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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 40 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 40/ मन्त्र 6
    ऋषिः - शुक्रः देवता - वायुः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    46

    ये॑ऽन्तरि॑क्षा॒ज्जुह्व॑ति जातवेदो व्य॒ध्वाया॑ दि॒शोऽभि॒दास॑न्त्य॒स्मान्। वा॒युमृ॒त्वा ते परा॑ञ्चो व्यथन्तां प्र॒त्यगे॑नान्प्रतिस॒रेण॑ हन्मि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ये । अ॒न्तरि॑क्षात् । जुह्व॑ति । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । वि॒ऽअ॒ध्वाया॑: । दि॒श: । अ॒भि॒ऽदास॑न्ति । अ॒स्मान् । वा॒युम् । ऋ॒त्वा । ते॒ । परा॑ञ्च: । व्य॒थ॒न्ता॒म् । प्र॒त्यक् । ए॒ना॒न् । प्र॒ति॒ऽस॒रेण॑ । ह॒न्मि॒ ॥४०.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    येऽन्तरिक्षाज्जुह्वति जातवेदो व्यध्वाया दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्। वायुमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान्प्रतिसरेण हन्मि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ये । अन्तरिक्षात् । जुह्वति । जातऽवेद: । विऽअध्वाया: । दिश: । अभिऽदासन्ति । अस्मान् । वायुम् । ऋत्वा । ते । पराञ्च: । व्यथन्ताम् । प्रत्यक् । एनान् । प्रतिऽसरेण । हन्मि ॥४०.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 40; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रु के नाश करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (जातवेदः) हे ज्ञानवान् परमेश्वर ! (ये) जो लोग (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष वा आकाश से (व्यध्वायाः) विविध मार्गवाली (दिशः) दिशा से (अस्मान्) हमको (जुह्वति) खाते और (अभिदासन्ति) चढ़ाई करते हैं। (ते) वे (वायुम्) [तुझ] बलवानों में महाबलवान् को (ऋत्वा) पाकर.... म० १ ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(अन्तरिक्षात्) अ–० १।३०।३१। आकाशात् (व्यध्यायाः) उपसर्गादध्वनः। पा० ५।४।८५। इति वि+अध्वन्-अच् समासान्तः। विविधमार्गायाः (वायुम्) अ० २।२०।१। बलिनां बलिष्ठं त्वामीश्वरम् ॥

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    विषय

    व्यध्वा दिक् से

    पदार्थ

    १. हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो! (ये) = जो शत्रु (अन्तरिक्षात् जुह्वति) = अन्तरिक्ष से-मध्यलोक से हमें खाने को दौड़ते हैं (व्यध्वायाः) = विविध मागौवाली [अध्वोंवाली] (दिश:) = दिशा से (अस्मान अभिदासन्ति) = हमारा उपक्षय करते हैं, (ते) = वे शत्रु (वायुम्) = गतिशीलता के भाव को-हृदयस्थ कर्मसंकल्प को ऋत्वा-प्राप्त करके (पराञ्चः) = पराङ्मुख होकर (व्यथन्ताम्) = पीड़ित हों। २. (एनान्) = इन शत्रुओं को (प्रतिसरेण) = शरीर में उत्पन्न सोम के अङ्ग-प्रत्यंग में सरण के द्वारा (प्रत्यग् हन्मि) = पराङ्मुख करके नष्ट करता हूँ।

    भावार्थ

    हृदयों में कर्मशीलता का संकल्प व्यध्वा दिक् से आक्रमण करनेवाले सब शत्रुओं का विनाश करे।

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    भाषार्थ

    हे प्रतिपदार्थ में विद्यमान तथा प्रज्ञावाले परमेश्वर! जो रोग कीटाणु हमें अन्तरिक्ष से खाते हैं, और मार्गहीन दिशा में हमें साक्षात उपक्षीण करते हैं, शक्तिहीन करते हैं, वे वायु को प्राप्त होकर, पराङ्मुख हुए व्यथा को प्राप्त हों। इन रोगकीटाणुओं को प्रतिमुख करके, प्रतीपमुख करके प्रतिसारक साधन द्वारा मैं मार देता हूं।

    टिप्पणी

    [अन्तरिक्षस्थ वायु की अस्वच्छता के होते वायुगत रोगकीटाणु हमें खाते हैं, और वायु से ही हमें शक्तिविहीन करते रहते हैं, परन्तु भूमि की शुद्धि तथा यज्ञियाग्नि से उत्थित रोगनाशक ओषधियों के धूम द्वारा जब रोगकीटाणु नष्ट हो जाते हैं तब ये वायु को प्राप्त हुए ही व्यथा को प्राप्त कर नष्ट हो जाते हैं, और वायु ही इनके प्रतिसारण अर्थात् निवारण का साधन बन जाती है। व्यध्वाया:= अन्तरिक्ष में मनुष्यकृत् अध्वा अर्थात् मार्ग नहीं, परमेश्वर कृत् मार्ग तो हैं, जिन मार्गों द्वारा पक्षी, चन्द्र, पृथिवी तथा अन्य ग्रह उपग्रह आदि विचर रहे हैं।१] [१. अन्तरिक्ष से ऊपर द्युलोक में तो परमेश्वरकृत असंख्य मार्ग हैं, जिनमें असंख्य तारे निज-निज मार्गों में विचर रहे हैं।]

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    विषय

    आक्रमणकारी शत्रुओं के विनाश करने का उपदेश।

    भावार्थ

    हे जातवेदः ! (ये अन्तरिक्षात् जुह्वति०) इस अन्तरिक्ष भाग से अपने नाशकारी पदार्थ हम पर फेंके और हमें (वि-ऊर्ध्वायाः दिशः०) बिना मार्ग की या नाना मार्ग की ऊपर की दिशा से विनाश करना चाहें (ते वायुम् ऋत्वा) वे वायुवत् बलवान् पुरुष को प्राप्त होकर ही पराजित हो और मैं उनका पीछा करके उनका विनाश करूं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुक्र ऋषिः। कृत्याप्रतिहरणाय बहवो देवताः। २ जगती। ८ पुरीतिशक्वरी पदयुक्ता जगती। १, ३-५ त्रिष्टुभः। अष्टर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Destruction of Enemies

    Meaning

    O Jataveda, those who first offer the tribute of homage from the sky and then from the same upper direction attack us and try to enslave us come to nothing, when later they face Vayu, mighty force of nature’s retribution. I hit them back and destroy them straight with an equal and opposite blow.

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    Translation

    O Jatavedas (knower of all), those who challenge us from the midspace and want to enslave us from the pathless region, may they tum back, go to the wind and suffer pain. I drive them back with my counter-attack.

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    Translation

    May they who desire to endeavor us from the air and assail us from the midway quarter, be turned backward. O learned Man! and be pained countering Vayu, the all-moving fire. Rest is like the previous one.

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    Translation

    O Omniscient God, may those foes, who want to destroy and attack us from different directions in the atmosphere, punished by Thee, the Mightiest of the mighty, turn their back and be put to pain, I smite them back with the help of Thee, the Leader!

    Footnote

    भूमिःGod, the support of all.भवन्तिभुतानियस्यांसाभूमिः. Satyarth Prakash and Chapter I, steadfast direction: Nadir.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(अन्तरिक्षात्) अ–० १।३०।३१। आकाशात् (व्यध्यायाः) उपसर्गादध्वनः। पा० ५।४।८५। इति वि+अध्वन्-अच् समासान्तः। विविधमार्गायाः (वायुम्) अ० २।२०।१। बलिनां बलिष्ठं त्वामीश्वरम् ॥

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