अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 12
ऋषिः - बादरायणिः
देवता - अजशृङ्ग्योषधिः
छन्दः - निचृदनुष्टुप्
सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
64
जा॒या इद्वो॑ अप्स॒रसो॒ गन्ध॑र्वाः॒ पत॑यो यू॒यम्। अप॑ धावतामर्त्या॒ मर्त्या॒न्मा स॑चध्वम् ॥
स्वर सहित पद पाठजा॒या: । इत् । व॒: । अ॒प्स॒रस॑: । गन्ध॑र्वा: । पत॑य: । यू॒यम् ।अप॑ । धा॒व॒त॒ । अ॒म॒र्त्या॒: । मर्त्या॑न् । मा । स॒च॒ध्व॒म् ॥३७.१२॥
स्वर रहित मन्त्र
जाया इद्वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्। अप धावतामर्त्या मर्त्यान्मा सचध्वम् ॥
स्वर रहित पद पाठजाया: । इत् । व: । अप्सरस: । गन्धर्वा: । पतय: । यूयम् ।अप । धावत । अमर्त्या: । मर्त्यान् । मा । सचध्वम् ॥३७.१२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(गन्धर्वाः) हे वेदवाणी वा पृथिवी के धारण करनेवाले पुरुषो ! (अप्सरसः) आकाश आदि में व्यापक शक्तियाँ (वः) तुम्हारे लिये (इत्) ही (जायाः) सुख उत्पन्न करनेवाली हैं (यूयम्) तुम [उनके] (पतयः) रक्षक [बनो]। (अप) आनन्द से (धावत) धावो और (अमर्त्याः) हे अमर [नित्य उत्साही] पुरुषो ! (मर्त्यान्) मरते हुए [निरुत्साही] मनुष्यों के हित करनेवाले पुरुषों को (मा=मया) लक्ष्मी के साथ (सचध्वम्) सदा मिले ॥१२॥
भावार्थ
परमेश्वर की अनन्त अद्भुत शक्तियाँ संसार में उपस्थित हैं, उत्साही पुरुष उनसे उपकार लेकर सदा परस्पर उन्नति करें ॥१२॥
टिप्पणी
१२−(जायाः) जनेर्यक्। उ० ४।१११। इति जन जनने-यक्, टाप्। ये विभाषा। पा० ६।४।४३। इति आत्वम्। सुखस्य जनयित्र्यः (इत्) एव (वः) युष्मभ्यम् (अप्सरसः) म० २। आकाशादिषु सरणशीलाः शक्त्यः (गन्धर्वाः) म० २। हे विद्यायाः पृथिव्या वा धारकाः पुरुषाः (पतयः) रक्षकाः (यूयम्) (अप) आनन्देन। यथा-अपचितिः पूजा (धावत) शीघ्रं गच्छत (अमर्त्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति मृङ् प्राणत्यागे-यक्, तुक् च, निपातनात्साधुः। अमराः। नित्योत्साहिनः (मर्त्यान्) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। इति मृङ् प्राणत्यागे-तन्। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति मर्त-यत्। मर्तेभ्यो मनुष्येभ्यो हितान् पुरुषान् (मा) माङ् माने-क्विप्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्लुक्। मया लक्ष्म्या। इन्दिरा लोकमाता मा-इत्यमरः। १।२९। (सचध्वम्) समवेत ॥
विषय
गन्धर्व अप्सराः
पदार्थ
१. हे (गन्धर्वाः) = गायन-सा करनेवाले कृमियो! (अप्सरस:) = जलप्राय स्थानों में विचरनेवाली ये अप्सराएँ-कृमिविशेष (इत) = ही (वः जाया:) = तुम्हारी पत्नियाँ हैं, (यूयम्) = तुम इनके पतयः-पति हो। २.हे (अमा:) = जिनका मारना बड़ा कठिन है, ऐसे कृमियो! (अपधावत) = तुम यहाँ से दूर भाग जाओ, हम (मान्) = मनुष्यों को (मा) = मत (सचध्वम्) = प्रास होओ, हमपर तुम्हारा आक्रमण न हो।
भावार्थ
नर कृमि "गन्धर्व' हैं तो मादा 'अप्सरस्'। इनका मारना आसान नहीं। प्रभु के अनुग्रह से ये कृमि हमसे दूर रहें। हम स्वच्छता आदि की ऐसी व्यवस्था रक्खें कि इन कृमियों का यहाँ उद्भव ही न हो।
अगले सूक्त का ऋषि भी 'वादरायणि' ही है -
भाषार्थ
(गन्धर्वाः) हे गन्ध द्वारा हिंसनीय नर कीटाणुओं! (अप्सरसः) जलों में सरण करनेवाले मातृ-कीटाणु (वः) तुम्हारी (जायाः इत्) जाया ही हैं, पत्नियां ही है, (यूयम्) तुम (पतयः) उनके पति हो। (अमर्त्या) हे अमनुष्यों! (मर्त्यान्) मनुष्यों के साथ (मा सचध्वम्) तुम सम्बन्ध न करो, (आप धावत) उनसे अपगत होकर दौड़ जाओ, भाग जाओ।
टिप्पणी
[नर-रोग कीटाणुओं के प्रति उपचार-कुत्ता द्वारा कथन हुआ है, कविता में। नर रोग-कीटाणु है गन्धर्वाः, गन्ध द्वारा हिंसनीय। गंध+अर्व हिंसायाम् (भ्वादिः)। अमर्त्य हैं नर रोग-कीटाणु, ये अमनुष्य हैं, मनुष्य की आकृति के नहीं हैं। मर्त्य हैं मनुष्य जाति के। धावत=दौड़ जाओ, अन्यथा उपचार-कर्ता तुम्हारा विनाश कर देगा। नर-रोग कीटाणुओं के न रहने से, मादा रोग-कीटाणुओं में वीर्याधान के न होने से, रोग कीटाणु वंश स्वयं समाप्त हो जायेगा। सब वर्णन कविता में हुआ है।] [विशेष वक्तव्य-(१) मन्त्र ६ में सम्भवतः अजशृङ्गी, तीक्ष्णशृङ्गी और अराटकी ये तीन ओषधियाँ पृथक्-पृथक् हों। (२) मन्त्र ७ में अप्सरा के पति गन्धर्व का वर्णन हुआ है, और इसके दो मुष्कों और शेप के भेदन का कथन हुआ है। क्या यह गन्धर्व व्यभिचारी हैं, जिन्हें यह दण्ड दिया गया है? सायण आदि पौराणिक भाष्यकारों के अनुसार अप्सराएँ और गन्धर्व, देवजाति के चेतन और अमनुष्यरूप व्यक्तियाँ हैं। क्या देवजाति के गन्धर्व के इन तीन अङ्गों के भेदन के लिए देव जाति का ही कोई सर्जन है?]
विषय
हानिकारक रोग-जन्तुओं के नाश का उपदेश।
भावार्थ
हे (गन्धर्वाः) गन्धर्वो ! (यूयम्) तुम लोग (पतयः) पति हो और (अप्सरसः) अप्सराएं (वः) तुम्हारी (जाया इत्) स्त्रियां ही हैं अथवा—(पतयः यूयम् गन्धर्वाः) तुम पति लोग सब गन्धर्व अर्थात् तीव्र गन्ध से भागने वाले, वा गन्ध द्वारा पहचाने जाने वाले, वा गन्ध अर्थात् नाशक रूप में जाने गये हो और (वः जाया इत् अप्सरसः) तुम्हारी स्त्रियां सन्ततिजनक मादाएं ही अप्सरा रुधिर या जल आदि पदार्थों में प्रवेश करने वाली होती हैं। इसी प्रकार इन रोग-जन्तुओं में भी (यूयम्) तुम जो (पतयः) नर (गन्धर्वाः) गन्धर्व कहाते हो और (वः जायाः) तुम्हारी सन्ततियों के पैदा करने वाली मादाएं (इत्) ही (अप्सरसः) अप्सरस् कहाती हैं, परन्तु तुम (अमर्त्याः) मर्त्यो, प्राणिदेहों के साथ सम्बन्ध न किये हुए ही (अप धावत) इस शरीर से दूर भाग जाओ अर्थात् (मर्त्यान्) तुम्हारे कारण मृत्यु को प्राप्त होने वाले इन मनुष्यों को (मा सचध्वम्) मत पकड़ो।
टिप्पणी
इस सूक्त का वैद्यक विषयक अर्थ कह दिया अब अध्यात्म-परक अर्थ की दिशा दर्शाते हैं। १—कश्यप, कण्व और अगस्त्य अर्थात् आंख, कान, नाक आदि प्राणाङ्गो ने ओर अथर्वा अर्थात् इन्द्रियों ने, अजशृङ्गी= आत्मशक्ति नामक ओषधि से जीवन के विघ्नों को नाश किया। २—उसी आत्म शक्ति से कर्म में लगने वाली अप्सराओं अर्थात् कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रिय रूपी गन्धर्वों या इन्द्रियों और प्राणादि रूप गन्धवों को वश किया। ३—ये अप्सराएं अवश्वस= प्राण लेने वाले (अपां तारं) कर्मों के कर्त्ता, शरीर रूप नदी में बहती हैं इन के नाम हैं गुलगुलू = रसना, पीला = चक्षु, नलदी = कान, ओक्षगन्धि = नासिका, प्रमन्दिनी=त्वचा ये प्रतिबुद्ध होकर (परेत) दूर तक जायं। ४, ५—और नाना विषयों का आलोचन करें। ६—इन सब में अजशृङ्गी = चेतना प्रबल है। ७—नाचते हुए बड़े गन्धर्व मन को वश करो, उसके दोनों अण्डकोश अर्थात् राजस और तामस भावों को नष्ट करके उसे शेप = ज्ञानमय, सात्विक भावों को प्राप्त कराओ। ८, ९—हविरद = विषयोपसेवी और अवकाद = रस लोलुप गन्धर्वों को इन्द्र आत्मा परमात्मा की अयस्मयी = प्राणमय हिरण्ययी-ज्ञानमय शक्ति साधनाओं से वश करो। १०—इन इन्द्रियों को और भी ज्योति युक्त बनाओ और इनमें पिशाच = विषय-लोलुपों को उस आत्मा की शक्ति से दबाओ। ११—वह मन कुत्ते के समान कामी और बन्दर की तरह से चन्चल है। वह कुमार = काबू न आने वाला अदम्य, सर्वगामी होकर इन्द्रियों में विचरता है उसको प्रबल ब्रह्मज्ञान से हम दबावें। १२—ये आत्मा, गन्धर्व और अप्सरस अर्थात् प्राणवृत्तियां और इन्द्रियवृत्तियां अमर्त्य = अविनाशी हैं। ये मर्त्य = शरीर में लिप्त न रहें प्रत्युत अन्तर्लीन होकर आत्मा को सबल करें।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
बादरायणिर्ऋषिः। अजशृङ्गी अप्सरो देवता। १, २, ४, ६, ८-१० अनुष्टुभौ। त्र्यवसाना षट्पदी त्रिष्टुप्। ५ प्रस्तारपंक्तिः। ७ परोष्णिक्। ११ षट्पदा जगती। १२ निचत्। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Destroying Insects, Germs and Bacteria
Meaning
O Gandharvas, psychic disorders, you are the masters. Diseases of the blood and body are your secondary and subordinate forms. Get away, you are not for humans. Do not afflict the humans, keep away.
Translation
O soil-germs, the water-germs are your wives and you are the husbands. Run away O non-mortals; do not cling to mortals.
Translation
These apsarasa (electricities) are the wives of the Gandharvas (the clouds) and Gandharyas their husbands. Let immortal ones run away and let them not interfere with mortal objects.
Translation
Ye, male germs, shun strong smell, your wives penetrate blood and water. Without coming in contact with mortals, run ye away: forbear to interfere with men.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१२−(जायाः) जनेर्यक्। उ० ४।१११। इति जन जनने-यक्, टाप्। ये विभाषा। पा० ६।४।४३। इति आत्वम्। सुखस्य जनयित्र्यः (इत्) एव (वः) युष्मभ्यम् (अप्सरसः) म० २। आकाशादिषु सरणशीलाः शक्त्यः (गन्धर्वाः) म० २। हे विद्यायाः पृथिव्या वा धारकाः पुरुषाः (पतयः) रक्षकाः (यूयम्) (अप) आनन्देन। यथा-अपचितिः पूजा (धावत) शीघ्रं गच्छत (अमर्त्या) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति मृङ् प्राणत्यागे-यक्, तुक् च, निपातनात्साधुः। अमराः। नित्योत्साहिनः (मर्त्यान्) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। इति मृङ् प्राणत्यागे-तन्। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति मर्त-यत्। मर्तेभ्यो मनुष्येभ्यो हितान् पुरुषान् (मा) माङ् माने-क्विप्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्लुक्। मया लक्ष्म्या। इन्दिरा लोकमाता मा-इत्यमरः। १।२९। (सचध्वम्) समवेत ॥
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