Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 7 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 4
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - तारागणः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - यक्ष्मनाशन सूक्त
    49

    अ॒मू ये दि॒वि सु॒भगे॑ वि॒चृतौ॒ नाम॒ तार॑के। वि क्षे॑त्रि॒यस्य॑ मुञ्चतामध॒मं पाश॑मुत्त॒मम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒मू इति॑ । ये इति॑ । दि॒वि । सु॒भगे॒ इति॑ । सु॒ऽभगे॑ । वि॒ऽचृतौ॑ । नाम॑ । तार॑के॒ इति॑ । वि । क्षे॒त्रि॒यस्य॑ । मु॒ञ्च॒ता॒म् । अ॒ध॒मम् । पाश॑म् । उ॒त्ऽत॒मम् ॥७.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अमू ये दिवि सुभगे विचृतौ नाम तारके। वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अमू इति । ये इति । दिवि । सुभगे इति । सुऽभगे । विऽचृतौ । नाम । तारके इति । वि । क्षेत्रियस्य । मुञ्चताम् । अधमम् । पाशम् । उत्ऽतमम् ॥७.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 7; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रोग नाश करने के लिए उपदेश।

    पदार्थ

    (अमू) वे (ये) जो (सुभगे) बड़े ऐश्वर्यवाले (विचृतौ) [अन्धकार से] छुड़ानेवाले (नाम) प्रसिद्ध (तारके) दो तारे [सूर्य और चन्द्रमा] (दिवि) आकाश में हैं, वे दोनों (क्षेत्रियस्य) शरीर वा वंश के दोष वा रोग के (अधमम्) नीचे और (उत्तमम्) ऊँचे (पाशम्) पाश को (वि+मुञ्चताम्) छुड़ा देवे ॥४॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य और चन्द्रमा परस्पर आकर्षण से प्रकाश, वृष्टि और पुष्टि आदि देकर संसार का उपकार करते हैं, इसी प्रकार मनुष्य सुमार्ग में चलकर सब विघ्नों को हटाकर स्वस्थ और यशस्वी हों ॥४॥ यह मन्त्र अ० २।८।१। में कुछ भेद से आ चुका है ॥

    टिप्पणी

    ४−(अमू)। परिदृश्यमाने। (ये)। ज्ञाते। (दिवि)। द्युलोके। आकाशे। (सुभगे)। शोभनैश्वर्ययुक्ते। शिष्टं व्याख्यातम्-अ० २।८।१ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    विचतौ नाम तारके

    पदार्थ

    १. (अमू) = वे (ये) = जो (दिवि) = धुलोक में (सुभगे) = उत्तम श्री को प्राप्त करानेवाले (विचूतौ नाम) = रोगों का छेदन करनेवाले [to kill], दीप्त करनेवाले [to light] व दीप्त होनेवाले 'विचूतौ' नामवाले (तारके) = सूर्य-चन्द्ररूप तारे हैं, वे (क्षेत्रियस्य) = क्षेत्रिय रोग के (अधमम) = निचले शरीर-भाग में होनेवाले व (उत्तमम्) = ऊर्ध्व-भाग में होनेवाले (पाशम्) = पाश को (विमुञ्चताम्) = छुड़ाएँ। २. सूर्य और चन्द्र की किरणों को शरीर पर ठीक रूप से लेने से क्षेत्रिय रोग नष्ट हो जाते हैं, अत: जहाँ तक सम्भव हो खुले में रहना ही ठीक है।

    भावार्थ

    सूर्य व चन्द्र के सम्पर्क में जीवन बिताने से क्षेत्रिय रोगों का दूर होना सम्भव है।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (अमू ये) वे दो जोकि (सुभगे) उत्तम भाग्यशाली हैं, (विचृतौ नाम तारके) और विचृत्त नामवाले दो तारा (दिवि) द्युलोक में हैं, वे (अधमम्) शरीर के अधोभाग के, (उत्तमम्) तथा ऊर्ध्वभाग के (क्षेत्रियस्य) क्षेत्रिय रोगसम्बन्धी (पाशम्) फंदे को (वि मुञ्चताम्) विमुक्त करें।

    टिप्पणी

    [नाम=अथवा प्रसिद्ध" सुभगे=प्रकाशयुक्त होने से भाग्यशाली। विचृतौ=वि+चृत् (हिंसा), चृती हिंसाय्रन्थनयोः, तुदादिः)। "ये दो तारा, मूलनामक-नक्षत्र हैं" (सायण)। विचृतौ=वि+चृत्; क्विप+ द्विवचन। द्विवचन है नक्षत्र और तदधिष्ठान की अपेक्षा से (सायण) (अथर्व० २।८।१)। परन्तु मन्त्रानुसार ये दो तारा हैं, न कि मूखनक्षत्र तथा तदधिष्ठान। ये दो तारा वृश्चिक-राशि की पूंछ के डंक में है। क्षेत्रिय-रोग सम्भवतः शारीरिक है; क्षेत्र है शरीर "इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते" (गीता १३।१)। जिस काल में इन दो ताराओं का उदय हो, उस काल में क्षत्रिय रोग की चिकित्सा करने का विधान हुआ है। चिकित्सा का सम्बन्ध बाल के साथ भी होता है। काल का ध्यान न कर चिकित्सा करने से चिकित्सा अधिक लाभकारी नहीं होती।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    क्षेत्रिय व्याधियों का निवारण ।

    भावार्थ

    (दिवि) सिर में (ये) जो (सुभगे) सौभाग्यशील (विचृतौ नाम तारके) कष्ट बन्धनों के काटने वाले, तारक प्राण और अपान हैं वे दोनों (क्षेत्रियस्य) इस क्षेत्र अर्थात् शरीर में होने वाले (अधमं) नीच, नाभि से नीचे के देह में लगे और (उत्तमम्) नाभि से उपर के देह भाग में लगे (पाशं) व्याधि, अपस्मार आदि के रोगपाश को (वि मुञ्चताम्) विशेष रूप से मुक्त कर दें ।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘उद अगातां भगवती, अथर्व० २ । ८ । १ ॥ (तृ०) विक्षेत्रियं त्वा अभ्यानशे इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वंगिरा ऋषिः । यक्ष्मनाशनो देवता । १-५, ७ अनुष्टुभः । ६ भुरिक् । सप्तर्चं सूक्तम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Hereditary Disease

    Meaning

    Those two well known glorious stars shining in the sky, the sun and moon, which dispel darkness, may similarly release the patient from the snares of the chronic disease whether it is of the highest or of the lowest worst malignancy.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject

    Vidyut-Tarak

    Translation

    There in the sky are the two auspicious stars, vicrta (lit.releasers) by name. May they loosen the noose of the hereditary disease set in the lower limbs as well as in the upper limbs.(vicrtau nama tārake, a cluster of two stars called vicrta)

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Let these two brilliant vital breaths which have their existence in the wonderful body, loose the uppermost and lowest bond of chronic diseases.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    May these twin auspicious forces of Prana and Apana, residing in thehead, and releasers of suffering, free us from the bond of chronic malady,lurking in the lowest as well as the uppermost part of the body.

    Footnote

    See Atharva, 2-8-1.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(अमू)। परिदृश्यमाने। (ये)। ज्ञाते। (दिवि)। द्युलोके। आकाशे। (सुभगे)। शोभनैश्वर्ययुक्ते। शिष्टं व्याख्यातम्-अ० २।८।१ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    बंगाली (2)

    भाषार्थ

    (অমূ যে) সেই দুই যা (সুভগে) উত্তম ভাগ্যশালী, (বিচৃতৌ নাম তারকে) এবং বিচৃৎ নামবিশিষ্ট দুটি তারা (দিবি) দ্যুলোকে বিদ্যমান, তা (অধমম্) শরীরের অধোভাগের, (উত্তমম্) এবং ঊর্ধ্ব ভাগের (ক্ষেত্রিয়স্য) ক্ষেত্রিয়-রোগসম্বন্ধী (পাশম্) ফাঁদ/বন্ধন (বি মুঞ্চতাম্) বিমুক্ত করুক।

    टिप्पणी

    [নাম=অথবা "প্রসিদ্ধ"। সুভগে=প্রকাশযুক্ত হওয়ায় ভাগ্যশালী। বিচৃতৌ=বি + চৃৎ (হিংসা), চৃতী হিংসাগ্রন্থনয়োঃ, তুদাদিঃ)। "এই দুটি তারা হলো মূলনামক-নক্ষত্র" (সায়ণ)। বিচৃতৌ=বি+ চৃৎ; ক্বিপ+দ্বিবচন। দ্বিবচন হলো নক্ষত্র এবং তদধিষ্ঠান এর জন্য (সায়ণ) (অথর্ব০ ২।৮।১)। কিন্তু মন্ত্রানুসারে এই দুটি হলো তারা/নক্ষত্র, মূলনক্ষত্র বা তদধিষ্ঠান নয়। এই দুটি তারা বৃশ্চিক-রাশির লেজের শুঙ্গে রয়েছে। ক্ষেত্রিয়-রোগ সম্ভবতঃ শারীরিক; ক্ষেত্র হলো শরীর "ইদং শরীরং কৌন্তেয় ক্ষেত্রমিত্যভিধীয়তে" (গীতা ১৩।১)। যে কালে এই দুটি তারার উদয় হয়, সেই কালে ক্ষেত্রিয় রোগের চিকিৎসা করার বিধান হয়েছে। চিকিৎসার সম্পর্ক সময়ের সাথেও হয়। সময়ের বিবেচনা না করে চিকিৎসা করলে চিকিৎসা অধিক লাভকারী হয় না।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    मन्त्र विषय

    রোগনাশনায়োপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অমূ) সেই (যে) যে (সুভগে) পরম ঐশ্বর্যবান (বিচৃতৌ) [অন্ধকার থেকে] মুক্তকারী (নাম) প্রসিদ্ধ (তারকে) দুটি তারা [সূর্য ও চন্দ্র] (দিবি) আকাশে রয়েছে/বর্তমান, সেই দুটি (ক্ষেত্রিয়স্য) শরীর বা বংশের দোষ বা রোগের (অধমম্) নীচের এবং (উত্তমম্) উপরের (পাশম্) ফাঁদকে/বন্ধনকে (বি+মুঞ্চতাম্) মুক্ত করুক/করে দেবে ॥৪॥

    भावार्थ

    যেমন সূর্য ও চন্দ্র পরস্পর আকর্ষণ দ্বারা আলো, বৃষ্টি এবং পুষ্টি প্রভৃতি দ্বারা সংসারের উপকার করে, এইভাবে মনুষ্য সুমার্গে গমন করে সমস্ত বিঘ্ন অপসারণ করে সুস্থ এবং যশস্বী হোক ॥৪॥ এই মন্ত্র অ০ ২।৮।১। এ কিছুটা আলাদা ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top