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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 30 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - चन्द्रमाः, सांमनस्यम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
    379

    सहृ॑दयं सांमन॒स्यमवि॑द्वेषं कृणोमि वः। अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सऽहृ॑दयम् । सा॒म्ऽम॒न॒स्यम् । अवि॑ऽद्वेषम् । कृ॒णो॒मि॒ । व॒: । अ॒न्य: । अ॒न्यम् । अ॒भि । ह॒र्य॒त॒ । व॒त्सम् । जा॒तम्ऽइ॑व । अ॒घ्न्या ॥३०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सऽहृदयम् । साम्ऽमनस्यम् । अविऽद्वेषम् । कृणोमि । व: । अन्य: । अन्यम् । अभि । हर्यत । वत्सम् । जातम्ऽइव । अघ्न्या ॥३०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 30; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (4)

    विषय

    परस्पर मेल का उपदेश।

    पदार्थ

    (सहृदयम्) एकहृदयता, (सांमनस्यम्) एकमनता और (अविद्वेषम्) निर्वैरता (वः) तुम्हारे लिये (कृणोमि) मैं करता हूँ। (अन्यो अन्यम्) एक दूसरे को (अभि) सब ओर से (हर्यत) तुम प्रीति से चाहो (अघ्न्या इव) जैसे न मारने योग्य, गौ (जातम्) उत्पन्न हुए (वत्सम्) बछड़े को [प्यार करती है] ॥१॥

    भावार्थ

    ईश्वर उपदेश करता है, सब मनुष्य वेदानुगामी होकर सत्य ग्रहण करके एकमतता करें और आपा छोड़कर सच्चे प्रेम से एक दूसरे को सुधारें, जैसे गौ आपा छोड़कर तद्रूप होकर पूर्ण प्रीति से उत्पन्न हुए बच्चे को जीभ से चाटकर शुद्ध करती और खड़ा करके दूध पिलाती और पुष्ट करती है ॥१॥

    टिप्पणी

    १−तैत्तिरीयारण्यक में पाठ है−ओ३म्। सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। तैत्ति० आ० १०।१ ॥ ओ३म्। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (अवतु) बचावे। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (भुनक्तु) पाले। हम दोनों (सह) मिलकर (वीर्यम्) उत्साह (करवावहै) करें। (नौ) हम दोनों का (अधीतम्) पढ़ा हुआ (तेजस्वि) तेजस्वी (अस्तु) होवे। (मा विद्विषावहै) हम दोनों झगड़ा न करें ॥ भगवान् यास्क मुनि कहते हैं। (अघ्न्या) गौ का नाम है−निघ० २।११। वह अहन्तव्या, [अवध्या न मारने योग्य] अथवा, अघघ्नी [पाप अर्थात् शारीरिक दुःख अथवा दुर्भिक्षादि पीड़ा नाश करनेवाली] होती है−निरुक्त ११।४३ ॥ श्रीमान् महीधर यजुर्वेदभाष्य अ० १ म० १ में लिखते हैं−अघ्न्या गौएँ हैं। गोवध उपपातक ‘भारी पाप’ है, इसलिये वे न मारने योग्य ‘अघ्न्या’ कही जाती हैं ॥ १−(सहृदयम्) वृह्रोः षुग्दुकौ च। उ० ४।१०। इति हृञ् हरणे=स्वीकारे कयन्, दुक् च। सहस्य सभावः। सहग्रहणम्। सहवीर्यम्। (सांमनस्यम्) सम्+मनस्-भावे ष्यञ्। समानमननत्वम्। ऐकमत्यम् (अविद्वेषम्)। द्विष वैरे-घञ्। अशत्रुताम्। सख्यम् (कृणोमि) उत्पादयामि। (वः) युष्मभ्यम्। (अन्यो अन्यम्) छान्दसं द्विपदत्वम्। परस्परम्। (अभि) सर्वतः। (हर्यत) हर्य गतिकान्त्योः। कामयध्वम्। (वत्सम्) अ० ३।१२।३। गोशिशुम्। (जातम्) नवोत्पन्नम्। (इव) यथा। (अघ्न्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। नञि अघे वोपपदे हन्तेर्यगन्तो निपातः। गौः-निघ० २।११। अघ्न्याहन्तव्या भवत्यघघ्नीति वा-निरु० ११।४३। अघ्न्याः। गावः। गोवधस्योपपानकरूपत्वाद्धन्तुमयोग्या अघ्न्या उच्यन्ते-इति श्रीमन्महीधरे यजुर्वेदभाष्ये १।१ ॥

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    विषय

    सहदयं, सांमनस्य, अविद्वेषम्

    पदार्थ

    १. मैं (व:) = तुम्हारे लिए (सहृदयम्) = सहृदयता, अर्थात् प्रेमपूर्ण हृदय, (सांमनस्यम्) = शुभ विचारों से परिपूर्ण मन और (अविद्वेषम्) = निर्वैरता (कृणोमि) = करता हूँ। २. तुममें से प्रत्येक (अन्य: अन्यम्) = एक-दूसरे को अभिहर्यत-प्रीति करनेवाला हो, (इव) = जैसे (अघ्न्या) = गौ (जातं वत्सम्) = उत्पन्न हुए हुए बछड़े के प्रति प्रेम करती है।

    भावार्थ

    घर में सहदयता, सांमनस्य व अविद्वेष का राज्य हो। सब एक-दूसरे के प्रति प्रेम करनेवाले हों।

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    पदार्थ

    शब्दार्थ = हे मनुष्यो !  ( वः ) = तुम्हारा  ( सहृदयम् ) = जैसे अपने लिये सुख चाहते हो ऐसे दूसरों के लिए भी समान हृदय रहो  ( सांमनस्यम् ) = मन से सम्यक् प्रसन्नता और  ( अविद्वेषम् ) = वैर-विरोध आदि रहित व्यवहार को आप लोगों के लिए  ( कृणोमि ) = स्थिर करता हूँ तुम  ( अघ्न्या ) = हनन न करने योग्य गाय  ( वत्सं जातमिव ) = उत्पन्न हुए बछड़े पर प्रेम से जैसे वर्तती है वैसे  ( अन्योऽन्यम् ) = एक दूसरे से  ( अभिहर्यत ) = प्रेमपूर्वक कामना से वर्ता करो ।

    भावार्थ

    भावार्थ =  परमकृपालु परमात्मा हमें उपदेश देते हैं, कि हे मेरे प्यारे पुत्रो! तुम लोग आपस में एक-दूसरे के सहायक और आपस में प्रेम करनेवाले बनो, आपस में वैर विरोध आदि कभी मत करो, जैसे गौ अपने नवीन उत्पन्न हुए बछड़े से अत्यन्त प्रेम करती और उसकी सर्वथा रक्षा करती है, ऐसे आप लोग आपस में परम प्रेम करते हुए एक दूसरे की रक्षा करो, कभी आपस में वैरविरोध आदि न किया करो, तभी आप लोगों का कल्याण होगा अन्यथा कभी नहीं। यह उपदेश आप का कल्याण करनेवाला है इसको हमें कभी नहीं भूलना चाहिये।

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    भाषार्थ

    [हे सद्गृहस्थो!] (व:) तुम्हारे लिए (सहृदय) समानहृदय, (सांमनस्यम्) समान मन, (अविद्वेषम्) द्वेष का अभाव (कृणोमि) मैं परमेश्वर नियत करता हूँ, (अन्यो अन्यम्) परस्पर एक-दूसरे की (अभिहर्यत) कामना किया करो, एक-दूसरे को चाहा करो। (अघ्न्या जातं वत्समिव) गौ जैसे नवजात वत्स को चाहती है।

    टिप्पणी

    [हदयों की समानता है भावनाओं की समानता, परस्पर प्रेम। मनों की समानता है विचारों की समानता। दो प्रकार की समानता हो जाने पर पारस्परिक द्वेष का अभाव हो जाता है। तथा परस्पर के साथ मिलने की कामना अर्थात् इच्छा किया करो, जैसेकि गौ नवजात निज वत्स को चाहती है, उसके साथ प्रेम करती है। अघ्न्या का अर्थ है, न हन्तव्याः, जिसका कि हनन न करना चाहिए।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Love and Unity

    Meaning

    I create you as a community with love at heart, unity of mind and freedom from hate and jealousy. Let everyone love everyone and all others as the sacred, inviolable mother cow loves and caresses the new born baby calf.

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    Subject

    Sam-manasyam - Harmony

    Translation

    I hereby bring about unity of your hearts and unity of minds, free from malice. May each one of you love the other as a cow loves its new-born calf.

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    Translation

    O Ye mankind; I the ordainer of unity and uniformity of nature, appoint you to have accordance in your heart, unanimity in your minds and exemption from hatred and aversion. All of you ought to love one another in every sweet manner just as cow loveth her newly born calf.

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    Translation

    Freedom from hate I bring to you, concord and unanimity. Love one another as the cow loveth the calf that she hath borne.

    Footnote

    ‘I’ refers to God.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−तैत्तिरीयारण्यक में पाठ है−ओ३म्। सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। तैत्ति० आ० १०।१ ॥ ओ३म्। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (अवतु) बचावे। (सह) वही (नौ) हम दोनों को (भुनक्तु) पाले। हम दोनों (सह) मिलकर (वीर्यम्) उत्साह (करवावहै) करें। (नौ) हम दोनों का (अधीतम्) पढ़ा हुआ (तेजस्वि) तेजस्वी (अस्तु) होवे। (मा विद्विषावहै) हम दोनों झगड़ा न करें ॥ भगवान् यास्क मुनि कहते हैं। (अघ्न्या) गौ का नाम है−निघ० २।११। वह अहन्तव्या, [अवध्या न मारने योग्य] अथवा, अघघ्नी [पाप अर्थात् शारीरिक दुःख अथवा दुर्भिक्षादि पीड़ा नाश करनेवाली] होती है−निरुक्त ११।४३ ॥ श्रीमान् महीधर यजुर्वेदभाष्य अ० १ म० १ में लिखते हैं−अघ्न्या गौएँ हैं। गोवध उपपातक ‘भारी पाप’ है, इसलिये वे न मारने योग्य ‘अघ्न्या’ कही जाती हैं ॥ १−(सहृदयम्) वृह्रोः षुग्दुकौ च। उ० ४।१०। इति हृञ् हरणे=स्वीकारे कयन्, दुक् च। सहस्य सभावः। सहग्रहणम्। सहवीर्यम्। (सांमनस्यम्) सम्+मनस्-भावे ष्यञ्। समानमननत्वम्। ऐकमत्यम् (अविद्वेषम्)। द्विष वैरे-घञ्। अशत्रुताम्। सख्यम् (कृणोमि) उत्पादयामि। (वः) युष्मभ्यम्। (अन्यो अन्यम्) छान्दसं द्विपदत्वम्। परस्परम्। (अभि) सर्वतः। (हर्यत) हर्य गतिकान्त्योः। कामयध्वम्। (वत्सम्) अ० ३।१२।३। गोशिशुम्। (जातम्) नवोत्पन्नम्। (इव) यथा। (अघ्न्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। नञि अघे वोपपदे हन्तेर्यगन्तो निपातः। गौः-निघ० २।११। अघ्न्याहन्तव्या भवत्यघघ्नीति वा-निरु० ११।४३। अघ्न्याः। गावः। गोवधस्योपपानकरूपत्वाद्धन्तुमयोग्या अघ्न्या उच्यन्ते-इति श्रीमन्महीधरे यजुर्वेदभाष्ये १।१ ॥

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    সহৃদয়ং সাংমনস্যমবিদ্বেষং কৃণোমি বঃ।

    অন্যো অন্যমভি হর্য়ত বৎসং জাতমিবাঘ্ন্যা।।২৬।।

    (অথর্ব ৩।৩০।১)

    পদার্থঃ হে মানুষ! (বঃ) তোমরা (সহৃদয়ং) যেভাবে নিজের জন্য সুখ কামনা করো, তেমনই অন্যের জন্য সম-হৃদয়ভাব রাখ। (সাংমনস্যম্) মনে সম্যক প্রসন্নতা আর (অবিদ্বেষম্) বৈরিতা বিরোধশূন্য ব্যবহারকে তোমাদের জন্য (কৃণোমি) আমি স্থির করেছি। (অঘ্ন্যা) হনন অযোগ্য গাভী (বৎসং জাতম্ ইব) উৎপন্ন হওয়া বাছুরের প্রতি প্রেমের সহিত যেভাবে যত্ন করে থাকে, সেভাবেই তোমরা (অন্যো অন্যম) একে অপরের সাথে (অভিহর্য়ত) প্রেমপূর্বক কামনায় যত্ন করো।

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ পরম কৃপালু পরমাত্মা  উপদেশ দিচ্ছেন, হে আমার প্রিয় পুত্রগণ! তোমরা নিজেরা একে অপরের সহায়ক হও এবং নিজেরা ভালোবাসার বন্ধনে আবদ্ধ হও। নিজেদের মধ্যে বৈরিতা বিবাদ ইত্যাদি কখনো করো না। যেভাবে গো-মাতা নিজের নতুন জন্ম নেয়া বাছুরকে অত্যন্ত ভালোবেসে তাকে সর্বদা রক্ষা করে, সেভাবেই তোমরা নিজেদের মধ্যে পরম ভালোবাসায় একে অপরকে রক্ষা করো। কখনো নিজেদের মধ্যে বৈরিতা বা বিরোধ কোরো না। তাহলেই তোমাদের কল্যাণ হবে, নইলে কখনো হবে না। এই উপদেশ তোমাদের কল্যাণের জন্য এই উপদেশ কখনো ভুলো না, সদা মনে রেখ ।।২৬।।

     

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