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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 57 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 57/ मन्त्र 3
    ऋषिः - मधुच्छन्दाः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-५७
    45

    अथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम्। मा नो॒ अति॑ ख्य॒ आ ग॑हि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अथ॑ । ते॒ । अन्त॑मानाम् । वि॒द्याम॑ । सु॒ऽम॒ती॒नाम् ॥ मा । न॒: । अति॑ । ख्य॒: । आ । ग॒हि॒ ॥५७.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्। मा नो अति ख्य आ गहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अथ । ते । अन्तमानाम् । विद्याम । सुऽमतीनाम् ॥ मा । न: । अति । ख्य: । आ । गहि ॥५७.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 57; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    १-१० मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे राजन् !] (अथ) और (ते) तेरी (अन्तमानाम्) अत्यन्त समीप रहनेवाली (सुमतीनाम्) सुन्दर बुद्धियों का (विद्याम) हम ज्ञान करें। तू (नः) हमें (अति) छोड़कर (मा ख्यः) मत बोल, (आ गहि) तू आ ॥३॥

    भावार्थ

    जब राजा पूर्ण प्रीति से प्रजापालन करता है, प्रजागण उसकी धार्मिक नीतियों से लाभ उठाकर उससे प्रीति करते हैं ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(अथ) अनन्तरम् (ते) तव (अन्तमानाम्) अन्तः सामीप्यम्। अत इनिठनौ। पा० ।२।११। इति अन्त-ठन् प्रत्ययः। ततोऽतिशायिने तमप्। पृषोदरादित्वात् तिक्शब्दस्य लोपः। अन्तमानाम्, अन्तिकनाम-निघ० २।१६। अन्तिकतमानाम्। अतिशयेन समीपस्थानाम् (विद्याम) वेत्तेर्लङ्। ज्ञानं कुर्याम, (मा) निषेधे (नः) अस्मान् (अति) अतीत्य। उल्लङ्घ्य। (ख्यः) ख्या प्रकथने लुङ्। माङ्योगेऽडभावः। प्रकथय (आ गहि) आगच्छ ॥

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    विषय

    अन्तम समतियों की प्राप्ति

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! (अथा) = अब (ते) = आपकी (उन्तमानाम्) = अत्यन्त अन्तिकतम-आपके समीप प्रास करानेवाली (सुमतीनाम्) = कल्याणी मतियों को (विद्याम) = प्राप्त करें। इन सुमतियों को प्राप्त करके हम आपके समीप पहुँचनेवाले बनें। २. हे प्रभो! आप (न:) = हमें (मा अति ख्य:) = छोड़कर ज्ञान देनेवाले न होइए, अर्थात् हम सदा आपके ज्ञानों के पात्र बनें। (आगहि) = आप हमें अवश्य प्राप्त होइए।

    भावार्थ

    हम उन कल्याणी-मतियों को प्राप्त करें, जोकि हमें प्रभु तक ले जानेवाली हैं। हम सदा प्रभु से दिये जानेवाले ज्ञान के पात्र हों।

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    भाषार्थ

    (अथ) ज्ञानप्रकाश प्राप्त कर लेने पर, हे परमेश्वर! वेदों में (ते) आप द्वारा दी गई (अन्तमानाम्) अन्तिम प्रमाणरूप (सुमतीनाम्) सुमतियों को (विद्याम) हम जानें, और प्राप्त करें। हे परमेश्वर! इस सम्बन्ध में आप (नः) हमारा (मा अतिख्यः) प्रत्याख्यान न करें। (आ गहि) आप हम में प्रकट हूजिए।

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    विषय

    ईश्वरस्तुति।

    भावार्थ

    (अथा) और (ते) तेरे (अन्तमानां) अति समीप प्राप्त तुझ तक पहुंचे हुए (सुमतीनाम्) उत्तम मननशील विद्वानों के संग से (ते विद्याम) हम तेरे स्वरूप का ज्ञान करें। तू (नः) हमें (आगहि) प्राप्त हो। तू (नः) हमें (मा अति ख्यः) कभी अति क्रमण मत कर, हमें मत भूल।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मधुच्छन्दा ऋषिः। इन्द्रो देवता। १-३ गायत्र्यः। शेषाः पूर्वोक्ताः। षोडशचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Indra, lord of light and knowledge, come, so that we know you at the closest of those who are established in you and hold you in their heart and vision. Come, lord of life, come close, forsake us not.

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    Translation

    We know of the learned men who are in close contact. You do not neglect us and come to us.

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    Translation

    We know of the learned men who are in close contact. You do not neglect us and come to us.

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    Translation

    O Lord, let us realise The real form from the wise persons given to deep meditation and who have attained Thy company and nearness. Reveal Thyself to us, but don’t neglect us.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(अथ) अनन्तरम् (ते) तव (अन्तमानाम्) अन्तः सामीप्यम्। अत इनिठनौ। पा० ।२।११। इति अन्त-ठन् प्रत्ययः। ततोऽतिशायिने तमप्। पृषोदरादित्वात् तिक्शब्दस्य लोपः। अन्तमानाम्, अन्तिकनाम-निघ० २।१६। अन्तिकतमानाम्। अतिशयेन समीपस्थानाम् (विद्याम) वेत्तेर्लङ्। ज्ञानं कुर्याम, (मा) निषेधे (नः) अस्मान् (अति) अतीत्य। उल्लङ्घ्य। (ख्यः) ख्या प्रकथने लुङ्। माङ्योगेऽडभावः। प्रकथय (आ गहि) आगच्छ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    ১-১০ মনুষ্যকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    [হে রাজন্ !] (অথ) এবং (তে) তোমার (অন্তমানাম্) অভ্যন্তরে স্থিত (সুমতীনাম্) উৎকৃষ্ট বুদ্ধিবৃত্তি (বিদ্যাম) আমরা জ্ঞান করি/জ্ঞাত হই/প্রাপ্ত করি। তুমি (নঃ) আমাদের (অতি) উল্লঙ্ঘন/পরিত্যাগ করে (মা খ্যঃ) বলো না, (আ গহি) তুমি এসো/আগমন করো ॥৩॥

    भावार्थ

    যখন রাজা পূর্ণ প্রীতি সহকারে প্রজাপালন করে, তখন প্রজাগণ রাজার ধার্মিক নীতি হতে লাভবান হয় এবং তাঁকে প্রীতি শ্রদ্ধা করে ॥৩॥

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    भाषार्थ

    (অথ) জ্ঞানপ্রকাশ প্রাপ্ত করলে, হে পরমেশ্বর! বেদে (তে) আপনার দ্বারা প্রদত্ত (অন্তমানাম্) অন্তিম প্রমাণরূপ (সুমতীনাম্) সুমতি (বিদ্যাম) আমরা জানি, এবং প্রাপ্ত করি। হে পরমেশ্বর! এবিষয়ে আপনি (নঃ) আমাদের (মা অতিখ্যঃ) প্রত্যাখ্যান করবেন না। (আ গহি) আপনি আমাদের মধ্যে প্রকট হন।

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