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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अथर्वा देवता - चन्द्रमाः, सांमनस्यम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
    294

    येन॑ दे॒वा न वि॒यन्ति॒ नो च॑ विद्वि॒षते॑ मि॒थः। तत्कृ॑ण्मो॒ ब्रह्म॑ वो गृ॒हे सं॒ज्ञानं॒ पुरु॑षेभ्यः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    येन॑ । दे॒वा: । न । वि॒ऽयन्ति॑ । नो इति॑ । च॒ । वि॒ऽद्वि॒षते॑ । मि॒थ: । तत् । कृ॒ण्म॒: । ब्रह्म॑ । व॒: । गृ॒हे । स॒म्ऽज्ञान॑म् । पुरु॑षेभ्य: ॥३०.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः। तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    येन । देवा: । न । विऽयन्ति । नो इति । च । विऽद्विषते । मिथ: । तत् । कृण्म: । ब्रह्म । व: । गृहे । सम्ऽज्ञानम् । पुरुषेभ्य: ॥३०.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 30; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (6)

    विषय

    परस्पर मेल का उपदेश।

    पदार्थ

    (येन) जिस [वेद पथ] से (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (न) नहीं (वियन्ति) विरुद्ध चलते हैं (च) और (नो) न कभी (मिथः) आपस में (विद्विषते) विद्वेष करते हैं। (तत्) उस (ब्रह्म) वेद पथ को (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (पुरुषेभ्यः) सब पुरुषों के लिये (संज्ञानम्) ठीक-ठीक ज्ञान का कारण (कृण्मः) हम करते हैं ॥४॥

    भावार्थ

    सार्वभौम हितकारी वेदमार्ग पर चलकर घर के सब लोग आनन्द भोगें ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(देवाः) विजिगीषवः (वियन्ति) इण् गतौ। विरुद्धं गच्छन्ति (विद्विषते) द्विष अप्रीतौ-अदादिः। विद्वेषं कुर्वते (मिथः) परस्परम् (कृण्मः) कृवि हिंसाकरणयोः। कुर्मः (ब्रह्म) वेदज्ञानम् (संज्ञानम्) सम्यग् ज्ञानम्। अन्यत् सुगमम् ॥

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    विषय

    निर्द्वेषता-साधक ज्ञान

    पदार्थ

    १. (येन) = जिससे (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (न वियन्ति) = परस्पर विरुद्ध गतिवाले नहीं होते (च) = और (मिथ:) = परस्पर (नो विद्विषते) = द्वेष नहीं करते (तत्) = उस (ब्रह्म) = ज्ञान को (वः गृहे)  =  तुम्हारे घरों में (कृण्म:) = करते हैं। २. यह ज्ञान (पुरुषेभ्यः) = पुरुषों के लिए (संज्ञानम्) = परस्पर ऐक्यमत्य का उत्पादक होता है। ज्ञान प्राप्त करके पुरुष परस्पर सांमनस्यवाले होते हैं।

    भावार्थ

    घर में सबकी वृत्ति ज्ञानप्रधान होगी तो परस्पर एकता बनी रहेगी। ज्ञान के साथ द्वेषवृत्ति नहीं रहती।

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    पदार्थ

    शब्दार्थ =  ( येन ) = जिस वैदिक मार्ग से  ( देवा: ) = विद्वान् पुरुष  ( न वियन्ति ) = विरुद्ध नहीं चलते  ( च ) = और (  नो ) = न कभी  ( मिथः ) =  आपस में  ( विद्विषते ) = द्वेष करते हैं।  ( तत् ) = उस  ( ब्रह्म ) =  वेदमार्ग को  ( वः ) = तुम्हारे  ( गृहे ) = घर में  ( पुरुषेभ्यः ) = सब पुरुषों के लिए  ( संज्ञानम् ) = ठीक-ठीक ज्ञान का कारण  ( कृण्म: ) = हम करते हैं । 

    भावार्थ

    भावार्थ = परमदयालु परमात्मा हमें सुखी बनाने के लिए वेदमन्त्रों द्वारा अति उत्तम उपदेश कर रहे हैं। सब विद्वानों को चाहिये कि वैदिक धर्म से विरुद्ध कभी न चलें, न आपस में कभी विद्वेष करें। इस वेद पथ का ही हमारे कल्याण के लिए यथार्थ रूप से उपदेश किया है ।

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    भाषार्थ

    (येन) जिस द्वारा (देवाः) माता-पिता आदि देव (न वियन्ति) न विरुद्ध-विरुद्ध मार्ग पर चलते हैं, (नो च) और न (मिथः) परस्पर (विद्विषते) विद्वेष करते हैं, (तत्) उस (ब्रह्म) अर्थात् वेद को (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (कृण्मः) हम नियम करते हैं, जोकि (पुरुषेभ्यः) गृहस्थ पुरुषों के लिए (संज्ञानम्) गृहजीवन सम्बन्धी यथार्थ ज्ञान देता है। देवा:=मातृदेवो भव, पितृदेवोभव, आचार्यदेवो भव (तैत्तिरीय उपनिषद् अनुवाक ११, संदर्भ २)। गृहस्थ पुरुषों के लिए वेदस्वाध्याय नियत किया है, ताकि उन्हें गृहस्थ धर्म का सम्यक्-ज्ञान हो सके।

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    विषय

    वेद क्यों पढ़ें

    शब्दार्थ

    (येन) जिस वेदज्ञान को प्राप्त करके (देवाः) देवगण ज्ञानी लोग (न वियन्ति) एक-दूसरे का विरोध नहीं करते, एक-दूसरे से अलग होकर नहीं चलते (नो च) और न ही (मिथः) परस्पर (विद्विषते) द्वेष करते हैं (तत्) उस (ब्रह्म) वेदज्ञान को (संज्ञानम्) जो कि सम्यक् ज्ञान देनेवाला है (व:) तुम्हारे (गृहे) घरों में (पुरुषेभ्यः) सभी पुरुषों के लिए (कृण्मः) करते हैं, देते हैं ।

    भावार्थ

    प्रयोजन के बिना मूर्ख भी किसी कार्य को नहीं करता । हम वेद क्यों पढ़ें ? वेद पढ़ने से हमें क्या लाभ होगा ? मन्त्र में इसी प्रश्न और जिज्ञासा का सुन्दर उत्तर है । १. वेद के पढ़नेवाले एक-दूसरे का विरोध नहीं करते, वे एक-दूसरे से अलग होकर नहीं चलते। वेद सबको केन्द्रित करके एक बना देता है । २. वेद पढ़नेवालों में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या, द्वेष और घृणा भावना नहीं होती। यदि एक व्यक्ति उन्नति कर रहा है तो दूसरा उसे देखकर जलता नहीं । ३. वेद सम्यक् एवं यथार्थ ज्ञान देनेवाला है । वेद के ज्ञान में कोई कमी अथवा त्रुटि नहीं होती। ४. ऐसा सम्यक् ज्ञान देनेवाला वेद प्रत्येक परिवार में, प्रत्येक घर में होना चाहिए । आज हमारे घरों में उपन्यास और किस्से-कहानियों की पुस्तकें मिल सकती हैं; वेदों के दर्शन होना कठिन है। यदि आपके घर में वेद नहीं हैं तो आज ही वेद लाकर अपने घर में रखिए ।

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    विषय

    परस्पर मिलकर एक चित्त होकर रहने का उपदेश ।

    भावार्थ

    (येन) जिस वेद-ज्ञान को प्राप्त करके (देवाः) देवगण, विद्वान् लोग (न वि-यन्ति) एक दूसरे का विरोध नहीं करते और (मिथः नो च विद्विपते) परस्पर भी द्वेष नहीं करते (पुरुषेभ्यः) समस्त पुरुषों को (सं ज्ञानं) उत्तम ज्ञान प्राप्त कराने वाले (तत्) उस (ब्रह्म) ब्रह्म अर्थात् वेदविज्ञान के उपदेश को (वः गृहे) आप लोगों के घर में (कृण्मः) करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। चन्द्रमाः सामनस्यञ्च देवता। १-४ अनुष्टुभः। ५ विराड् जगती। ६ प्रस्तार पंक्तिः। ७ त्रिष्टुप्। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Love and Unity

    Meaning

    That noble knowledge and awareness, and that state of divine peace and piety, do we create in your homes for people by virtue of which noble people do not fall apart, nor do they mutually oppose, nor treat each other with hate and jealousy.

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    Translation

    With which the enlightened ones are not alienated, nor there is hatred against each other, such a unifying prayer we make in your home for members of the house-hold.

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    Translation

    I, the upholder of the eternal law, initiate you that firm code of conduct for your home which the enlightened person never violate nor do they bear any malice against one another, so that it may serve as the guiding principle for all men.

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    Translation

    That Knowledge of the Vedas, through which the sages sever not, nor. Thee refers to desire. I refer to God ever bear each other hate, that unifying knowledge we spread in your house for men.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(देवाः) विजिगीषवः (वियन्ति) इण् गतौ। विरुद्धं गच्छन्ति (विद्विषते) द्विष अप्रीतौ-अदादिः। विद्वेषं कुर्वते (मिथः) परस्परम् (कृण्मः) कृवि हिंसाकरणयोः। कुर्मः (ब्रह्म) वेदज्ञानम् (संज्ञानम्) सम्यग् ज्ञानम्। अन्यत् सुगमम् ॥

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    बंगाली (3)

    পদার্থ

    য়েন দেবা ন বিয়ন্তি নো চ বিদ্বিষতৈ মিথঃ ।

    তৎকৃণ্মো ব্রহ্ম বো গৃহে সংজ্ঞানং পুরুষেভ্যঃ ।।৯৪।।

    (অথর্ব ৩।৩০।৪)

    পদার্থঃ (দেবাঃ) বিদ্বান পুরুষেরা (য়েন) যেন (ন বিয়ন্তি) বিরোধিতা না করে (চ) এবং (নো) কখনো (মিথঃ) নিজেদের ভেতর (বিদ্বিষতৈ) দ্বেষ না করে। (তন্) এই (ব্রহ্ম) বেদমার্গকে (বঃ) তোমাদের  (গৃহে) জগৎরূপ গৃহে (পুরুষেভ্যঃ) সব পুরুষের জন্য (সংজ্ঞানম্) সঠিক জ্ঞানের কারণ হিসেবে (কৃণ্মঃ) আমি এই উপদেশ প্রদান করি।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ পরমদয়ালু পরমাত্মা আমাদের সুখী বানানোর জন্য বেদমন্ত্র দ্বারা অতি উত্তম উপদেশ দিয়েছেন। সব বিদ্বানগণের উচিত কখনো বৈদিক ধর্মের বিরুদ্ধে না যাওয়া, নিজেদের ভেতর কখনো ঝগড়া না করে আমাদের কল্যাণের জন্য এই বেদ মার্গেরই যথার্থ রূপে উপদেশ প্রদান করা।।৯৪।।

     

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    भाषार्थ

    (যেন) যা দ্বারা (দেবাঃ) মাতা-পিতা আদি দেবগণ (ন বিযন্তি) না পরস্পরের বিরুদ্ধ পথে চলে, (নো চ) এবং না (মিথঃ) পরস্পর (বিদ্বিষতে) বিদ্বেষ করে, (তৎ) সেই (ব্রহ্ম) অর্থাৎ বেদকে (বঃ) তোমাদের (গৃহে) গৃহে (কৃণ্মঃ) আমরা নিয়ত করি, যা (পুরুষেভ্যঃ) গৃহস্থ পুরুষদের জন্য (সংজ্ঞানম্) গৃহজীবন সম্বন্ধিত যথার্থ জ্ঞান প্রদান করে।

    टिप्पणी

    [দেবাঃ= মাতৃদেবো ভব, পিতৃদেবো ভব, আচার্যদেবো ভব (তৈত্তিরীয় উপনিষদ্ অনুবাক ১১, সন্দর্ভ ২)। গৃহস্থ পুরুষদের জন্য বেদ স্বাধ্যায় নিয়ত করা হয়েছে, যাতে তাঁরা গৃহস্থধর্মের সম্যক্-জ্ঞান প্রাপ্ত করতে পারে।]

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    मन्त्र विषय

    পরস্পরপ্রীত্যুদেশঃ

    भाषार्थ

    (যেন) যে [বেদ পথ] দ্বারা (দেবাঃ) বিজয়াকাঙ্ক্ষী/বিজয় অভিলাষী পুরুষ (ন) না (বিযন্তি) বিরুদ্ধগমন করে (চ) এবং (নো) না কখনো (মিথঃ) নিজেদের/পরস্পরের মধ্যে (বিদ্বিষতে) বিদ্বেষ করে। (তৎ) সেই (ব্রহ্ম) বেদ পথকে (বঃ) তোমাদের (গৃহে) গৃহে (পুরুষেভ্যঃ) সমস্ত পুরুষদের জন্য (সংজ্ঞানম্) সঠিক জ্ঞানের কারণ (কৃণ্মঃ) আমরা করি॥৪॥

    भावार्थ

    সার্বভৌম হিতকারী বেদ মার্গে চালিত হয়ে ঘরের সবাই আনন্দ ভোগ করুক॥৪॥

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