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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 40 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 40/ मन्त्र 1
    ऋषिः - शुक्रः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    133

    ये पु॒रस्ता॒ज्जुह्व॑ति जातवेदः॒ प्राच्या॑ दि॒शोऽभि॒दास॑न्त्य॒स्मान्। अ॒ग्निमृ॒त्वा ते परा॑ञ्चो व्यथन्तां प्र॒त्यगे॑नान्प्रतिस॒रेण॑ हन्मि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । पु॒रस्ता॑त् । जुह्व॑ति । जात॒ऽवे॒द॒: । प्राच्या॑: । दि॒श: । अ॒भि॒ऽदास॑न्ति । अ॒स्मान् । अ॒ग्निम् । ऋ॒त्वा । ते । परा॑ञ्च: । व्य॒थ॒न्ता॒म् । प्र॒त्यक् । ए॒ना॒न् । प्र॒ति॒ऽस॒रेण॑ । ह॒न्मि॒ ॥४०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ये पुरस्ताज्जुह्वति जातवेदः प्राच्या दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्। अग्निमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान्प्रतिसरेण हन्मि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये । पुरस्तात् । जुह्वति । जातऽवेद: । प्राच्या: । दिश: । अभिऽदासन्ति । अस्मान् । अग्निम् । ऋत्वा । ते । पराञ्च: । व्यथन्ताम् । प्रत्यक् । एनान् । प्रतिऽसरेण । हन्मि ॥४०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 40; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रु के नाश करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (जातवेदः) हे ज्ञानवान् परमेश्वर ! (ये) जो लोग (पुरस्तात्) सन्मुख होकर (प्राच्याः) पूर्व वा सन्मुख (दिशः) दिशा से (अस्मान्) हमको (जुह्वति) खाते और (अभिदासन्ति) चढ़ाई करते हैं। (ते) वे (अग्निम्) [तुझ] सर्वव्यापक को (ऋत्वा) पाकर (पराञ्चः) पीठ देते हुए (व्यथन्ताम्) व्यथा में पड़ें। (एनान्) इनको (प्रतिसरेण) [तुझ] अग्रगामी के साथ (प्रत्यक्) उलटा (हन्मि) मैं मारता हूँ ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर में भक्ति करके पुरुषार्थपूर्वक अपने आत्मिक और शारीरिक शत्रुओं का नाश करें। ऐसा ही भाव अन्य मन्त्रों का समझो ॥१॥ इस सूक्त का मिलान अथर्व० ३।२६ तथा २७ से करो ॥

    टिप्पणी

    १−(ये) शत्रवः (पुरस्तात्) अग्रतः (जुह्वति) हु दानादनयोः। अदन्ति। नाशयन्ति (जातवेदः) आ० १।७।२। हे जातप्रज्ञान परमेश्वर (प्राच्याः) अ० ३।२६।१। स्वास्थानात् पूर्वायाः स्वाभिमुखीभूतायाः (दिशः) दिशायाः सकाशात् (अभिदासन्ति) अभितो घ्नन्ति (अस्मान्) (धार्मिकान्) (अग्निम्) सर्वव्यापिनं त्वां जातवेदसम् (ऋत्वा) गत्वा प्राप्य (ते) शत्रवः (पराञ्चः) पराङ्मुखाः कुण्ठितशक्तयः सन्तः (व्यथन्ताम्) व्यथ भयचलनयोः। व्यथिताः संतप्ता भवन्तु (प्रत्यक्) प्रतिमुखम् (एनान्) दुष्टान् शत्रून् (प्रतिसरेण) अ० २।११।२। अग्रगामिना त्वया सह (हन्मि) नाशयामि ॥

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    विषय

    प्राची दिक् से

    पदार्थ

    १. हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (ये) = जो (पुरस्तात्) = सामने से-पूर्व दिशा से (जुह्वति) = [हु अदने] हमें खाने के लिए आते हैं, (प्राच्या दिश:) = इस पूर्व दिशा से (अस्मान् अभिदासन्ति) = हमारा क्षय करना चाहते हैं (ते) =  वे सब (अग्निम् ऋत्वा) = हमारे अन्दर स्थित अग्नितत्त्व को प्राप्त करके (पराञ्च:) = पराङ्मुख हुए-हुए (व्यथन्ताम्) = पीड़ित हों। मेरे अन्दर स्थित अग्नितत्त्व इन्हें दूर भगानेवाला हो। २. मैं (एनान्) = इन सब शत्रुओं को (प्रतिसरेण) = प्रतिसर के द्वारा-शरीर में उत्पन्न वीर्यशक्ति को अङ्ग-प्रत्यङ्ग में गतिवाला करके (प्रत्यग हन्मि) = पराङ्मुख करके [प्रतीचीनम् निवर्त्य] नष्ट कर डालता हूँ।

    भावार्थ

    मेरे अन्दर का अग्नितत्त्व पूर्व से आक्रमण करनेवाले सब शत्रुओं को विनष्ट करनेवाला हो।

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    भाषार्थ

    (जातवेदः) प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान हे यज्ञिय अग्नि! (ये) जो [रोगकीटाणु, germs] (पुरस्तात्) पूर्व से (जुह्वति) हमें खाते हैं, (प्राच्या: दिश:) पूर्व की दिशा से (अस्मान्) हमें (अभि दासन्ति) साक्षात् उपक्षीण करते हैं, हमें शक्तिहीन करते हैं (ते) वे (अग्निम्) यज्ञियाग्नि को (ऋत्वा) प्राप्त होकर (पराञ्च:) पराङ्मुख हुए (व्यथन्ताम्) व्यथा को प्राप्त हों, (एनान्) इन रोग कीटाणुओं को (प्रत्यक्) प्रतिमुख अर्थात् प्रतीपमुख करके, (प्रतिसरेण) प्रतिसारक साधनों द्वारा (हन्मि) मैं मार देता हूँ।

    टिप्पणी

    [दासन्ति= दसु उपक्षये (दिवादिः)। जुह्वति= 'हु' दानादनयोः (जुहोत्यादिः), अदन अर्थात् खा जाना, मार देना। रोगकीटाणुओं के दो काम हैं, या तो रोगी को मार देना, या उसे शक्तिहीन अर्थात् निर्वल कर देना। प्रतिसर है निवारण करने का साधन, वह है यज्ञियाग्नि। यज्ञियाग्नि में रोगनिवारक ओषधियों का होम करके, तदुत्थ धूम द्वारा, रोगकीटाणुओं का हनन-अभिप्रेत है, और स्वास्थ्यवर्धक ओषधियों के होम द्वारा निर्बलता को दूर करने का भी कथन किया है। प्रतिसर= प्रतीपमुखं कृत्वा सार्यते अनेनेति।]

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    विषय

    आक्रमणकारी शत्रुओं के विनाश करने का उपदेश।

    भावार्थ

    हे (जातवेदः) सर्वज्ञ परमात्मन् ! (वे) जो (पुरस्तात्) पूर्व दिशा से (जुह्वति) अपने को आहुति करते हैं और (प्राच्याः दिशः) प्राची दिशा की ओर से (अस्मान् अभि दासन्ति) हमें नष्ट कर रहे हैं (ते) वे (अग्निम् ऋत्वा) अग्नि को प्राप्त होकर (पराञ्चः) पराङ्मुख, पराजित होकर (व्यथन्तां) कष्ट भोगें और (प्रत्यग्) इनके विपरीत (प्रतिसरेण) इनका पीछा करके मैं (एनान् हन्मि) इन का विनाश करूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुक्र ऋषिः। कृत्याप्रतिहरणाय बहवो देवताः। २ जगती। ८ पुरीतिशक्वरी पदयुक्ता जगती। १, ३-५ त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of Enemies

    Meaning

    O Jataveda, omniscient lord of light, discrimination and justice, there are those who first offer the tribute of homage upfront from the east and then from the same direction attack and try to enslave us. Later, when they face Agni, lord of light and discriminative vision, they come to nothing. I hit and destroy them straight with an equal and opposite weapon.

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    Subject

    Miscellaneous Divinities

    Translation

    O Jātavedas (knower of all), those who challenge us from the front and want to enslave us from the eastern region, may they turn back, go to the fire and suffer pain. I drive them back with my counter-attack.

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    Translation

    May they desire to devour us from eastward and assail us from eastern quarter, be turned backward, O Learned person, and be pained countering Agni, the fire. I drive them backward by chasing them.

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    Translation

    O Omniscient God, may those foes, who want to destroy and attack us from the opposite eastward direction, punished by Thee, turn their back and be put to pain. I drive them back with the help of Thee, the Leader!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(ये) शत्रवः (पुरस्तात्) अग्रतः (जुह्वति) हु दानादनयोः। अदन्ति। नाशयन्ति (जातवेदः) आ० १।७।२। हे जातप्रज्ञान परमेश्वर (प्राच्याः) अ० ३।२६।१। स्वास्थानात् पूर्वायाः स्वाभिमुखीभूतायाः (दिशः) दिशायाः सकाशात् (अभिदासन्ति) अभितो घ्नन्ति (अस्मान्) (धार्मिकान्) (अग्निम्) सर्वव्यापिनं त्वां जातवेदसम् (ऋत्वा) गत्वा प्राप्य (ते) शत्रवः (पराञ्चः) पराङ्मुखाः कुण्ठितशक्तयः सन्तः (व्यथन्ताम्) व्यथ भयचलनयोः। व्यथिताः संतप्ता भवन्तु (प्रत्यक्) प्रतिमुखम् (एनान्) दुष्टान् शत्रून् (प्रतिसरेण) अ० २।११।२। अग्रगामिना त्वया सह (हन्मि) नाशयामि ॥

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