अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 36/ मन्त्र 10
ऋषिः - चातनः
देवता - सत्यौजा अग्निः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सत्यौजा अग्नि सूक्त
70
अ॒भि तं निरृ॑तिर्धत्ता॒मश्व॑मिवाश्वाभि॒धान्या॑। म॒ल्वो यो मह्यं॒ क्रुध्य॑ति॒ स उ॒ पाशा॒न्न मु॑च्यते ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒भि । तम् । नि:ऽऋ॑ति: । ध॒त्ता॒म् । अश्व॑म्ऽइव । अ॒श्व॒ऽअ॒भि॒धान्या॑ । म॒ल्व: । य: । मह्य॑म् । क्रुध्य॑ति । स: । ऊं॒ इति॑ । पाशा॑त् । न । मु॒च्य॒ते॒ ॥३६.१०॥
स्वर रहित मन्त्र
अभि तं निरृतिर्धत्तामश्वमिवाश्वाभिधान्या। मल्वो यो मह्यं क्रुध्यति स उ पाशान्न मुच्यते ॥
स्वर रहित पद पाठअभि । तम् । नि:ऽऋति: । धत्ताम् । अश्वम्ऽइव । अश्वऽअभिधान्या । मल्व: । य: । मह्यम् । क्रुध्यति । स: । ऊं इति । पाशात् । न । मुच्यते ॥३६.१०॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(तम्) उस को (निर्ऋतिः) अलक्ष्मी (अभि धत्ताम्) बांध लेवे (अश्वम् इव) जैसे घोड़े को (अश्वाभिधान्या) घोड़ा बाँधने की रसरी से। (यः मल्वः) जो मलिन पुरुष (मह्यम्) मुझ पर (क्रुध्यति) क्रोध करता है, (सः) वह (पाशात्) फाँसी से (उ न) कभी नहीं (मुच्यते) छुटता है ॥१०॥
भावार्थ
राजा कुकर्मी दुष्टों को यथावत् दण्ड देकर सत्पुरुषों की रक्षा करे ॥१०॥
टिप्पणी
१०−(अभि धत्ताम्) बध्नातु (तम्) दुष्टम् (निर्ऋतिः) अ० ३।११।२। कृच्छ्रापत्तिः-निरु० २।७। अलक्ष्मीः (अश्वम् इव) यथा तुरङ्गम् (अश्वाभिधान्या) अश्वमभिदधाति बध्नात्यनया सा अश्वाभिधानी। करणे-ल्युट् टित्त्वाद् ङीप्। अश्वबन्धनरज्ज्वा (मल्वः) कॄगॄशॄदॄभ्यो वः। उ० १।१५५। इति मल धारणे-व। मलिनः। क्रूरः (यः) (मह्यम्) क्रुधद्रुहेर्ष्या०। पा० १।४।३७। इति चतुर्थी (क्रुध्यति) कुप्यति (सः) (उ) एव (पाशात्) बन्धनात् (न) (मुच्यते) वियुज्यते ॥
विषय
दुष्ट-बन्धन
पदार्थ
१. (तम्) = राष्ट्र के शत्रु उस पिशाच को (निति:) = दुर्गति (अभिधत्ताम्) = इसप्रकार बाँध ले अपने पाशों में जकड़ ले, (इव) = जैसेकि (अश्वाभिधान्या) = रज्जु से (अश्वम्) = घोड़े को बाँधते हैं। २. (यः) = जो (मल्व:) = मलिन-आचरण पुरुष अपने पाप को झूठ से छिपाने का प्रयत्न करता हुआ (मां कुध्यति) = मुझे क्रुद्ध करता है (सः) = वह (उ) = निश्चय से (पाशात् न मुच्यते) = दण्ड-पाश से मुक्त नहीं होता। मैं उसे अवश्य दण्डित करता है।
भावार्थ
कोई भी दुष्ट राजा के दण्डपाश से मुक्त न हो।
विशेष
आधिभौतिक उपद्रवों से शून्य इस राष्ट्र में स्थिरवृत्ति से कार्य करनेवाला 'वादरायणि' [वद स्थैर्य] अजशंगी आदि ओषधियों के प्रयोग से आध्यात्मिक कष्टों को भी दूर करने के लिए यत्नशील होता है।
भाषार्थ
(तम्) उसे (निर्ऋतिः) कृच्छ्रापत्ति (अभि धत्ताम्) निजपाशों द्वारा बाँध दे, (इव) जैसेकि (अश्वम्) अश्व को (अभिधान्या) रस्सी द्वारा बाँधा जाता है, (य:) जो (मल्व:) मलिक अर्थात् पापी (मह्यम् क्रुध्यति) मुझ सेनाध्यक्ष को क्रुद्ध करता है, (सः) वह (उ) निश्चय से (पाशात्) पाश से (न मुच्यते) नहीं मुक्त होता, रस्सियों से बाँध दिया जाता है।
टिप्पणी
[रस्सियाँ हैं हथकड़ियां।]
विषय
न्याय-विधान और दुष्टों का दमन।
भावार्थ
(अश्वाभिधान्या) घोड़े को बांधने वाली रस्सी से जिस प्रकार (अश्वम् इव) अश्व को बांध लिया जाता है उसी प्रकार (निर्ऋतिः) पापों को रोक देने वाली दमनकारिणी शक्ति (तं) उस पापी पुरुष को (अभि धत्ताम्) सब ओर से जकड़ ले। और (यः) (मल्वः) मलिन हृदय, दुष्ट चित्त वाला [ मैलिग्नेंट या मैलीशस ] (मह्यं) मेरे विरुद्ध (क्रुध्यति) क्रोध प्रकट करता है (स उ) वह भी (पाशात्) पाश, दमन, कैद आदि कानूनी दण्ड से (न मुच्यते) छूटने नहीं पाता।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
चातन ऋषिः। सत्यौजा अग्निर्देवता। १-८ अनुष्टुभः, ९ भुरिक्। दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Power of Truth
Meaning
Like a rope arresting a horse, adversity would seize that malcontent, who smoulders in anger against me. He would never be free from that noose.
Translation
As a horse-halter holds a horse, so may the wretchedness (perdition, misery) bind him fast. Whoever a fool gets furious with me, he is never released from fetters (of wretchedness).
Translation
Let calamity seize upon the wicked man as with a rope people hold fast the horse. The malignant who bears maliciousness for me Jet not be rescued from the noose of justice.
Translation
Destruction seize upon the man, as with a cord they hold the horse, the fool who is enraged with me! He is not rescued from the noose of misfortune.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१०−(अभि धत्ताम्) बध्नातु (तम्) दुष्टम् (निर्ऋतिः) अ० ३।११।२। कृच्छ्रापत्तिः-निरु० २।७। अलक्ष्मीः (अश्वम् इव) यथा तुरङ्गम् (अश्वाभिधान्या) अश्वमभिदधाति बध्नात्यनया सा अश्वाभिधानी। करणे-ल्युट् टित्त्वाद् ङीप्। अश्वबन्धनरज्ज्वा (मल्वः) कॄगॄशॄदॄभ्यो वः। उ० १।१५५। इति मल धारणे-व। मलिनः। क्रूरः (यः) (मह्यम्) क्रुधद्रुहेर्ष्या०। पा० १।४।३७। इति चतुर्थी (क्रुध्यति) कुप्यति (सः) (उ) एव (पाशात्) बन्धनात् (न) (मुच्यते) वियुज्यते ॥
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