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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 45 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 45/ मन्त्र 9
    ऋषिः - भृगुः देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - एकावसाना निचृन्महाबृहती सूक्तम् - आञ्जन सूक्त
    44

    भगो॑ म॒ भगे॑नावतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भगः॑। मा॒। भगे॑न। अ॒व॒तु॒। प्रा॒णाय॑। अ॒पा॒नाय॑। आयु॑षे। वर्च॑से। ओज॑से। तेज॑से। स्व॒स्तये॑। सु॒ऽभू॒तये। स्वाहा॑ ॥४५.९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भगो म भगेनावतु प्राणायापानायायुषे वर्चस ओजसे तेजसे स्वस्तये सुभूतये स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भगः। मा। भगेन। अवतु। प्राणाय। अपानाय। आयुषे। वर्चसे। ओजसे। तेजसे। स्वस्तये। सुऽभूतये। स्वाहा ॥४५.९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 45; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (भगः) सेवनीय [परमेश्वर] (मा) मुझे (भगेन) सेवनीय ऐश्वर्य के साथ (अवतु) बचावे, (प्राणाय) प्राण के लिये..... [मन्त्र ६] ॥९॥

    भावार्थ

    मन्त्र ६ के समान है ॥९॥

    टिप्पणी

    ९−(भगः) सेवनीयः परमेश्वरः (भगेन) सेवनीयेनैश्वर्येण। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    भाषार्थ

    (भगः) समग्र ऐश्वर्यों का अधिकारी (भगेन) राष्ट्र के समग्र ऐश्वर्यों द्वारा (मा) मेरी (अवतु) रक्षा करे। ताकि मैं (प्राणाय अपानाय....) आदि पूर्ववत्।

    टिप्पणी

    [भगः=ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्योयश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥ इस प्रकार “भग” के ६ अर्थ हैं। जिनमें से मन्त्र में “समग्र ऐश्वर्य” अर्थ लिया गया है।]

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    विषय

    भगः भगेन

    पदार्थ

    १. (भग:) = ऐश्वर्य के पुञ्ज प्रभु (मा) = मुझे (भगेन) = सेवनीय ऐश्वर्य के द्वारा (अवतु) = रक्षित करें। २. प्रभु इसलिए मुझे इस भग को प्राप्त कराएँ जिससे (प्राणायापानाय)। शेष पूर्ववत्।

    भावार्थ

    ऐश्वर्य-पुञ्ज प्रभु से ऐश्वर्य को प्राप्त करके प्राणापानशक्ति का वर्धन करता हुआ मैं दीर्घजीवी बनें।

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    विषय

    रक्षक और विद्वान् ‘आञ्जन’।

    भावार्थ

    (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् पुरुष (इन्द्रियेण) अपने ऐश्वर्य से (सोमः सौम्येन) सोम अपने सौम्यगुण से (भगः) भग, ऐश्वर्यवान् अपने (भगेन) अपने ऐश्वर्य प्राप्त करने के गुण से (मरुतः) मरुत् गण अपने (गणैः) गणों से (प्राणाय, अपानाय, आयुषे, वर्चसे, ओजसे, तेजसे, स्वस्तये सुभूतये) प्राण, अपान, आयु, वर्चस्, ओज, तेज, सुखपूर्वक जीवन और उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिये (मा अवतु) मेरी रक्षा करें, (स्वाहा) यह हमारी उत्तम प्रार्थना है। राष्ट्र में अग्नि=अग्रणी सेनापति। सोम=न्यायाधीश। भग=कर संग्राहक। मरुतः=सेना के सैनिक या प्रजागण ये सब मेरे प्राण आयु वीर्य स्वास्थ्य ऐश्वर्य के लिये रक्षा करें। ईश्वर में ये सब गुण घटित है। अतः वह अपने ज्ञान, शान्ति, ऐश्वर्य और नाना शक्तियों से मेरी रक्षा करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृगुऋषिः। आञ्जनं देवता। १, २ अनुष्टुभौ। ३, ५ त्रिष्टुभः। ६-१० एकावसानाः महाबृहत्यो (६ विराड्। ७-१० निचृत्तश्च)। दशर्चं सूक्तम्।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Anjanam

    Meaning

    May Bhaga, lord of abundant power and prosperity, protect and promote me with power and prosperity for prana and apana, good health and full age, honour, splendour and social brilliance, all round well being and noble fame. Homage to Bhaga in truth of thought, word and deed.

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    Translation

    May the bounteous Lord preserve me with bounty for inbreath, for out-breath, for long life, for lustre, for vigour, for majesty, for weal, for good prosperity. Svaha.

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    Translation

    May Bhaga, the radiant sun protect me with radiance for ……. Prosperity. I........idea.

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    Translation

    May the Fortune Distributer God, a wealthy king or person, protect.... said.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९−(भगः) सेवनीयः परमेश्वरः (भगेन) सेवनीयेनैश्वर्येण। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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