अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 30/ मन्त्र 5
ऋषिः - अथर्वा
देवता - चन्द्रमाः, सांमनस्यम्
छन्दः - विराड्जगती
सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
252
ज्याय॑स्वन्तश्चि॒त्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट संरा॒धय॑न्तः॒ सधु॑रा॒श्चर॑न्तः। अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒ल्गु वद॑न्त॒ एत॑ सध्री॒चीना॑न्वः॒ संम॑नसस्कृणोमि ॥
स्वर सहित पद पाठज्याय॑स्वन्त: । चि॒त्तिन॑: । मा । वि । यौ॒ष्ट॒ । स॒म्ऽरा॒धय॑न्त: । स॑ऽधु॑रा: । चर॑न्त: । अ॒न्य: । अ॒न्यस्मै॑ । व॒ल्गु । वद॑न्त: । आ । इ॒त॒ । स॒ध्री॒चीना॑न् । व॒: । सम्ऽम॑नस: । कृ॒णो॒मि॒ ॥३०.५॥
स्वर रहित मन्त्र
ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः। अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोमि ॥
स्वर रहित पद पाठज्यायस्वन्त: । चित्तिन: । मा । वि । यौष्ट । सम्ऽराधयन्त: । सऽधुरा: । चरन्त: । अन्य: । अन्यस्मै । वल्गु । वदन्त: । आ । इत । सध्रीचीनान् । व: । सम्ऽमनस: । कृणोमि ॥३०.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परस्पर मेल का उपदेश।
पदार्थ
(ज्यायस्वन्तः) बड़ों का मान रखनेवाले (चित्तिनः) उत्तम चित्तवाले, (संराधयन्तः) समृद्धि [धन धान्य की वृद्धि] करते हुए और (सधुराः) एक धुरा होकर (चरन्तः) चलते हुए तुम लोग (मा वि यौष्ट) अलग-अलग न होओ, और (अन्यो अन्यस्मै) एक दूसरे से (वल्गु) मनोहर (वदन्तः) बोलते हुए (एत) आओ। (वः) तुमको (सध्रीचीनान्) साथ-साथ गति [उद्योग वा विज्ञान] वाले और (संमनसः) एक मनवाले (कृणोमि) मैं करता हूँ ॥५॥
भावार्थ
वेदानुयायी मनुष्य विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्धों का आदर करके उत्तम गुणों की प्राप्ति, और मिलकर उद्योग से, धन धान्य राज आदि बढ़ाते और आनन्द भोगते हैं ॥५॥
टिप्पणी
५−(ज्यायस्वन्तः) ज्यायस्-वन्तः। ज्य च। वृद्धस्य च। पा० ५।३।६१, ६२। इति प्रशस्यस्य वृद्धस्य वा ज्य इत्यादेशः, ईयसुनि प्रत्यये। ज्यादादीयसः। पा० ६।४।१६०। इति ईकारस्य आकारः। ततो मतुप् प्रशंसायाम्। ज्यायांसो प्रशस्या वृद्धा वा प्रशंसनीया येषां ते तथोक्ताः। (चित्तिनः) उत्तमचित्तवन्तः। (मा वि यौष्ट) यु मिश्रणामिश्रणयोः, माङि लुङि रूपम्। इडभावश्छान्दसः। मा पृथग् भूत। वियुक्ता मा भवत। (संराधयन्तः) राध संसिद्धौ, णिच्-शतृ। सम्यक् संसिद्धिकाः। समानकार्याः। (सधुराः) ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे। पा० ५।४।७४। इति सह+धुर-अकारः। समासान्तः। सहकार्योद्वहनाः। (चरन्तः) गच्छन्तः। (वल्गु) अ० २।३६।१। मनोहरम्। प्रियवाक्यम्। (वदन्तः) भाषमाणाः (एत) आ+इत। आगच्छत (सध्रीचीनान्) ऋत्विग्दधृक्। पा० ३।२।५९। इति सह+अञ्चू गतिपूजनयोः-क्विन्। सहस्य सध्रिः। पा० ६।३।९५। इति सध्रि। विभाषाञ्चेरदिक् स्त्रियाम्। पा० ५।४।८। इति स्वार्थिकः खः। अकारलोपे दीर्घत्वम्। सहाञ्चतः कार्येषु सहप्रवृत्तान् (समनसः) समानमनस्कान्। (कृणोमि) करोमि ॥
विषय
घर का नियम [बड़ों का आदर]
पदार्थ
१. (ज्यायस्वन्त:) = बड़ों को मान देनेवाले (चित्तिन:) = उत्तम चित्तवाले (संराधयन्त:) = मिलकर कार्य को सिद्ध करनेवाले, (सधुरा:) = समान कार्यभार का वहन करनेवाले, (चरन्त:) = क्रियाशील होते हुए (मा वियोष्ट) = विरोधवाले मत होओ-एक-दूसरे से अलग मत होओ। २. (अन्यः अन्यस्मै) = एक दूसरे के लिए (वल्गु वदन्तः एत) = मधुर भाषण करते हुए गति करो। (वः) = तुम्हें (सधीचीनान्) = मिलकर पुरुषार्थ करनेवाले व (संमनस:) = एक विचार से युक्त मनवाले (कृणोमि) = करता हूँ।
भावार्थ
घर में बड़ों का आदर हो, सब मिलकर-अविरुद्धभाव से कार्य करें। परस्पर प्रिय बोलें।
भाषार्थ
(ज्यायस्वन्तः) बुजुर्गों की सत्तावाले, (चित्तिनः) निज-निज कर्तव्यों में सचेत, (संराधयन्तः) मिलकर गृह्यकार्यों को सिद्ध करते हुए, (सधुराः) गृहशकट को समान धुरा में (चरन्तः) मिलकर चलते हुए (मा वि यौष्ट) परस्पर वियुक्त अर्थात् पृथक् न होओ। (अन्यो अन्यस्मै) एक दूसरे के लिए (वल्गुः) शोभन अर्थात् प्रियवचन (वदन्तः) बोलते हुए (एत) घर में आया करो, (सध्रीचीनान् वः) साथ-साथ गृहकार्यों में चलते हुए तुम्हें (संमनसः) एक विचारोंवाले (कृणोमि) मैं परमेश्वर करता हूँ।
टिप्पणी
[सधुरा:=शकट की एक-धुरा में लगे बैल जैसे परस्पर मिलकर चलते हैं, वैसे गृहस्थ-शकट की धुरा में लगकर तुम सब परस्पर मिलकर चला करो। एत= बाहर के कामों से निवृत्त होकर जब घर आया करो, तो एक-दूसरे के प्रति प्रियभाषण किया करो।]
विषय
परस्पर मिलकर एक चित्त होकर रहने का उपदेश ।
भावार्थ
हे मनुष्यो ! श्राप लोग (ज्यायस्वन्तः) एक दूसरे से बड़े और श्रेष्ठ गुण सम्पन्न होकर भी (चित्तिनः) समानचित्त होकर (संराधयन्तः) समान कार्य का साधन करते हुए (सधुराः) एक ही प्रकार के भार उठाते हुए, अथवा समान रूप से एक ही धुरा = केन्द्र में बद्ध होकर विचरण करते हुए (मा वि यौष्ट) कभी एक दूसरे से जुदा मत होओ। और (अन्यः अन्यस्मै) एक दूसरे के प्रति (वल्गु वदन्तः) मनोहर वचनों का प्रयोग करते हुए (एत) एक दूसरे से मिलो और आओ (सध्रीचीनान्) समान रूप से एक ही स्थान पर एकत्र हुए (वः) तुम लोगों को मैं (संमनसः) एक ही चित्त और मन वाला (कृणोमि) बनाता हूं। अर्थात् वैसा होने का उपदेश करता हूं।
टिप्पणी
(द्वि०) ‘सुधीराश्च’ इति पैप्प० सं०। (च०) ‘समग्रास्थ सध्र’ पैप्प० सं०। (तृ०) ‘ऐत’ इति सायणः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। चन्द्रमाः सामनस्यञ्च देवता। १-४ अनुष्टुभः। ५ विराड् जगती। ६ प्रस्तार पंक्तिः। ७ त्रिष्टुप्। सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Love and Unity
Meaning
Even though excelling and surpassing one another, stay united at heart, all of equal mind. Never disunite, never separate, go on, achieve the goal, bearing social responsibilities together, moving like spokes of the wheel on the centre axle. Go forward calling and exhorting one another with words of love and encouragement. I have created you all and join you all as one community, one at heart, one in mind as one nation, one family.
Translation
Behaving -properly towards the elders and the yonders, considerate, pleasing each other and working for common good, may you never part company. Come here each talking affectionately to the other. I hereby make you straightforward and (one-minded); unanimous (one-aimed).
Translation
O, Ye mankind; who are respectful to elders possessing noble hearts, friendly in your undertakings of acquiring wealth and walking in the Same path bearing the common yoke together be never disunited with one another, come I make you one-intentioned and one-minded, let each one of you speak sweetly to the other.
Translation
Obedient to the elders, intelligent. Rest united friendly and kind, bearing the yoke together. Come, speaking sweetly each one to the other. I Make you one intentioned and one-minded.
Footnote
I refers to God. Bearing the yoke: Men should jointly discharge the burden of their responsibility.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(ज्यायस्वन्तः) ज्यायस्-वन्तः। ज्य च। वृद्धस्य च। पा० ५।३।६१, ६२। इति प्रशस्यस्य वृद्धस्य वा ज्य इत्यादेशः, ईयसुनि प्रत्यये। ज्यादादीयसः। पा० ६।४।१६०। इति ईकारस्य आकारः। ततो मतुप् प्रशंसायाम्। ज्यायांसो प्रशस्या वृद्धा वा प्रशंसनीया येषां ते तथोक्ताः। (चित्तिनः) उत्तमचित्तवन्तः। (मा वि यौष्ट) यु मिश्रणामिश्रणयोः, माङि लुङि रूपम्। इडभावश्छान्दसः। मा पृथग् भूत। वियुक्ता मा भवत। (संराधयन्तः) राध संसिद्धौ, णिच्-शतृ। सम्यक् संसिद्धिकाः। समानकार्याः। (सधुराः) ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे। पा० ५।४।७४। इति सह+धुर-अकारः। समासान्तः। सहकार्योद्वहनाः। (चरन्तः) गच्छन्तः। (वल्गु) अ० २।३६।१। मनोहरम्। प्रियवाक्यम्। (वदन्तः) भाषमाणाः (एत) आ+इत। आगच्छत (सध्रीचीनान्) ऋत्विग्दधृक्। पा० ३।२।५९। इति सह+अञ्चू गतिपूजनयोः-क्विन्। सहस्य सध्रिः। पा० ६।३।९५। इति सध्रि। विभाषाञ्चेरदिक् स्त्रियाम्। पा० ५।४।८। इति स्वार्थिकः खः। अकारलोपे दीर्घत्वम्। सहाञ्चतः कार्येषु सहप्रवृत्तान् (समनसः) समानमनस्कान्। (कृणोमि) करोमि ॥
बंगाली (2)
भाषार्थ
(জ্যায়স্বন্তঃ) গুরুজনের সত্তাযুক্ত (চিত্তিনঃ) নিজ-নিজ কর্তব্যে সচেতন, (সংরাধয়ন্তঃ) একসাথে গৃহ্যকার্যকে সিদ্ধ করে, (সধুরাঃ) গৃহশকটের সমান ধুরাতে (চরন্তঃ) একসাথে চলে (মা বি যৌষ্ট) পরস্পর বিযুক্ত অর্থাৎ পৃথক্ না হও। (অন্যো অন্যস্মৈ) একে-অপরের জন্য (বল্গুঃ) শোভন অর্থাৎ প্রিয়বচন (বদন্তঃ) বলে (এত) ঘরে এসো, (সধ্রীচীনান্ বঃ) একসাথে গৃহকার্যেরত তোমাদের (সংমনসঃ) সমান-বিচারের (কৃণোমি) আমি পরমেশ্বর করি।
टिप्पणी
[সধুরাঃ=শকট-এর এক-ধুরায় নিয়োজিত দুই বলদ যেমন পরস্পর একসাথে গমন করে, তেমনই গৃহস্থ-শকটের ধুরায় নিয়োজিত তোমরা সবাই পরস্পর একসাথে চলো। এত= বাইরের কাজ থেকে নিবৃত্ত হয়ে যখন ঘর আসবে, তখন একে-অপরের প্রতি প্রিয়ভাষণ করো।]
मन्त्र विषय
পরস্পরপ্রীত্যুদেশঃ
भाषार्थ
(জ্যায়স্বন্তঃ) গুরুজনদের সম্মান রক্ষাকারী (চিত্তিনঃ) উত্তম চিত্তযুক্ত, (সংরাধয়ন্তঃ) সমৃদ্ধি [ধন ধান্য এর বৃদ্ধি] করে এবং (সধুরাঃ) এক ধুরায় যুক্ত হয়ে (চরন্তঃ) চালিত হয়ে তোমরা (মা বি যৌষ্ট) আলাদা/বিযুক্ত/পৃথক হয়োনা, এবং (অন্যো অন্যস্মৈ) একে অপরকে (বল্গু) মনোহর (বদন্তঃ) বলতে বলতে (এত) এসো। (বঃ) তোমাদের (সধ্রীচীনান্) একসাথে গতি [উদ্যোগ বা বিজ্ঞান] সম্পন্ন এবং (সংমনসঃ) এক মনের/সমানমনস্ক (কৃণোমি) আমি করি॥৫।।
भावार्थ
বেদানুযায়ী মনুষ্য বিদ্যাবৃদ্ধ, ধনবৃদ্ধ, আয়ুবৃদ্ধদের আদর করে উত্তম গুণের প্রাপ্তি, ও একসাথে উদ্যোগ করে, ধন ধান্য রাজ আদি বৃদ্ধি করে এবং আনন্দ ভোগ করে ॥৫॥
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