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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 1
    ऋषिः - बादरायणि देवता - अजशृङ्ग्योषधिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
    109

    त्वया॒ पूर्व॒मथ॑र्वाणो ज॒घ्नू रक्षां॑स्योषधे। त्वया॑ जघान क॒श्यप॒स्त्वया॒ कण्वो॑ अ॒गस्त्यः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वया॑ । पूर्व॑म् । अथ॑र्वाण: । ज॒घ्नु: । रक्षां॑सि । ओ॒ष॒धे॒ । त्वया॑ । ज॒घा॒न॒ । क॒श्यप॑: । त्वया॑ । कण्व॑: । अ॒गस्त्य॑: ॥३७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वया पूर्वमथर्वाणो जघ्नू रक्षांस्योषधे। त्वया जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    त्वया । पूर्वम् । अथर्वाण: । जघ्नु: । रक्षांसि । ओषधे । त्वया । जघान । कश्यप: । त्वया । कण्व: । अगस्त्य: ॥३७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 37; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (ओषधे) हे तापनाशक परमेश्वर ! (त्वया) तेरे सहारे से (पूर्वम्) पहिले (अथर्वाणः) निश्चल स्वभाववाले अथवा मङ्गल के लिये व्यापक महात्माओं ने (रक्षांसि) राक्षसों को (जघ्नुः) मारा था। (त्वया) तेरे साथ ही (कश्यपः) तत्त्वदर्शी पुरुष ने, और (त्वया) तेरे साथ ही (कण्वः) मेधावी, तथा (अगस्त्यः) कुटिलगति, पाप के फेंकने में समर्थ जीव ने (जघान) मारा था ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे पूर्वज ऐतिहासिक जितेन्द्रिय पुरुषों ने जगत् का उपकार किया है, वैसे ही सब मनुष्य ज्ञानपूर्वक दोषों का नाश करके परस्पर उपकार करें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(त्वया) (पूर्वम्) अग्रे (अथर्वाणः) अ० ४।१।७। निश्चलस्वभावाः। मङ्गलाय व्यापका महात्मानः (जघ्नुः) हतवन्तः (रक्षांसि) राक्षसान् (ओषधे) अ० १।२३।१। हे तापनाशक परमेश्वर (जघान) हतवान् (कश्यपः) अ० २।३३।७। पश्यकः, तत्त्वदर्शकः पुरुषः (कण्वः) अ० २।३२।३। मेधावी-निघ० ३।१५। (अगस्त्यः) अ० २।३२।३। अगस्य कुटिलगतेः पापस्य असने उत्पाटने समर्थः पुरुषः ॥

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    विषय

    अथवा, कश्यप, कण्व, अगस्त्य

    पदार्थ

    १. हे (ओषधे) = दोषों का दहन करनेवाली ओषधे! (त्वया) = तेरे द्वारा (पूर्वम्) = सबसे प्रथम (अथर्वाण:) = [न थ] स्थिरवृत्ति के लोग (रक्षांसि) = रोगकृमियों को (जघ्नु:) = नष्ट करते हैं। २. (त्वया) = तेरे द्वारा (कश्यपः) =  ज्ञानी पुरुष (जघान) = रोगकृमियों का नाश करता है और (अगस्त्यः) = पाप का संघात [विनाश] करनेवाला व्यक्ति तेरे द्वारा इन कृमियों को विनष्ट करता है।

    भावार्थ

    ओषधि द्वारा 'अथर्वा, कश्यप, कण्व व अगस्त्य' रोगकृमियों का विनाश करते हैं। ओषधि का प्रयोग इन लोगों द्वारा ही ठीक से होता है जो स्थिरवृत्ति के हैं, ज्ञानी है, कण कण करके शक्ति का सञ्चय करते हैं व पाप का विनाश करते हैं।

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    भाषार्थ

    (ओषधे) हे औषधि ! (पूर्वम्) पूर्वकाल से, अर्थात् अनादिकाल से (अथर्वाणः) अथर्ववेट के विज्ञों ने (त्वया) तुझ द्वारा (रक्षांसि) राक्षसी रोग-कीटाणुओं [germs] का (जघ्नुः) हनन किया (त्वया) तुझ द्वारा (कश्यपः) रोगपरीक्षक ने (जघान) उनका हनन किया, (त्यया) तुझ द्वारा (कण्यः) कण समान क्षुद्र रोग-कीटाणुओं को जाननेवाले मेधावी ने, (अगस्त्य:) तथा प्रगति अर्थात् जड़ता को परास्त करनेवाले ने [उसका हनन किया।]

    टिप्पणी

    [कश्यपः= पश्यतीति, वर्णविपर्ययः (अथर्व० ४।२९।३)। कण्व: मेधाविनाम (निघं० ३।१५)। अगस्त्य:= रोग-कीटाणु के कारण शरीर में जड़ता; अ+ग+ अस् (क्षेपणम्)+ त्यप् (छान्दस)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destroying Insects, Germs and Bacteria

    Meaning

    O all-cleansing herb, by you the veteran scholars of Atharvani science of fire and soma destroy life threatening germs. By you the microbiologist, Kashyapa, destroys germs of disease. By you Kanva, the technologist, and Agastya, specialist of water pollution, destroys germs of disease.

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    Subject

    Aja Srngi

    Translation

    With you, O herb, the fire-producers (atharvans) have killed the germs in olden times. With you Kasyapa (physician) kills and with you Agastya (medical incharge) and Kanva (surgeon) kill (the germs).

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    Translation

    With this herb the physician of firm attitude uproots the causes of disease. With this Kashyapa, the physician of sharp penetration removes diseases and with this remove the diseases the physician of brilliant understanding and the physician of deep wisdom.

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    Translation

    O medicine, through thee, in Olden time, did the steady, wise, intellectual brilliant physicians destroy the disease-germs.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(त्वया) (पूर्वम्) अग्रे (अथर्वाणः) अ० ४।१।७। निश्चलस्वभावाः। मङ्गलाय व्यापका महात्मानः (जघ्नुः) हतवन्तः (रक्षांसि) राक्षसान् (ओषधे) अ० १।२३।१। हे तापनाशक परमेश्वर (जघान) हतवान् (कश्यपः) अ० २।३३।७। पश्यकः, तत्त्वदर्शकः पुरुषः (कण्वः) अ० २।३२।३। मेधावी-निघ० ३।१५। (अगस्त्यः) अ० २।३२।३। अगस्य कुटिलगतेः पापस्य असने उत्पाटने समर्थः पुरुषः ॥

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