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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 37 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 8
    ऋषिः - बादरायणिः देवता - अजशृङ्ग्योषधिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
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    भी॒मा इन्द्र॑स्य हे॒तयः॑ श॒तं ऋ॒ष्टीर॑य॒स्मयीः॑। ताभि॑र्हविर॒दान्ग॑न्ध॒र्वान॑वका॒दान्व्यृ॑षतु ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भी॒मा: । इन्द्र॑स्य । हे॒तय॑: । श॒तम् । ऋ॒ष्टी: । अ॒य॒स्मयी॑: । ताभि॑: । ह॒वि॒:ऽअ॒दान् । ग॒न्ध॒र्वान् । अ॒व॒का॒ऽअ॒दान् । वि । ऋ॒ष॒तु॒ ॥३७.८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतं ऋष्टीरयस्मयीः। ताभिर्हविरदान्गन्धर्वानवकादान्व्यृषतु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भीमा: । इन्द्रस्य । हेतय: । शतम् । ऋष्टी: । अयस्मयी: । ताभि: । हवि:ऽअदान् । गन्धर्वान् । अवकाऽअदान् । वि । ऋषतु ॥३७.८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 37; मन्त्र » 8
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्रस्य) परमेश्वर की (शतम्) सौ (हेतयः) हनन शक्तियाँ (अयस्मयीः) लोह की बनी हुई (ऋष्टीः) खड्गों के समान (भीमाः) भयानक हैं। (ताभिः) उनके साथ [दुष्ट दमन के लिये] (हविरदान्) ग्राह्य अन्न के भोजन करनेवाले (अवकादान्) हिंसाओं के नाश करनेवाले, (गन्धर्वान्) वेदवाणी और पृथिवी के धारण करनेवाले पुरुषों को [वह परमेश्वर] (वि ऋषतु) व्याप्त होवे ॥८॥

    भावार्थ

    परमेश्वर दुराचारियों को अनेक प्रकार से दण्ड देकर सत्पुरुषों की रक्षा करता है ॥८॥

    टिप्पणी

    ८−(भीमाः) अ० ३।२५।१। भयंकराः (इन्द्रस्य) परमेश्वरस्य (हेतयः) अ० १।१३।३। हननशक्त्यः (शतम्) बहु-निघ० ३।१। (ऋष्टीः) ऋषी गतौ-क्तिच् क्तिन् वा। ऋष्टयः। खड्गा यथा (अयस्मयीः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति इण् गतौ-असुन्। अयस्मय्यः लौहे निर्मिताः (ताभिः) (हविरदान्) हविः+अद भक्षणे पचाद्यच्। ग्राह्यान्नभोक्तॄन् (गन्धर्वान्) म० २। वेदवाक्यादिधारकान (अवकादान्) कृञादिभ्यः उ० ५।३५। इति अव रक्षणगतिहिंसादिषु−वुन्। टाप्+अद-अच्। हिंसानां भक्षकान् नाशकान् (वि ऋषतु) व्याप्नोतु ॥

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    विषय

    भीमा इन्द्रस्य हेतयः

    पदार्थ

    १. (इन्द्रस्य) = सूर्य की (हेतयः) = कृमियों का विनाश करनेवाली किरणें (भीमा:) = बड़ी भयंकर हैं। ये (शतम्) = सैकड़ों (ऋष्टी:) = दुधारी तलवारों के समान हैं। (अयस्मयी:) = ये तलवारें लोहे की बनी हुई हैं, बड़ी दृढ़ हैं। २. (ताभिः) = उन किरणरूप दुधारी तलवारों से यह सूर्य (हविरदान्) = अन्न को खा जानेवाले और (अवकादान्) = जल-उपरिस्थ शैवाल [काई] को भी खा जानेवाले (गन्धर्वान्) = गायक कृमियों को (व्यूषतु) = हिंसत कर दे।

    भावार्थ

    सूर्यकिरणें कृमियों को नष्ट करने के लिए दुधारी तलवारों के समान हैं।

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    भाषार्थ

    (इन्द्रस्य) इन्द्र के (हेतयः) अस्त्र-शस्त्र (भीमाः) भयानक हैं, (शतमृष्टी:) जोकि सौ धाराओंवाले हैं, और (अयस्मयीः) लौहनिर्मित हैं, (ताभिः) उन द्वारा (हविः अदान्) हवि के खानेवाले और (अवकादान्) अवका अर्थात् जलोपरिस्थित शैवाल के खानेवाले (गन्धर्वान्) गन्धर्वों को (व्यृषतु) इन्द्र हिंसित कर दे।

    टिप्पणी

    [इन्द्र है सम्राट् ("इन्द्रश्च सम्राट वरुणश्च राजा" (यजु:० ८।३७)। गन्धर्व हैं नर रोग-कीटाणु, जोकि गन्ध द्वारा हिंसित होते हैं। ये हवियों अर्थात् खाद्य और यज्ञिय पदार्थों को खाने के लिए उनपर आ बैठते हैं और उनमें निजविष का संचार कर देते हैं। इसी प्रकार अवकों को खाते हुए जल को विकृत कर देते हैं, और रोगों को फैलाते हैं। इनका विनाश सम्राट् के प्रबन्ध द्वारा किये जाने का निर्देश मन्त्र में हुआ है।]

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    विषय

    हानिकारक रोग-जन्तुओं के नाश का उपदेश।

    भावार्थ

    रोगजनक कीट किस प्रकार जलों में फैलने वाले रोगांशों को उत्पन्न करते हैं और उनका विनाश कैसे करें सों लिखते हैं। (इन्द्रस्य) सूर्य की (शतम्) सैकड़ों (ऋष्टीः) किरणें (भीमाः) उग्र होकर (अयस्मयीः) लोहे की बनी (ऋष्टीः) तेज़ धार वाली किर्चों के समान तीक्ष्ण (हेतयः) नाशकारी हैं। (ताभिः) उनसे (हविरदान्) अन्नों को खा लेने वाले और (अवकादान्) अवका = जल पर उतराने वाली काई को खाने वाले [Fungea] कीटों को सूर्य (व्यृषतु) नष्ट करे। इसी प्रकार

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    बादरायणिर्ऋषिः। अजशृङ्गी अप्सरो देवता। १, २, ४, ६, ८-१० अनुष्टुभौ। त्र्यवसाना षट्पदी त्रिष्टुप्। ५ प्रस्तारपंक्तिः। ७ परोष्णिक्। ११ षट्पदा जगती। १२ निचत्। द्वादशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destroying Insects, Germs and Bacteria

    Meaning

    Deadly are the strikes of the rays of the sun, hundred-fold for the destruction of pollution and contamination, shattering like thunder. With these let the physician and health powers destroy the air borne, water borne and food contaminating germs.

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    Translation

    Terrible are the weapons of the resplendent king, made of iron and striking at a hundred points. May he, with those (weapons), destroy the soil-germs that eat in the oblations and feed on ávaka (Blyxa Octandra; a weed growing on water surface).

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    Translation

    The weapons of electricity which are many in number, are dreadful like the spears made of iron. Let it pierce with them the cloud which consume the essence of oblation and which give rise to germs eating water plant called-Shaival.

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    Translation

    The Sun's rays are dreadful like hundreds of iron weapons. With those let it destroy the germs that feed on oblations and Blyxa Octandra.

    Footnote

    Those: Rays, It refers to the Sun. Avaka: Blyxa-octandra, a water-plant, the reed (fungus) that covers water, called saivala. It is named as sivara, kahi, Bur(वूर).

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ८−(भीमाः) अ० ३।२५।१। भयंकराः (इन्द्रस्य) परमेश्वरस्य (हेतयः) अ० १।१३।३। हननशक्त्यः (शतम्) बहु-निघ० ३।१। (ऋष्टीः) ऋषी गतौ-क्तिच् क्तिन् वा। ऋष्टयः। खड्गा यथा (अयस्मयीः) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति इण् गतौ-असुन्। अयस्मय्यः लौहे निर्मिताः (ताभिः) (हविरदान्) हविः+अद भक्षणे पचाद्यच्। ग्राह्यान्नभोक्तॄन् (गन्धर्वान्) म० २। वेदवाक्यादिधारकान (अवकादान्) कृञादिभ्यः उ० ५।३५। इति अव रक्षणगतिहिंसादिषु−वुन्। टाप्+अद-अच्। हिंसानां भक्षकान् नाशकान् (वि ऋषतु) व्याप्नोतु ॥

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