अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 37/ मन्त्र 9
ऋषिः - बादरायणिः
देवता - अजशृङ्ग्योषधिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - कृमिनाशक सूक्त
71
भी॒मा इन्द्र॑स्य हे॒तयः॑ श॒तं ऋ॒ष्टीर्हि॑र॒ण्ययीः॑। ताभि॑र्हविर॒दान्ग॑न्ध॒र्वान॑वका॒दान्व्यृ॑षतु ॥
स्वर सहित पद पाठभी॒मा: । इन्द्र॑स्य । हे॒तय॑: । श॒तम् । ऋ॒ष्टी: । हि॒र॒ण्ययी॑: ।ताभि॑: । ह॒वि॒:ऽअ॒दान् । ग॒न्ध॒र्वान् । अ॒व॒का॒ऽअ॒दान् । वि । ऋ॒ष॒तु॒ ॥३७.९॥
स्वर रहित मन्त्र
भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतं ऋष्टीर्हिरण्ययीः। ताभिर्हविरदान्गन्धर्वानवकादान्व्यृषतु ॥
स्वर रहित पद पाठभीमा: । इन्द्रस्य । हेतय: । शतम् । ऋष्टी: । हिरण्ययी: ।ताभि: । हवि:ऽअदान् । गन्धर्वान् । अवकाऽअदान् । वि । ऋषतु ॥३७.९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(इन्द्रस्य) परमेश्वर की (शतम्) सौ (हेतयः) हनन शक्तियाँ (हिरण्ययीः) तेजोमयी (ऋष्टीः) तरवारों के समान (भीमाः) भयानक हैं। (ताभिः) उनके साथ [दुष्ट दमन के लिये] (हविरदान्) ग्राह्य अन्न के भोजन करनेवाले (अवकादान्) हिंसाओं के नाश करनेवाले (गन्धर्वान्) वेदवाणी और पृथिवी के धारण करनेवाले पुरुषों को [वह परमेश्वर] (वि ऋषतु) व्याप्त होवे ॥९॥
भावार्थ
म० ८ के समान ॥९॥
टिप्पणी
९−(हिरण्ययीः) हिरण्यः=हिरण्यमयः=निरु० १०।२३। हिरण्यमय्यः। तेजोमय्यः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ८ ॥
विषय
चमकती हुई किरणरूप तलवारें
पदार्थ
१. कृमियों का नाश करनेवाली (इन्द्रस्य) = सूर्य की किरणें (हेतयः) = अस्त्रों के समान हैं। ये (शतम् ऋष्टी:) = सैकड़ों दुधारी तलवारों के समान हैं जोकि (हिरण्ययी:) = स्वर्ण के समान चमक रही है। २. (ताभि:) = उन चमकती हुई किरणरूप तलवारों से (हविरदान्) = अन्न को खा-जानेवाले अबकादान-जलोपरिस्थ शैवाल को भी खा जानेवाले (गन्धर्वान) = इन गायक कृमियों को (व्यूषतु) = यह सूर्य हिंसित करनेवाला हो।
भावार्थ
चमकती हुई सूर्यकिरणें वे तलवारें हैं जो अन्न तथा शैवाल को खा जानेवाले इन कृमियों को नष्ट कर देती हैं।
भाषार्थ
(इन्द्रस्य) इन्द्र के (हेतयः) अस्त्र-शस्त्र (भीमाः) भयानक हैं, (शतमृष्टी:) जोकि सौ धाराओंवाले हैं, और (अयस्मयीः) लौहनिर्मित हैं, (ताभिः) उन द्वारा (हविः अदान्) हवि के खानेवाले और (अवकादान्) अवका अर्थात् जलोपरिस्थित शैवाल के खानेवाले (गन्धर्वान्) गन्धर्वों को (व्यृषतु) इन्द्र हिंसित कर दे।
टिप्पणी
[इस मन्त्र में 'हेतय:' को सुवर्ण निर्मित कहा है। लोहनिर्मित अस्त्र-शस्त्रों में जंग लग जाता है, सुवर्णनिर्मितों को जंग नहीं लगता, अत: सूक्ष्मछेदन अर्थात् शस्त्रक्रिया के लिए ये उपकारी हैं। हेति का अर्थ होता है-अस्त्र, हेति पद शस्त्रों का भी उपलक्षक है।]
विषय
हानिकारक रोग-जन्तुओं के नाश का उपदेश।
भावार्थ
(इन्द्रस्य हिरण्ययीः ऋष्टीः) सूर्य की स्वर्ण के समान चमकने वाली तीक्ष्ण किरणें भी (शतम्) सैकड़ों (भीमाः हेतयः) भयानक रूप से रोग नाश करने वाली हैं। (ताभिः हविरदान् अव-कादान्) उनकी सहायता से अन्न खा जाने वाले और जल पर उतराने वाली काई पर आहार करने वाले (गन्धर्वान्) कीड़ों को सूर्य (व्यृषतु) विनाश करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
बादरायणिर्ऋषिः। अजशृङ्गी अप्सरो देवता। १, २, ४, ६, ८-१० अनुष्टुभौ। त्र्यवसाना षट्पदी त्रिष्टुप्। ५ प्रस्तारपंक्तिः। ७ परोष्णिक्। ११ षट्पदा जगती। १२ निचत्। द्वादशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Destroying Insects, Germs and Bacteria
Meaning
Golden energisers are rays of the sun, deadly destroyers, of hundredfold power, terrible killers of disease germs. With these, let the physician eliminate food and water plant contaminators, air borne viruses and water borne bacteria.
Translation
Terrible are the resplendent king’ s weapons, made of gold and striking at a hundred points. May he, with those (weapons), destroy the soil-germs, that eat into oblations and feed on avaká (Blyxa Octandra).
Translation
The manifold weapon of sun is dreadful like the spears of gold or the spears possessed of splendour. Let it pierce with them, the clouds which do not release water and which create germs and worms.
Translation
The golden-hued rays of the Sun, are dreadful like hundreds of weapons. With those let it destroy the germs that feed on oblations and Blyxa-octandra.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
९−(हिरण्ययीः) हिरण्यः=हिरण्यमयः=निरु० १०।२३। हिरण्यमय्यः। तेजोमय्यः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ८ ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal