अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 40 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 4/ सूक्त 40/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शुक्रः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (जातवेदः) हे ज्ञानवान् परमेश्वर ! (ये) जो लोग (पुरस्तात्) सन्मुख होकर (प्राच्याः) पूर्व वा सन्मुख (दिशः) दिशा से (अस्मान्) हमको (जुह्वति) खाते और (अभिदासन्ति) चढ़ाई करते हैं। (ते) वे (अग्निम्) [तुझ] सर्वव्यापक को (ऋत्वा) पाकर (पराञ्चः) पीठ देते हुए (व्यथन्ताम्) व्यथा में पड़ें। (एनान्) इनको (प्रतिसरेण) [तुझ] अग्रगामी के साथ (प्रत्यक्) उलटा (हन्मि) मैं मारता हूँ ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य परमेश्वर में भक्ति करके पुरुषार्थपूर्वक अपने आत्मिक और शारीरिक शत्रुओं का नाश करें। ऐसा ही भाव अन्य मन्त्रों का समझो ॥१॥ इस सूक्त का मिलान अथर्व० ३।२६ तथा २७ से करो ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top