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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 63 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 63/ मन्त्र 9
    ऋषिः - पर्वतः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् सूक्तम् - सूक्त-६३
    42

    येन॒ सिन्धुं॑ म॒हीर॒पो रथाँ॑ इव प्रचो॒दयः॑। पन्था॑मृ॒तस्य॒ यात॑वे॒ तमी॑महे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    येन॑ । सिन्धु॑म् । म॒ही: । अ॒प: । रथा॑न्ऽइव । प्र॒ऽचो॒दय॑: ॥ पन्था॑म् । ऋ॒तस्य॑ । यात॑वे । तम् । ई॒म॒हे॒ ॥६३.९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    येन सिन्धुं महीरपो रथाँ इव प्रचोदयः। पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    येन । सिन्धुम् । मही: । अप: । रथान्ऽइव । प्रऽचोदय: ॥ पन्थाम् । ऋतस्य । यातवे । तम् । ईमहे ॥६३.९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 63; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ७-९ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे जगदीश्वर !] (येन) जिस [नियम] से (सिन्धुम्) समुद्र में (महीः) भारी (अपः) जलों को (रथान् इव) रथों के समान (प्रचोदयः) तूने चलाया है, (ऋतस्य) सत्य के (पन्थाम्) मार्ग पर (यातवे) चलने के लिये (तम्) उस [नियम] को (ईमहे) हम माँगते हैं ॥९॥

    भावार्थ

    जिस प्रकार नियम से परमात्मा अन्तरिक्ष और पृथिवी के समुद्र में जगत् के उपकार के लिये जल भरता और रीता करता है, वैसे ही परमेश्वर की उपासना के साथ हम नियमपूर्वक पुरुषार्थी होकर उपकार करें ॥९॥

    टिप्पणी

    ९−(येन) नियमेन (सिन्धुम्) अन्तरिक्षपृथिवीस्थसमुद्रं प्रति (मही) महतीः (अपः) जलानि (रथान्) (इव) यथा (प्रचोदयः) लुङि रूपम्। प्रेरितवानसि (पन्थाम्) पन्थानम् (ऋतस्य) सत्यस्य (यातवे) यातुम्। गन्तुम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    सोम-रक्षण के लाभ

    पदार्थ

    १. (येन) = जिस सोमपान-जनित मद से (सिन्धुम) = ज्ञाननदी को तथा (मही:) = उपासनावृत्तियों को और (अप:) = कर्मोंको, (रथान् इव) = शरीर-रथों को जैसे लक्ष्य की ओर, उसी प्रकार (प्रचोदयः) = आप प्रेरित करते हो (तम् ईमहे) = उस मद की हम याचना करते हैं। इस सोमपान-जनित मद से हमारे अन्दर ज्ञान-नदी प्रवाहित होती है, हमारे अन्दर उपासनावृत्ति जागती है तथा हम महत्त्वपूर्ण कर्मों को करते हैं और हमारा शरीर-रथ लक्ष्य की ओर चलता है। २. हम इसलिए सोमपान-जनित मद की याचना करते हैं कि हम (ऋतस्य) = यज्ञ के व सत्य के (पन्थाम् यातवे) = मार्ग पर चलनेवाले हों

    भावार्थ

    सोम-रक्षण से ज्ञान की प्राप्ति होती है, उपासनावृत्ति जागती है, हम उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, शरीर-रथ लक्ष्य की ओर बढ़ता है और हम ऋत व सत्य के मार्ग पर चलते इस सोम का रक्षण करनेवाला पुरुष 'नृमेध' बनता है-सबके साथ मिलकर चलनेवाला। यही अगले सूक्त के प्रथम तीन मन्त्रों का ऋषि है तथा चार से छह मन्त्रों तक 'विश्वमना:' ऋषि है-व्यापक मनवाला। यह नुमेध प्रार्थना करता है -

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    भाषार्थ

    (येन) यतः आप (सिन्धुम्) स्यन्दनशील नदियों और (महीः अपः) समुद्र की महा जलराशि को ऐसी आसानी से (प्रचोदयः) प्रेरित कर रहे हैं (इव) जैसे कि (रथान्) अश्वरथों तथा विमानरथों को आसानी से प्रेरित किया जाता है, और आपने (यातवे) जीवन यात्रा के लिए, (ऋतस्य) सच्चाई के (पन्थाम्) मार्ग को, वेदों द्वारा, (प्रचोदयः) प्रकाशित किया है, इसलिए (तम्) उस आपको (ईमहे) हम प्राप्त होते हैं।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    That power and passion of ecstasy by which you energise and move the river and the sea, the earths and waters like rolling chariots to flow and follow the path of the divine law of nature, that we adore, that we pray for, to follow the path of truth and yajna ourselves too.

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    Translation

    O Almighty God, we pray for that power through which you move the great waters like chariots to ocean for treading the path of law eternal.

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    Translation

    O Almighty God, we pray for that power through which you move the great waters like chariots to ocean for treading the path of law eternal.

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    Translation

    O Mighty God, we request Thee to grant us the same prowess and energy, with which Thou so efficiently directest and mobilisest the big channels of waters towards the oceans (both the terrestrial and interspatial) just as the driver directs the vehicles or other means of transport like the train or aeroplane; with which Thou moves the universe on the right path, according to Thy set laws of nature.

    Footnote

    (7-9) (i) These verses can be interpreted in case of king or commander, as well, (ii) Griffith’s reading of Adhrigu, Dashgava as persons is wrong.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ९−(येन) नियमेन (सिन्धुम्) अन्तरिक्षपृथिवीस्थसमुद्रं प्रति (मही) महतीः (अपः) जलानि (रथान्) (इव) यथा (प्रचोदयः) लुङि रूपम्। प्रेरितवानसि (पन्थाम्) पन्थानम् (ऋतस्य) सत्यस्य (यातवे) यातुम्। गन्तुम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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