अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 11/ मन्त्र 10
ऋषिः - भृग्वङ्गिराः
देवता - इन्द्रः, अनड्वान्
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - अनड्वान सूक्त
69
प॒द्भिः से॒दिम॑व॒क्राम॒न्निरां॒ जङ्घा॑भिरुत्खि॒दन्। श्रमे॑णान॒ड्वान्की॒लालं॑ की॒नाश॑श्चा॒भि ग॑छतः ॥
स्वर सहित पद पाठप॒त्ऽभि: । से॒दिम् । अ॒व॒ऽक्राम॑न् । इरा॑म् । जङ्घा॑भि: । उ॒त्ऽखि॒दन् । श्रमे॑ण । अ॒न॒ड्वान् । की॒लाल॑म् । की॒नाश॑: । च॒ । अ॒भि । ग॒च्छ॒त॒: ॥११.१०॥
स्वर रहित मन्त्र
पद्भिः सेदिमवक्रामन्निरां जङ्घाभिरुत्खिदन्। श्रमेणानड्वान्कीलालं कीनाशश्चाभि गछतः ॥
स्वर रहित पद पाठपत्ऽभि: । सेदिम् । अवऽक्रामन् । इराम् । जङ्घाभि: । उत्ऽखिदन् । श्रमेण । अनड्वान् । कीलालम् । कीनाश: । च । अभि । गच्छत: ॥११.१०॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मविद्या और पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थ
(कीनाशः) निन्दित कर्म का नाश करनेवाला (अनड्वान्) जीवन पहुँचानेवाला परमेश्वर, (श्रमेण) परिश्रम से (अभिगच्छतः) चलते फिरते पुरुष के (सेदिम्) विषाद को (पद्भिः) अपनी स्थितियों से (अवक्रामन्) दबाता हुआ, (च) और (जङ्घाभिः) अपनी अत्यन्त व्याप्तियों से [उसके] (कीलालम्) बन्ध के निवारण, अर्थात् (इराम्) अन्न को (उत्खिदन्) उत्पन्न करता हुआ [वर्तमान है] ॥१०॥
भावार्थ
उद्योगी पुरुष सब स्थानों में परमेश्वररचित पदार्थों से अन्नादि प्राप्त करके आनन्द भोगते हैं ॥१०॥
टिप्पणी
१०−(पद्भिः) पद स्थैर्ये गतौ च-क्विप्। स्वस्थितिभिः (सेदिम्) किकिनावुत्सर्गश्छन्दसि सदादिभ्यो दर्शनात्। वा० पा० ३।२।१७१। इति षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−कि। अवसादनम्। दरिद्रताम् (अवक्रामन्) अवाङ्मुखीकुर्वन् (इराम्) ऋज्रेन्द्र०। उ० २।२८। इति इण् गतौ-रन्, गुणाभावः। अन्नम्-निघ० २।७। (जङ्घाभिः) अच् तस्य जङ्घ च। उ० ५।३१। इति जनी प्रादुर्भावे-अच्, जङ्घ इत्यादेशः. प्रादुर्भावैः। यद्वा। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। इति हन हिंसागत्योः-यङ्लुगन्तात्-ड प्रत्ययः। अतिवेग-गतिभिः। अत्यन्तव्याप्तिभिः (उत्खिदन्) खिद दैन्ये, परिघाते। उत्पूर्वात् खिद उत्पादने-शतृ। उत्पादयन् वर्तते (श्रमेण) श्रम तपसि, आयासे, खेदे च-घञ् आयासेन। प्रयत्नेन (अनड्वान्) म० १। जीवनप्रापकः (कीलालम्) कील बन्धे-घञ्+अल वारणपर्याप्तिभूषासु-अण्। बन्धनिवारणम्। अमृतम्। जीवनसाधनम् (कीनाशः) अ० ३।१७।५। कुत्सितं नाशयतीति। कोः कीति आदेशः। निन्दितकर्मनाशकः परमेश्वरः (अभि गच्छतः) अभितो गच्छतः पुरुषस्य ॥
विषय
अनड्वान् कीनाशः च
पदार्थ
१. एक किसान बैलों द्वारा हल चलाता हुआ भूमि जोतता है, उस समय (पद्धिः) = अपने चारों पाँवों से (सेदिम्) = अवसान-[विनाश]-कारी अलक्ष्मी को (अवक्रामन्) = पाँवों तले रौंदता हुआ (इराम्) = भूमि को (जङ्घाभि:) = जाँघों से कर्षण द्वारा (उत्खिदत्) = उद्भिन्न करता हुआ यह (अनान्) = बैल (कीनाश: च) = और किसान (श्रमेण) = श्रम के द्वारा (कीलालम्) = अन्न को (अभिगच्छतः) = प्रास होते हैं। प्रभु श्रम करने पर ही अन्न प्राप्त कराते हैं। जैसे बैल के द्वारा श्रम होने पर ही किसान अन्न पाता है, इसीप्रकार 'प्रभु बिना श्रम के हमें खिलाते रहेंगे' ऐसी बात नहीं है।
भावार्थ
श्रम करनेवाले के योगक्षेम को प्रभु अवश्य चलाते हैं।
भाषार्थ
(पद्भिः) पैरों द्वारा (सेदिम्) विनाश को (अवक्रामण) कुचला हुआ, और (इराम्) जल को (जङ्घाभिः) जंघाओं द्वारा (उत्खिदन्) ऊपर की ओर खदेड़ता हुआ, (अनड्वान्) प्राणवान् सूर्य, (कीनाशः च) और किसान [ये दोनों] (श्रमेण) श्रम द्वारा (कीलालम्) अन्न के (अभि) अभिमुख (गच्छतः) जाते हैं, अन्न प्राप्त करते हैं।
टिप्पणी
['पद्भिः' द्वारा ६ दिशाओं में सूर्य के पदों का वर्णन हुआ है और 'जङ्घाभिः' द्वारा गति और वेग सूचित किया गया है। यथा "जङ्घयोर्जवः" (अथर्व० १९।६०।२)। अतः 'जङ्घा' पद 'हन' धातु से व्युत्पन्न प्रतीत होता है, हन हिंसागत्योः (अदादिः)। 'जङ्घा' पद में गत्यर्थ सूचित हुआ है। पाद तो शरीर की स्थिति के साधन हैं "पादयोः प्रतिष्ठा" [स्थिति] (अथर्व० १९।६०।२)। सूर्य की रश्मियों के अग्र भागों को भी “पादाः" कहते हैं, यथा "बालस्यापि रवेः पादाः पतन्ति शिरसि भूभृताम्" (पञ्चतन्त्र१ १।३१८)। ये पादाग्र जब पृथिवी के जलप्रधान प्रदेशों पर पड़ते हैं, तव जल वाष्पीभूत होकर अंतरिक्ष की ओर उड़कर मेघ निर्माण करता है, और वर्षा द्वारा कृषि से अन्न पैदा होता है, और कृषक अर्थात् किसानों को अन्नलाभ होता है। कृषक खेत को तैयार कर, अन्न बोते हैं, अतः कृषकों और सूर्य के सहयोग से कीलाल पैदा होता है, "कीलालम् अन्ननाम” (निघं० २/७)। इरा=जल, यथा "इरावत्यः नदीनाम (निघं० १।१३)। मन्त्रपठित 'अनड्वान्' पद भी भिन्नार्थक है। अनत: प्राणनाम (अन प्राणने; श्वस प्राणने, अन च (अदादिः)। अन् + असुन्=अनस्, अनः। सूर्य प्राणवान् है, और प्राणप्रदाता है। अनड्वान्=अनस्+ मतुप्। मन्त्र-पठित 'श्रमेण' का अन्वय कीनाश के साथ है, किसान का परिश्रम अभिप्रेत है। [१. "शिशुपालवध" (९।३४) तथा 'रघुवंश' (१६।५३) में भी अभिप्राय पूर्ववत् है। (आप्टे)।]
विषय
जगदाधार परमेश्वर का वर्णन।
भावार्थ
वह प्रजापतिरूप अनड्वान्-परमात्मा भी एक चतुष्पाद् बैल के समान है। वह (पद्भिः) अपने चरणों से (सेदिं) क्षेत्र, भूमि को (अवक्रामत्) पार करता हुआ (श्रमेण) श्रम से (कीलालं) अन्न को (उत्खिदन्) उत्पन्न करता हुआ (अनड्वान्) विश्व-शकट का वाहक जगदाधार और (कीनाशः च) कीनाश = यह जीवात्मा, अपने कर्म फलों का काटने हारा, दोनों (अभि गच्छतः) एक दूसरे के पीछे २ चलते हैं।
टिप्पणी
‘सेदि’ यह लोक है। ‘इरा’ वह अमृतमय मोक्ष है। ‘कीलाल’ ब्रह्मानन्द रस है, ‘कीनाश’ जीव है।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृग्यंगिरा ऋषिः। अनड्वान् देवता। १, ४ जगत्यौ, २ भुरिग्, ७ व्यवसाना षट्पदानुष्टु व्गर्भोपरिष्टाज्जागता निचृच्छक्वरी, ८-१२ अनुष्टुभः। द्वादशर्चं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Universal Burden-Bearer
Meaning
Covering the field with feet and legs, over¬ coming exhaustion, producing food and delicious drink with sweat and hard work, the farmer and the burden bearer move on together. (So do the human being and the master burden bearer move together in the world of existence. The master burden bearer creates the world context, the field of work, while the human being, farmer, sows the seed of karma and reaps the harvest which is the fruit of his karma. One who knows this complete scenario of existence realises both this world and the ultimate all-comprehensive reality. And that knowledge and realisation is freedom.)
Translation
Subduing misery with his feet and breaking soil with his shins, the draft-ox, through his toil, supplies food to the approaching ploughman.
Translation
This sun which is the source of agricultural product, crossing, the ending point of the moving planets with its rays, producing the grain with its Productive power and producing the rainy water with its Operation, is extendent in the heaven.
Translation
The soul overcoming poverty through its forces of stability, attains to salvation and the joy of God through exertion and its vital forces. Both God and soul go together in that emancipated state.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१०−(पद्भिः) पद स्थैर्ये गतौ च-क्विप्। स्वस्थितिभिः (सेदिम्) किकिनावुत्सर्गश्छन्दसि सदादिभ्यो दर्शनात्। वा० पा० ३।२।१७१। इति षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−कि। अवसादनम्। दरिद्रताम् (अवक्रामन्) अवाङ्मुखीकुर्वन् (इराम्) ऋज्रेन्द्र०। उ० २।२८। इति इण् गतौ-रन्, गुणाभावः। अन्नम्-निघ० २।७। (जङ्घाभिः) अच् तस्य जङ्घ च। उ० ५।३१। इति जनी प्रादुर्भावे-अच्, जङ्घ इत्यादेशः. प्रादुर्भावैः। यद्वा। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। इति हन हिंसागत्योः-यङ्लुगन्तात्-ड प्रत्ययः। अतिवेग-गतिभिः। अत्यन्तव्याप्तिभिः (उत्खिदन्) खिद दैन्ये, परिघाते। उत्पूर्वात् खिद उत्पादने-शतृ। उत्पादयन् वर्तते (श्रमेण) श्रम तपसि, आयासे, खेदे च-घञ् आयासेन। प्रयत्नेन (अनड्वान्) म० १। जीवनप्रापकः (कीलालम्) कील बन्धे-घञ्+अल वारणपर्याप्तिभूषासु-अण्। बन्धनिवारणम्। अमृतम्। जीवनसाधनम् (कीनाशः) अ० ३।१७।५। कुत्सितं नाशयतीति। कोः कीति आदेशः। निन्दितकर्मनाशकः परमेश्वरः (अभि गच्छतः) अभितो गच्छतः पुरुषस्य ॥
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