॒हस्र॑भृष्टि॒रिति॑ स॒हस्र॑ऽभृष्टिः। श॒तते॑जा॒ इति श॒तऽते॑जाः। वा॒युः। अ॒सि॒। ति॒ग्मते॑जा॒ इति॑ ति॒ग्मऽते॑जाः। द्वि॒ष॒तः। व॒धः ॥२४॥
स्वर रहित मन्त्र
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । आददेध्वरकृतन्देवेभ्यऽइन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणः सहस्रभृष्टिः शततेजा वायुरसि तिग्मतेजा द्विषतो बधः ॥
स्वर रहित पद पाठ
देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। आ। ददे। अध्वरकृतमित्यध्वरऽकृतम् देवेभ्यः। इन्द्रस्य। बाहुः। असि। दक्षिणः। सहस्रभृष्टिरिति सहस्रऽभृष्टिः। शततेजा इति शतऽतेजाः। वायुः। असि। तिग्मतेजा इति तिग्मऽतेजाः। द्विषतः। वधः॥२४॥
भाष्य भाग
संस्कृत (2)
विषयः
पुनः स यज्ञः कीदृशोऽस्ति किमर्थश्चानुष्ठेय इत्युपदिश्यते॥
अन्वयः
अहं सवितुर्देवस्य प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां देवेभ्योऽध्वरकृतं [त्वा त] माददे यो मयाऽनुष्ठितो यज्ञ इन्द्रस्य सहस्रभृष्टिः शततेजा दक्षिणो बाहुरसि भवति। यस्येन्द्रस्य सूर्य्यलोकस्य मेघस्य वा तिग्मतेजा वायुर्हेतुरस्ति तेन सुखानि द्विषतो वधश्च कार्य्यः॥२४॥
पदार्थः
(देवस्य) सर्वानन्दप्रदस्य (त्वा) तम् (सवितुः) प्रेरकस्येश्वरस्य सूर्य्यस्य वा (प्रसवे) प्रेरणे ऐश्वर्य्यहेतौ वा (अश्विनोः) सूर्य्याचन्द्रमसोरध्वर्य्वोर्वा। अश्विनावध्वर्य्यू। (शत॰१।२।४।४) (बाहुभ्याम्) बलवीर्य्याभ्याम् (पूष्णः) पुष्टिहेतोर्वायोः। वृषा पूषा। (शत॰२।५।१।११) (हस्ताभ्याम्) ग्रहणत्यागहेतुभ्यामुदाना-पानाभ्याम् (आददे) आसमन्तात् स्वीकरोमि (अध्वरकृतम्) अध्वरं करोति येन सामग्रीसमूहेन तम्। अत्र कृतो बहुलम् [अष्टा॰भा॰वा॰३.३.११३] इति वार्त्तिकेन करणे क्विप्। अध्वरो वै यज्ञो यज्ञकृतम्। (शत॰१।२।४।५) (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यो दिव्यसुखेभ्यो वा (इन्द्रस्य) सूर्य्यस्य (बाहुः) वीर्य्यवत्तमकिरणसमूहस्थो यज्ञः (असि) भवति (दक्षिणः) प्राप्तः। दक्ष गतिहिंसनयोरित्यस्मात्। द्रुदक्षिभ्यामिनन्। (उणा॰२।५०) इतीनन् प्रत्ययः। अनेन गतेरन्तर्गतः प्राप्त्यर्थो गृह्यते (सहस्रभृष्टिः) सहस्राणि बहूनि भृष्टयः पाका यस्मात् सः सूर्य्यस्य प्रकाशः। सहस्रमिति बहुनामसु पठितम्। (निघं॰३।१) (शततेजाः) शतानि बहूनि तेजांसि यस्मिन् स सूर्य्यः। शतमिति बहुनामसु पठितम्। (निघं॰३।१) (वायुः) गमनागमनशीलः पवनः (असि) अस्ति। तत्र सर्वत्र व्यत्ययः (तिग्मतेजाः) तिग्मानि तीक्ष्णानि तेजांसि भवन्ति यस्मात् सः। युजिरुचितिजां कुश्च। (उणा॰१।१४६) अनेन तिज निशाने इत्यस्मान्मक् प्रत्ययः कुत्वादेशश्च। तथैव सर्वधातुभ्योऽसुन्। (उणा॰४।१८९) अनेन तिज इत्यस्मादसुन् प्रत्ययः (द्विषतः) शत्रोः (वधः) नाशः॥ अयं मन्त्रः (शत॰१।२।४।३-७) व्याख्यातः॥२४॥
भावार्थः
ईश्वर आज्ञापयति मनुष्यैः सम्यक् संपादितोऽयं यज्ञोऽग्निनोर्ध्वं प्रक्षिप्तद्रव्यः सूर्य्यकिरणस्थो वायुना धृतः सर्वोपकारी भूत्वा सहस्राणि सुखानि प्रापयित्वा दुःखानां नाशकारी भवतीति॥२४॥
विषयः
पुनः स यज्ञः कीदृशोऽस्ति किमर्थश्चानुष्ठेय इत्युपदिश्यते॥
सपदार्थान्वयः
अहं सवितुः प्रेरकस्येश्वरस्य सूर्यस्य वा देवस्य सर्वाऽऽनन्दप्रदस्य प्रसवे प्रेरणे ऐश्वर्य- हेतौ वा अश्विनोः सूर्याचन्द्रमसोरध्वर्य्वोर्वा बाहुभ्याम् बलवीर्याभ्यां पूष्णः पुष्टिहेतोर्वायोः हस्ताभ्यां ग्रहणत्यागहेतुभ्यामुदानपानाभ्यां देवेभ्यः विद्वद्भ्यो दिव्यसुखेभ्यो वां [त्वा] तम् अध्वरकृतम् अध्वरं करोति येन सामग्रीसमूहेन तम् आददे समन्तात् स्वीकरोमि।
यो मयाऽनुष्ठितो यज्ञ इन्द्रस्य सूर्यस्य सहस्रभृष्टिः सहस्राणि=बहूनि भृष्टयः=पाका यस्मात् स सूर्यस्य प्रकाश: शततेजाः शतानि=बहूनि तेजांसि यस्मिन्स सूर्यो दक्षिणः प्राप्तो बाहुः वीर्यवत्तमकिरणसमूहस्थो यज्ञो असि=भवति।
यस्येन्द्रस्य=सूर्यलोकस्य मेघस्य वा तिग्मतेजाः तिग्मानि=तीक्ष्णानि तेजांसि भवन्ति यस्मात् सः, वायुः गमनाऽऽगमनशीलः पवनो हेतुः [असि]=अस्ति, तेन सुखानि द्विषतः शत्रोः वधो नाश: च कार्यः॥ १।२४॥
पदार्थः
(देवस्य) सर्वानन्दप्रदस्य (त्वा) तम् (सवितुः) प्रेरकस्येश्वरस्य सूर्यस्य वा (प्रसवे) प्रेरणे ऐश्वर्यहेतौ वा (अश्विनोः) सूर्याचन्द्रमसोरध्वर्य्वोर्वा। अश्विनावध्वर्य्यू॥ श० १। २। ४। ४॥ (बाहुभ्याम्) बलवीर्याभ्याम् (पूष्णः) पुष्टिहेतोर्वायोः। वृषा पूषा॥ श० २। ५। १। ११॥ (हस्ताभ्याम्) ग्रहणत्यागहेतुभ्यामुदानापानाभ्याम् (आददे) आसमन्तात्स्वीकरोमि (अध्वरकृतम्) अध्वरं करोति येन सामग्रीसमूहेन तम्। अत्र कृतो बहुलमिति वार्त्तिकेन करणे क्विप्। अध्वरो वै यज्ञो यज्ञकृतम्॥ श० १। २। ४। ५॥ (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यो दिव्यसुखेभ्यो वा (इन्द्रस्य) सूर्यस्य (बाहुः) वीर्यवत्तमकिरणसमूहस्थो यज्ञ: (असि) भवति (दक्षिणः) प्राप्तः। दक्ष गतिहिंसनयोरित्यस्मात्। द्रुदक्षिभ्यामिनन्॥ उ० २।५०॥ इतीनन्प्रत्ययः। अनेन गतेरन्तर्गतः प्राप्त्यर्थो गृह्यते (सहस्रभृष्टिः) सहस्राणि=बहूनि, भृष्टयः=पाका यस्मात्सः सूर्यस्य प्रकाशः। सहस्रमिति बहुनामसु पठितम्॥ निघं० ३। १॥ (शततेजाः) शतानि=बहूनि तेजांसि यस्मिन्स सूर्यः। शतमिति बहुनामसु पठितम्॥ निघं० ३। १॥ (वायुः) गमनागमनशीलः पवन: (असि) अस्ति। अत्र सर्वत्र व्यत्ययः (तिग्मतेजाः) तिग्मानि=तीक्ष्णानि तेजांसि भवन्ति यस्मात्सः। युजिरुचितिजां कुश्च॥ उ० १। १४६॥ अनेन तिज निशाने इत्यस्मान्मक् प्रत्ययः कुत्वादेशश्च। तथैव। सर्वधातुभ्योऽसुन्॥ उ० ४। १८९॥ अनेन निज इत्यस्मादसुन्प्रत्ययः (द्विषतः) शत्रोः (वधः) नाशः॥ अयं मंत्रः श० १। २ । ४। ३-७ व्याख्यातः॥ २४॥
भावार्थः
[अहं--देवेभ्योऽध्वरकृतमाददे, यो--यज्ञ इन्द्रस्य--बाहुरसि=भवति, यस्येन्द्रस्य--वायुर्हेतुः [असि]=अस्ति, तेन सुखानि द्विषतो वधश्च कार्यः ]
ईश्वर आज्ञापयति--मनुष्यैः सम्यक् संपादितोऽयं यज्ञोऽग्निनोर्ध्वं प्रक्षिप्तद्रव्यः सूर्यकिरणस्थो वायुना धृतः सर्वोपकारी भूत्वा सहस्राणि सुखानि प्रापयित्वा दुःखानां नाशकारी भवतीति॥ १। २४॥
भावार्थ पदार्थः
द्विषत:=दुःखस्य। वधः=विनाशः॥
विशेषः
परमेष्ठी प्रजापतिः। द्यौविद्युतौ=स्वराड्ब्राह्मी पंक्तिः॥ पंचमः॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर भी उक्त यज्ञ कैसा और क्यों उसका अनुष्ठान करना चाहिये, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥
पदार्थ
मैं (सवितुः) अन्तर्यामी प्रेरणा करने (देवस्य) सब आनन्द के देने वाले परमेश्वर की (प्रसवे) प्रेरणा में (अश्विनोः) सूर्य्य, चन्द्र और अध्वर्य्युओं के [बाहुभ्याम्] बल और वीर्य्य से तथा (पूष्णः) पुष्टिकारक वायु के (हस्ताभ्याम्) जो कि ग्रहण और त्याग के हेतु उदान और अपान हैं, उन से (देवेभ्यः) विद्वान् वा दिव्य सुखों की प्राप्ति के लिये (अध्वरकृतम्) यज्ञ से सुखकारक [(त्वा) उस] कर्म को (आददे) अच्छे प्रकार ग्रहण करता हूं और मेरा किया हुआ जो यज्ञ है सो (इन्द्रस्य) सूर्य्य का (सहस्रभृष्टिः) जिसमें अनेक प्रकार के पदार्थों के पचाने का सामर्थ्य वा (शततेजाः) अनेक प्रकार का तेज तथा (दक्षिणः) प्राप्त करने वाला (बाहुः) किरणसमूह (असि) है और जिस (इन्द्रस्य) सूर्य्य वा मेघमण्डल का (तिग्मतेजाः) तीक्ष्ण तेज वाला (वायुः) वायु हेतु (असि) है, उस से हम को अनेक प्रकार के सुख तथा (द्विषतः) शत्रुओं का (वधः) नाश करना चाहिये॥२४॥
भावार्थ
ईश्वर आज्ञा करता है कि मनुष्यों को अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ यज्ञ जिस में भौतिक अग्नि के संयोग से ऊपर को अच्छे-अच्छे पदार्थ छोड़े जाते हैं, वह सूर्य्य की किरणों में स्थिर होता है तथा पवन उस को धारण करता है और वह सब के उपकार के लिये हजारों सुखों को प्राप्त कराके दुःखों का विनाश करने वाला होता है॥२४॥
विषय
फिर उक्त यज्ञ कैसा और क्यों उसका अनुष्ठान करना चाहिए, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।
भाषार्थ
मैं (सवितुः) आत्मा में प्रेरणा करने वाले ईश्वर वा सूर्य जो (देवस्य)सब आनन्द के देने वाले हैं उनकी (प्रसवे) प्रेरणा वा ऐश्वर्य प्राप्ति के निमित्त (अश्विनोः) सूर्य-चन्द्रमा अथवा अध्वर्युवों के (बाहुभ्याम्) बल-वीर्य रूप बाहुओं से तथा (पूष्णः) पुष्टिकर्त्ता वायु के (हस्ताभ्याम्) ग्रहण और त्याग करने वाले उदान-अपान रूप हाथों से (देवेभ्यः) विद्वानों वा दिव्य सुखों की प्राप्ति के लिए (त्वा) उस (अध्वरकृतम्) यज्ञ की सामग्री को (आददे) ग्रहण करता हूँ।
मेरे द्वारा किया हुआ यज्ञ (इन्द्रस्य) सूर्य का (सहस्रभृष्टिः) नाना पदार्थों का पाक करने वाला (शततेजाः) नाना तेजों वाला (दक्षिणः) सब कर्मों में प्राप्त होने वाला (बाहुः) अत्यन्त बलवान् किरणसमूह रूप दक्षिण बाहु
(असि) है।
जिस (इन्द्रस्य) सूर्यलोक वा मेघ का (तिग्मतेजाः) तीक्ष्ण तेज वाला (वायुः) गमन-आगमन स्वभाव वाला वायु कारण (असि) है, उससे सुखों की सिद्धि और (दि्वषतः) शत्रुओं का (वधः) नाश करना चाहिए॥१।२४॥
भावार्थ
ईश्वर आज्ञा देता है कि मनुष्यों से अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ यज्ञ जो कि अग्नि से होम किये द्रव्यों को ऊपर ले जाने वाला, सूर्य की किरणों से स्थित हुआ तथा पवन से धारण किया हुआ सबका उपकारी होकर सहस्रों सुखों को प्राप्त कराकर, दुखों का विनाश करने वाला होता है॥१।२४॥
भाष्यसार
१. ईश्वर--अन्तरात्मा में प्रेरणा करने वाला होने से ईश्वर का नाम ‘सविता’है। ऐश्वर्य हेतु होने से सूर्य को भी ‘सविता’कहा गया है। सब आनन्दों को देने वाला होने से ईश्वर का नाम ‘देव’है॥
२. यज्ञ--यहां सविता देव की प्रेरणा से यज्ञ का ग्रहण करने का उपदेश किया गया है। इस मन्त्र के मनन से ऐसा ध्वनित होता है कि ईश्वरकी सृष्टि एक यज्ञ है। जिसका ब्रह्मा ईश्वर है, सूर्य होता है, चन्द्र अध्वर्यु है और वायु उद्गाता है। इस ईश्वर के सृष्टियज्ञ से प्रेरणा लेकर देवयज्ञ का अनुष्ठान करें। सृष्टि यज्ञ का सुन्दर वर्णन देखिये-- ‘‘सविता देव की प्रेरणा पर सूर्य और चन्द्रमा के बल तथा वीर्य से वायु के ग्रहण और त्याग के निमित्त उदान और अपान से विद्वानों की सेवाएवं संग तथ दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए यज्ञ की सामग्री को ग्रहण करो’’॥ (क) यहां यज्ञ को सूर्य का दक्षिण बाहु कहा है। सूर्य की किरणें ही उसका दक्षिण बाहु हैं। यज्ञ बलवान् किरण-समूह में जाकर स्थित होता है। वे किरणें अर्थात् प्रकाश नाना पदार्थों को पकाता है तथा बहुविध तेज का आधान करता है। ३. वायु--इन्द्र अर्थात् सूर्यलोक और मेघ का कारण वायु है। उससे सुखों की सिद्धि शत्रुओं का विनाश करें॥
विशेष
परमेष्ठी प्रजापतिः। = स्वराड् ब्राह्मी पंक्तिः। पञ्चमः।
विषय
प्रभु का दाँया हाथ
पदार्थ
१. [ क ] मैं ( त्वा ) = तुझे [ प्रत्येक पदार्थ को ] ( सवितुः देवस्य ) = उस प्रेरक, दिव्य गुणों के पुञ्ज प्रभु की ( प्रसवे ) = अनुज्ञा में ( आददे ) = ग्रहण करता हूँ। प्रभु की आज्ञा यही है कि ‘माप-तोलकर’ भोग कर। न अतियोग, न अयोग, अपितु यथायोग सेवन कर। [ ख ] ( अश्विनोः बाहुभ्याम् ) = प्राणापानों के प्रयत्न से, अर्थात् मैं प्रत्येक वस्तु को अपने पुरुषार्थ से कमाकर ग्रहण करता हूँ, किसी वस्तु को सेंतमेंत [ बिना मूल्य ] लेने की कामना नहीं करता। [ ग ] ( पूष्णोः हस्ताभ्याम् ) = पूषा के हाथों से, अर्थात् पोषण के दृष्टिकोण से ही मैं किसी भी वस्तु का प्रयोग करता हूँ। [ घ ] ( देवेभ्यः अध्वरकृतम् ) = देवताओं के लिए यज्ञ में अर्पित की गई वस्तु के यज्ञशेष को ही मैं ग्रहण करता हूँ। ‘तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः’। जो देवताओं से दी गई वस्तुओं को बिना देवों को दिये खाता है, वह चोर ही है। सारे पदार्थ ‘सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, जल, वायु’ आदि देवों की कृपा से हमें प्राप्त होते हैं। इन देवप्रदत्त पदार्थों को यज्ञ द्वारा देवार्पण करके ही बचे हुए को खाना चाहिए। ‘त्यक्त्येन भुञ्जीथाः’ की भावना यही तो है।
२. जो व्यक्ति उल्लिखित चार बातों का ध्यान रखते हुए सांसारिक पदार्थों को स्वीकार करता है, वह ( इन्द्रस्य ) = शक्तिशाली कर्मों को करनेवाले प्रभु का ( दक्षिणः बाहुः ) = दाँया हाथ ( असि ) = बनता है, अर्थात् प्रभु उसे निमित्त बनाकर उत्तमोत्तम कार्य किया करते हैं। ये व्यक्ति अत्यन्त महान् कार्यों को करते हुए दीखते हैं, हमें ये सामान्य पुरुष न लगकर महामानव प्रतीत होने लगते हैं।
३. ( सहस्रभृष्टिः ) = यह व्यक्ति कार्यों में उपस्थित होनेवाले सहस्रों विघ्नों को नष्ट करनेवाला होता है—उन्हें भून डालनेवाला होता है।
४. ( शततेजाः ) = इसका जीवन सौ-के-सौ वर्ष तेजस्वी बना रहता है। भोग-मार्ग को न अपनाने से यह कभी क्षीणशक्तिवाला नहीं होता।
५. ( वायुः असि ) = यह वायु की भाँति निरन्तर क्रियाशील होता है ‘वा गतिगन्धनयोः’। यह अपनी क्रियाशीलता के द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाला होता है।
६. ( तिग्मतेजाः ) = यह प्रखर—तीव्र तेज का धारण करनेवाला होता है, इस तेजस्विता के कारण ही तो यह सब विघ्नरूप अन्धकारों को नष्ट करता हुआ अपने मार्ग पर आगे और आगे बढ़ता है। इस तेजस्विता से ही यह-
७. ( द्विषतो वधः ) = शत्रु का वध करनेवाला होता है। द्वेषरूप शत्रु ही सर्वमहान् शत्रु है और तेजस्विता के साथ इसका समानाधिकरण्य [ एक स्थान पर रहना ] कभी नहीं होता। जहाँ तेजस्विता है वहाँ द्वेष नहीं, जैसे जहाँ प्रकाश है वहाँ अन्धकार नहीं। इसलिए ‘शत-तेजाः’ व ‘तिग्मतेजाः’ यह द्वेष को अपने से दूर करनेवाला होता है।
भावार्थ
भावार्थ — हम प्रयत्न करके वस्तुओं का ठीक प्रयोग करें, और ‘प्रभु का दाहिना हाथ’ बनने का प्रयत्न करें, परिणामतः हममें वह तेज आएगा जिसमें द्वेष आदि का सब कूड़ा-करकट भस्म हो जाता है।
विषय
विद्युत् अस्त्र शत्रुओं का नाश।
भावार्थ
( देवस्य त्वा इत्यादि ) पूर्ववत् [ १ । २१ ] हे शस्त्र ! राजा प्रजा की बाहुओ ! और पोषक राजा के हाथों से सर्वप्रेरक सविता राजा के ( प्रसवे ) शासन में (आददे ) तुझ खड्ग को मैं ग्रहण करता हूँ । तू ( देवेभ्यः ) देव या विद्वानों के निमित्त ( अध्वरकृतम् ) राष्ट्रयज्ञ के सम्पादन के लिये या पराजित न होने के लिये ही बनाया गया है । तू ( इन्द्रस्य ) परमैश्वर्यवान् राजा का ( दक्षिणबाहुः असि ) दायां हाथ है अर्थात् दायें हाथ के समान सबसे बड़ा सहायक है । हे विद्युत् के घोर अस्त्र! तू ( सहस्रभृष्टि: ) हज़ारों को भूंज डालने में समर्थ है । (शततेजा:) तुझ में सैकड़ों तेज और ज्वालाएं दीप्त होती हैं । तू ( वायु: असि ) वायु के समान दूर तक फैलने वाला ( तिग्मतेजाः ) सूर्य के समान तीक्ष्ण तेजस्वी और (द्विषत: वधः ) शत्रु का नाश करने वाला परम हथियार हैं ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
सविता, स्फ्यश्च द्यौर्विद्युतौ वा देवते । स्वराड् ब्राह्मी पंक्तिः पञ्चमः ॥
मराठी (2)
भावार्थ
ईश्वर उपदेश करतो की, माणसे चांगल्या प्रकारे केलेल्या यज्ञात उत्तम पदार्थांची आहुती देतात. ती अग्नीच्या साह्याने वर जाते व तो यज्ञरूपी अग्नी सूर्यकिरणांमध्ये स्थिर होतो. वायू त्यांना धारण करतो व तो सर्वांवर उपकार करणारा, हजारो प्रकारचे सुख देणारा आणि दुःखांचा नाश करणारा ठरतो.
विषय
पुनश्च तो वर्णित यज्ञ कसा आहे व त्याचे अनुष्ठान का करावे, पुढील मंत्रात याविषयी सांगितलेले आहे-
शब्दार्थ
शब्दार्थ - (सवितुः) अंतर्यामी आणि सर्वांना प्रेरणा देणार्या आणि (देवस्य) सर्वांना आनन्द देणार्या परमेश्वराकडून (प्रसवे) प्रेरणा घेऊन (अश्विनोः) सूर्य, चन्द्र आणि अध्वर्यूंच्या शक्ती आणि तेजापासून लाभ घेऊन (पूष्णः) पुष्टिकारक वायूच्या (हस्ताभ्यां) ग्रहण आणि त्याग यांचे कारण असलेल्या उदान आणि अपान या प्रकारच्या साहाय्याने (देवेभ्यः) विद्वज्जनांचा सुखाकरता किंवा दिव्य सुखांच्या प्राप्तीकरिता (अध्वरकृतं) यज्ञीय पदार्थ व यज्ञ समान सुखकारक कर्माचा मी (आददे) उत्तम प्रकारे स्वीकार करीत आहे. हे यम (इन्द्रस्य) सूर्याचा (सहस्रभृष्टिः) अनेक पदार्थांचे पाचन करण्याची शक्ती असलेल्या (शततेजाः) अनेक प्रकारच्या तेजांना (दक्षिणः) धारण किंवा प्राप्त करणारा (बाहुः) किरणसमूह आहे (इन्द्रस्य) सूर्याच्या अथवा मेघमंडळाचा (तिग्मतेजाः) तीक्ष्ण तेज वेग असलेला (वायुः) वायू कारण (असि) आहे, त्या वायूमुळे आणि यज्ञामुळे आम्ही अनेक प्रकारचे सुख मिळविले पाहिजेत आणि (द्विषतः) शत्रुंचा (वधः) नाश केला पाहिजे. ॥24॥
भावार्थ
भावार्थ - परमेश्वर आज्ञा देत आहे की, मनुष्यांनी चांगल्या प्रकारे सिद्ध केलेला यज्ञ करावा. सिद्ध केलेल्या अशा यमात भौतिक अग्नीमधे आहुत केलेले हव्य पदार्थ वर जाऊन सूर्याच्या किरयांत स्थिर होतात, वायू त्या पदार्थांना धारण करतो किंवा त्याचे वहन करून सर्वांचा उपकारक आणि सर्वांच्या सुखदायक ठरतो, तसेच दुःखांचा विनाश करणारा होतो. ॥24॥
इंग्लिश (3)
Meaning
By the impulse of God the Giver of bliss, I perform the yajna free from Hinsa (violence), for the attainment of noble qualities and association of the learned, through the aid of life-giving-breath, vitalising air, and through the rejuvenating rays of the sun and moon. A yajna is the recipient of the rays of the sun that ripens a large variety of objects and is full of immense lustre, and innumerable rays. A yajna is the illuminating source of rain. With the aid of the yajna we should remove our miseries.
Meaning
In this world of Lord Savita’s creation, I perform the sacred act of yajna for the well-being of the holy ones, for benefit from the light of the sun, soothing peace of the moon and the vital breath of air. It is the mighty arm of the sun working with a hundred thousand rays maturing the vegetation on earth. It is the caressing power of the wind and the generative shower of the clouds on all forms of life for growth and energy. It is the death of mutual opposition, the elimination of hate and resolution of contradictions.
Translation
At the impulsion of the Creator God, I take you with arms of the healers and hands of the nourisher to perform sacrifice for Nature's bounties. (1) You are the right hand of the resplendent Lord, capable of killing thousands of enemies, glittering with hundreds of lustres. You are the wind of fierce power, killer of malicious. (2)
Notes
According to the ritualists, here, sphya, a sword-shaped wooden implement, is addressed. This implement is used for stirring boiling rice, for drawing lines on the ground as well as some other sacrificial purposes. Sahasrabhrstih, one who roasts or bakes a thousand, i. e. killer of thousands of enemies. Tigmatejah, one of fierce power.
बंगाली (1)
विषय
পুনঃ স য়জ্ঞঃ কীদৃশোऽস্তি কিমর্থশ্চানুষ্ঠেয় ইত্যুপদিশ্যতে ॥
পুনরায় উক্ত যজ্ঞ কেমন ও কেন তাহার অনুষ্ঠান করা বিধেয়, তাহাই পরবর্ত্তী মন্ত্রে উপদেশ করা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ- আমি (সবিতুঃ) অন্তর্য্যামী প্রেরণাকারী (দেবস্য) সর্ব আনন্দদায়ক পরমেশ্বরের (প্রসবে) প্রেরণায় (অশ্বিনোঃ) সূর্য্য - চন্দ্র এবং অধ্বর্য্যুদিগের (বাহুভ্যাং) বল ও বীর্য্য দ্বারা তথা (পূষ্ণঃ) পুষ্টিকারক বায়ুর (হস্তাভ্যাম্) যাহা গ্রহণ ও ত্যাগের হেতু উদান ও অপান তাহা হইতে (দেবেভ্যঃ) বিদ্বান্ অথবা দিব্য সুখের প্রাপ্তি হেতু (অধ্বরকৃতম্) যজ্ঞ দ্বারা সুখকারক (ত্বা) সেই কর্মকে (আদদে) ভাল প্রকারে গ্রহণ করি এবং আমার দ্বারা সম্পন্ন যে যজ্ঞ উহা (ইন্দ্রস্য) সূর্য্যের (সহস্রভৃষ্টিঃ) যাহাতে বহু প্রকার পদার্থ হজম করিবার সামর্থ্য বা (শততেজাঃ) বহু প্রকারের তেজ তথা (দক্ষিণঃ) প্রাপ্তকারী (বাহুঃ) কিরণসমূহ (অসি) আছে এবং যে (ইন্দ্রস্য) সূর্য্য বা মেঘমন্ডলের (তিগ্মতেজাঃ) তীক্ষ্ন তেজ যুক্ত (বায়ুঃ) বায়ু হেতু (অসি) আছে উহা দ্বারা আমাদিগের বহু প্রকারের সুখ তথা (দ্বিষতঃ) শত্রুদিগের (বধঃ) নাশ করা উচিত ॥ ২৪ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ- ঈশ্বর আজ্ঞা করিতেছেন যে, মনুষ্যদিগের সম্যক্ প্রকার প্রতিপন্ন করা যজ্ঞ যাহাতে ভৌতিক অগ্নির সংযোগের ফলে উপর হইতে ভাল ভাল পদার্থ ত্যাগ করা হয় উহা সূর্য্যের কিরণে স্থির হয় এবং পবন উহাকে ধারণ করে এবং উহা সকলের উপকার হেতু সহস্র সুখ প্রাপ্ত করাইয়া দুঃখ সকলের বিনাশ করিয়া থাকে ॥ ২৪ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
দে॒বস্য॑ ত্বা সবি॒তুঃ প্র॑স॒বে᳕ऽশ্বিনো॑র্বা॒হুভ্যাং॑ পূ॒ষ্ণো হস্তা॑ভ্যাম্ । আ দ॑দেऽধ্বর॒কৃতং॑ দে॒বেভ্য॒ऽ ইন্দ্র॑স্য বা॒হুর॑সি॒ দক্ষি॑ণঃ স॒হস্র॑ভৃষ্টিঃ শ॒ততে॑জা বা॒য়ুর॑সি তি॒গ্মতে॑জা দ্বিষ॒তো ব॒ধঃ ॥ ২৪ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
দেবস্য ত্বেত্যস্যর্ষিঃ স এব । দ্যোবিদ্যুতৌ দেবতে । স্বরাড্ব্রাহ্মী পংক্তিশ্ছন্দঃ ।
পঞ্চমঃ স্বরঃ ॥
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