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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 36 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 2
    ऋषिः - चातनः देवता - सत्यौजा अग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सत्यौजा अग्नि सूक्त
    61

    यो नो॑ दि॒प्सददि॑प्सतो॒ दिप्स॑तो॒ यश्च॒ दिप्स॑ति। वै॑श्वान॒रस्य॒ दंष्ट्र॑योर॒ग्नेरपि॑ दधामि॒ तम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । न॒: । दिप्सा॑त् । अदि॑प्सत: । दिप्स॑त: । य: । च॒ । दिप्स॑ति ।वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ । दंष्ट्र॑यो: । अ॒ग्ने । अपि॑ । द॒धा॒मि॒ । तम् ॥३६.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो नो दिप्सददिप्सतो दिप्सतो यश्च दिप्सति। वैश्वानरस्य दंष्ट्रयोरग्नेरपि दधामि तम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । न: । दिप्सात् । अदिप्सत: । दिप्सत: । य: । च । दिप्सति ।वैश्वानरस्य । दंष्ट्रयो: । अग्ने । अपि । दधामि । तम् ॥३६.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 36; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) जो पुरुष (अदिप्सतः) न सतानेवाले (नः) हमको (दिप्सत्) सताना चाहे, (च) और (यः) जो (दिप्सतः) सतानेवाले [हम] को (दिप्सति) सताना चाहता है, (तम्) उसको (वैश्वानरस्य) सब नरों के हितकारक (अग्नेः) ज्ञानीपुरुष के (दंष्ट्रयोः) दोनों डाढ़ों के बीच जैसे (अपि) अवश्य (दधामि) धरता हूँ ॥२॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य धर्मात्माओं को बिना कारण सतावे, और जो दुष्ट धर्मात्माओं को उनके दण्ड देने पर भी दुष्ट आचरण करे, उन शत्रुओं को राजा परमेश्वर के दिये सामर्थ्य से ऐसे कुचिल डाले जैसे डाढ़ों के बीच अन्न को ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(यः) शत्रुः (नः) अस्मान् (दिप्सत्) लेटि अडागमः। दम्भितुं हिंसितुमिच्छेत् (अदिप्सतः) दम्भितुं हिंसितुमनिच्छतः (दिप्सतः) हिंसितुमिच्छतः (यः च) (दिप्सति) दम्भितुमिच्छति। जिहिंसिषति (वैश्वानरस्य) सर्वनरहितस्य (दंष्ट्रयोः) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। इति दंश दशने-ष्ट्रन्, अजादित्वात्-टाप्। खादनसाधनयोर्दन्तविशेषयोर्मध्ये यथा (अग्नेः) ज्ञानिनः पुरुषस्य (अपि) अवधारणे (दधामि) धरामि (तम्) शत्रुम् ॥

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    विषय

    वैश्वानर अनि की दंष्ट्राओं में

    पदार्थ

    १. (यः) = जो (अदिप्सत:) = हिंसित करना न चाहते हुए (न:) = हमें (दिप्सात्) = हिंसित करने की इच्छा करे (च) = और (यः) = जो (दिप्सतः) = अपराध करने पर हिंसित करने की कामनावाले राजपुरुषों को (दिप्सति:) = हिंसित करना चाहता है, अर्थात् जो राजपुरुषों [Police] पर ही आक्रमण कर देता है, (तम्) = उसे (वैश्वानरस्य) = सारे मानवसमाज का हित करनेवाले (अग्नेः) = राष्ट्र के अग्रणी राजा के (दंष्ट्रयो:) = दाढों में (अपिदधामि) = धारण करते हैं-उसे राजा के सुपुर्द करते हैं। वह राजा की न्यायदंष्ट्राओं से ही दण्डित होगा। २. न्याय को अपने हाथ में न लेकर अपराधी को राजा के न्यायालय को ही सौंपते हैं।

    भावार्थ

    जो हिंसा न करनेवाले हमारी हिंसा करे अथवा जो न्याय को अपने हाथ में ले अथवा रक्षा-पुरुषों पर ही आक्रमण करे, उसे राजा के न्याय के जबड़ों में स्थापित करना ही उत्तम है।

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    भाषार्थ

    (यः) जो शत्रु, (अदिप्सतः नः) दम्भ न करना चाहते हुए या करते हुए हमारे साथ (दिप्सत्) दम्भ करना चाहे, (य: च) और जो (दिप्सतः) प्रतीकार में दम्भ करना चाहते हुए या करते हुए हमारे साथ (दिप्सति) फिर भी दम्भ करना चाहता है या करे, (तम्) उन दोनों को (वैश्वानरस्य) सब नर-नारियों का हित करनेवाले (अग्नेः) राष्ट्राग्रणी प्रधानमन्त्री की (दंष्ट्रयोः) दो दंष्ट्राओं में (अपि दधामि) मैं पिहित करता है, बन्द करता हूँ।

    टिप्पणी

    [दंष्ट्रायो= दो दंष्ट्राएं हैं, शस्त्र और अस्त्र। अपिधान= पिधान, बन्द करना।]

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    विषय

    न्याय-विधान और दुष्टों का दमन।

    भावार्थ

    (नः) हम में से (यः) जो (अदिप्सतः) दूसरे को न ठगने और न हिंसा करने हारे निरपराधी को (दिप्सति) ठगता और हानि पहुंचाता है और (यः च दिप्सतः) ठगने और मारने वाले को (दिप्सति) ठगता और मारता है (वैश्वानरस्य अग्नेः) सर्व प्रकाशक वैश्वानर = सर्व हितकारी पञ्च, न्यायाध्यक्ष के (दंष्ट्रयोः) दाढ़, दमनकारी हाथों में (तम्) उसको (दधामि) रक्खूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    चातन ऋषिः। सत्यौजा अग्निर्देवता। १-८ अनुष्टुभः, ९ भुरिक्। दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Power of Truth

    Meaning

    Whoever it is that wants to injure us who never wish to injure anyone, whoever it is that wants to injure him who tries to injure others, I subject to the jaws of Agni, all watching Ruler’s dispensation of justice.

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    Translation

    Him, who wants to harm us, while we do not intend to harm him, and him, who harms us while we want to harm him, I throw into the jaws of the adorable Lord, benefactor of all men,

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    Translation

    I lay between the jaws (the administration of justice) of all benevolent administrator of Justice the man among us who does harm to whosoever does not trouble anyone and harms him who injure others.

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    Translation

    Him who, unharmed, would injure us, and him who, harmed, would do us harm, I lay between the doubled fangs of the king, the well-wisher of all.

    Footnote

    Harmed: Punished by noble persons for misdeeds. The king should so crush the evil minded persons with his jaws of justice, as we chew food with our jaws.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(यः) शत्रुः (नः) अस्मान् (दिप्सत्) लेटि अडागमः। दम्भितुं हिंसितुमिच्छेत् (अदिप्सतः) दम्भितुं हिंसितुमनिच्छतः (दिप्सतः) हिंसितुमिच्छतः (यः च) (दिप्सति) दम्भितुमिच्छति। जिहिंसिषति (वैश्वानरस्य) सर्वनरहितस्य (दंष्ट्रयोः) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। इति दंश दशने-ष्ट्रन्, अजादित्वात्-टाप्। खादनसाधनयोर्दन्तविशेषयोर्मध्ये यथा (अग्नेः) ज्ञानिनः पुरुषस्य (अपि) अवधारणे (दधामि) धरामि (तम्) शत्रुम् ॥

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