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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 21 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 5/ सूक्त 21/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - वानस्पत्यो दुन्दुभिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुसेनात्रासन सूक्त
    10

    विहृ॑दयं वैमन॒स्यं वदा॒मित्रे॑षु दुन्दुभे। वि॑द्वे॒षं कश्म॑शं भ॒यम॒मित्रे॑षु॒ नि द॑ध्म॒स्यव॑ एनान्दुन्दुभे जहि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    विऽहृ॑दयम् । वै॒म॒न॒स्य । वद॑ । अ॒मित्रे॑षु । दु॒न्दु॒भे॒ । वि॒ऽद्वे॒षम् । कश्म॑शम् । भ॒यम् । अ॒मित्रे॑षु । नि । द॒ध्म॒सि॒। अव॑ । ए॒ना॒न् । दु॒न्दु॒भे॒ । ज॒हि॒ ॥२१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    विहृदयं वैमनस्यं वदामित्रेषु दुन्दुभे। विद्वेषं कश्मशं भयममित्रेषु नि दध्मस्यव एनान्दुन्दुभे जहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    विऽहृदयम् । वैमनस्य । वद । अमित्रेषु । दुन्दुभे । विऽद्वेषम् । कश्मशम् । भयम् । अमित्रेषु । नि । दध्मसि। अव । एनान् । दुन्दुभे । जहि ॥२१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 21; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (दुन्दुभे) हे दुन्दुभि वा ढोल ! (अमित्रेषु) वैरियों में (विहृदयम्) हृदय व्याकुल करने हारी (वैमनस्यम्) मन की ग्लानि (वद) कह दे। (विद्वेषम्) फूट, (कश्मशम्) गति की रोक और (भयम्) भय (अमित्रेषु) वैरियों के बीच (निदध्मसि) हम डाले देते हैं। (दुन्दुभे) हे दुन्दुभि ! (एनान्) इन [शत्रुओं] को (अव जहि) निकाल दे ॥१॥

    भावार्थ - जैसे पराक्रमी शूर के दुन्दुभि आदि बजने पर शत्रु लोग डावाँडोल होकर भाग जाते हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष के विज्ञान द्वारा काम क्रोध आदि नष्ट हो जाते हैं ॥१॥


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    Meaning -
    Clarion call of the united people for progressive action, strike confusion of heart and mind among unfriendly forces. Let us create dissension, confusion and fear among the adversaries. O united voice of the people, strike down all such conflicts and divisions. (This sukta may better be read with the last hymn of Rgveda (10, 191) on the unity of humanity living together in harmony with united thought and action as one family of one universal God of love and compassion for all.)


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