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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 45/ मन्त्र 3
    ऋषिः - भृगुः देवता - आञ्जनम् छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आञ्जन सूक्त
    49

    अ॒पामू॒र्ज ओज॑सो वावृधा॒नम॒ग्नेर्जा॒तमधि॑ जा॒तवे॑दसः। चतु॑र्वीरं पर्व॒तीयं॒ यदाञ्ज॑नं॒ दिशः॑ प्रदिशः कर॒दिच्छि॒वास्ते॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒पाम्। ऊ॒र्जः। ओज॑सः। व॒वृ॒धा॒नम्। अ॒ग्नेः। जा॒तम्। अधि॑। जा॒तऽवे॑दसः। चतुः॑ऽवीरम्। प॒र्व॒तीय॑म्। यत्। आ॒ऽअञ्ज॑नम्। दिशः॑। प्र॒ऽदिशः॑। क॒र॒त्। इत्। शि॒वाः। ते॒ ॥४५.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपामूर्ज ओजसो वावृधानमग्नेर्जातमधि जातवेदसः। चतुर्वीरं पर्वतीयं यदाञ्जनं दिशः प्रदिशः करदिच्छिवास्ते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अपाम्। ऊर्जः। ओजसः। ववृधानम्। अग्नेः। जातम्। अधि। जातऽवेदसः। चतुःऽवीरम्। पर्वतीयम्। यत्। आऽअञ्जनम्। दिशः। प्रऽदिशः। करत्। इत्। शिवाः। ते ॥४५.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 45; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (अपाम्) प्रजाओं के (ऊर्जः) अन्न के और (ओजसः) पराक्रम से (वावृधानम्) बढ़ानेवाले और (जातवेदसः) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान (अग्नेः) अग्नि [सूर्य आदि] से (अधि) अधिक (जातम्) प्रसिद्ध, (चुतुर्वीरम्) चारों दिशाओं में वीर और (पर्वतीयम्) मेघों में वर्तमान (यत्) जो (आञ्जनम्) आञ्जन [संसार का प्रकट करनेवाला ब्रह्म] है, वह (दिशः) दिशाओं और (प्रदिशः) बड़ी दिशाओं [पूर्व आदि] को (ते) तेरे लिये, हे मनुष्य ! (इत्) अवश्य (शिवाः) कल्याणकारी (करत्) करे ॥३॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य सर्वशक्तिमान् परमात्मा में भक्ति करके पुरुषार्थ करते हैं, वे सब दिशाओं में सुख पाते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(अपाम्) प्रजानाम् (ऊर्जः) अन्नस्य (ओजसः) पराक्रमस्य च (वावृधानम्) अतिवर्धकम् (अग्नेः) सूर्यादिसकाशात् (जातम्) प्रसिद्धम् (अधि) अधिकम् (जातवेदसः) जातेषु पदार्थेषु विद्यमानात् (चतुर्वीरम्) चतसृषु दिक्षु शूरम् (पर्वतीयम्) पर्वतेषु मेघेषु वर्तमानम् (यत्) (आञ्जनम्) संसारस्य व्यक्तीकारकं ब्रह्म (दिशः) अवान्तरदिशाः (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः प्रागाद्याः (करत्) कुर्यात् (इत्) अवश्यम् (शिवाः) सुखप्रदाः (ते) तुभ्यम् ॥

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    भाषार्थ

    (अपाम्) जलोत्पन्न (ऊर्जः) अन्नों के (ओजसः) ओज से (वावृधानम्) वृद्धि को प्राप्त, (जातवेदसः अग्नेः अधि) मानो जातवेदा अग्नि से (जातम्) उत्पन्न, अर्थात् अग्निसमान तेजस्वी और परोपकारी, (पर्वतीयम्) पर्वतयात्राओं में कुशल, (आञ्जनम्) कान्तिसम्पन्न, (चतुर्वीरम्) चार प्रकार की सेनाओं के वीरों वाला (यद्) जो तेरा सैनिक-बल है, वह (ते) हे राजन्! तेरे लिए (दिशः प्रदिशः) दिग्-दिगन्तरों को (इत् शिवाः) अवश्य कल्याणकारिणी (करत्) कर दे।

    टिप्पणी

    [ऊर्जः= ऊर्क् अन्ननाम (निघं० २.७)। अग्नेः जातम्= अग्निरूप सैनिक नर। यथा— “तिग्मेषव आयुधा संशिशाना अभि प्र यन्तु नरो अग्निरूपाः” (ऋ० १०.८४.१)। जातवेदसः=क्रव्याद् अग्नि ध्वंसकारी है, और जातवेदा अग्नि यज्ञों द्वारा परोपकारी है। चतुर्वीरम्=चतुरंग सेनाओं के वीर नरोंवाला सैनिक बल। चतुरंग=हस्ती, अश्व, रथ, पदाति। आञ्जनम्=आ अञ्ज् (=कान्ति), पोशाकों द्वारा शोभायमान।]

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    विषय

    'बल प्राण व ओज' का वर्धन

    पदार्थ

    १. (अपाम्) = प्रजाओं के (ऊर्ज:) = बल व प्राणशक्ति का तथा (ओजस:) = ओज का (वावृधानम्) = निरन्तर बढ़ानेवाला (यत् आञ्जनम्) = जो यह जीवन को सद्गुणों से अलंकृत करनेवाला वीर्य है वह (ते) = तेरी (दिश: प्रदिश:) = दिशाओं व प्रदिशाओं को (शिवाः करत) = कल्याणकर करे। सुरक्षित वीर्य हमें बलवान्, प्राणशक्तिसम्पन्न व ओजस्वी बनाता हुआ (चतुर्वीरम्) = हमारे चारों अंगों को [मुख, बाहू, ऊरू, पाद] बीर बनाता है। (पर्वतीयम्) = हमारा पूरण करनेवाले तत्वों के लिए हितकर है। शरीर का पूरण करनेवाले सब तत्त्वों को हममें सम्यक् उत्पन्न करता हुआ यह हमारे लिए हित-तम है।

    भावार्थ

    शरीर में सुरक्षित वीर्य हमें 'बल, प्राण व ओज' प्रास कराता है। यह हमारे अंगों को सबल बनाता है। शरीर का पूरण करनेवाले सब तत्वों को सम्यक् उत्पन्न करता है। इस प्रकार यह हमारा सर्वत: कल्याण करनेवाला है।

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    विषय

    रक्षक और विद्वान् ‘आञ्जन’।

    भावार्थ

    (अपाम्) प्रजानों या आप्त पुरुषों के या कर्मों, या ज्ञानों के (अर्जः) बल और (ओजसः) तेज को (वावृधानम्) निरन्तर वृद्धि करने वाले (अग्नेः) अग्रणी (जातवेदसः) एवं धनसम्पन्न पुरुष से भी अधिक वीर्यवान् (जातम्) उत्पन्न, अथवा (जातवेदसः) वेद के ज्ञानैश्वर्य से सम्पन्न (अग्नेः) अग्नि आचार्य से (जातम्) उत्पन्न (चतुर्वीरम्) चारों प्रकार के वीर्यों से युक्त (पर्वतीयं) पूर्ण करने वाले या पूर्ण ज्ञान देने वाले गुरु से प्राप्त, (यद्) जो (आञ्जनम्) ज्ञान प्रकाशक ब्रह्म ज्ञान है वह (दिशः प्रदिशः) दिशा और उपदिशाओं को (ते) तेरे लिये (शिवाः) शिव कल्याणकारी (करत्) करे। वीर के पक्ष में—प्रजाओं के बल वीर्य को बढ़ाने वाले और विद्वान् गुरु से सुशिक्षित होकर चार वीरों के बराबर बलवान् या चारों दिशाओं में वीर्यवान् (पर्वतीयम्) पालन करने वाले राजा के पद पर अधिष्टित, जो (आञ्जनं) कान्तिमान् राजा, प्रभु है, वह तेरी समस्त दिशा उपदिशाओं को कल्याणकारी, निर्भय करदे।

    टिप्पणी

    ‘ऊर्जोजसो’ (तृ०) ‘पर्वतं’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुऋषिः। आञ्जनं देवता। १, २ अनुष्टुभौ। ३, ५ त्रिष्टुभः। ६-१० एकावसानाः महाबृहत्यो (६ विराड्। ७-१० निचृत्तश्च)। दशर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Anjanam

    Meaning

    Anjanam, augmenting and exalting the food, energy and splendour of the people and their actions, the power born of the very cosmic fire of existence, potent presence all over the four quarters, vibrating in clouds and over mountains, the Anjana that rolls around may, we pray, make all the four directions and subdirections auspicious for you.

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    Translation

    May this mountain-born anjana blessing, flourishing with the vigour and might of the waters, and born from the fire divine, cognizant of all beings, and full of four-fold strength, make the quarters propitious for you.

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    Translation

    Whatever bad sleep remains in us, whatever in cows, whatever in our house let this ointment remove it in such a way that it could become salubrious and favorable to man having evils for us in his heart.

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    Translation

    Let this Anjana, which is got from the mountains, which creates four¬ fold energy i.e., hydraulic power, enhancement of splendour, born of heat, predominating light, like the search-light, make all the quarters and the mid-quarters peaceful for thee (man or king).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(अपाम्) प्रजानाम् (ऊर्जः) अन्नस्य (ओजसः) पराक्रमस्य च (वावृधानम्) अतिवर्धकम् (अग्नेः) सूर्यादिसकाशात् (जातम्) प्रसिद्धम् (अधि) अधिकम् (जातवेदसः) जातेषु पदार्थेषु विद्यमानात् (चतुर्वीरम्) चतसृषु दिक्षु शूरम् (पर्वतीयम्) पर्वतेषु मेघेषु वर्तमानम् (यत्) (आञ्जनम्) संसारस्य व्यक्तीकारकं ब्रह्म (दिशः) अवान्तरदिशाः (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः प्रागाद्याः (करत्) कुर्यात् (इत्) अवश्यम् (शिवाः) सुखप्रदाः (ते) तुभ्यम् ॥

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