अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 11
ऋषिः - अथर्वा
देवता - अग्न्यादयः
छन्दः - पञ्चपदातिशक्वरी
सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
43
पुरं॑ दे॒वाना॑म॒मृतं॒ हिर॑ण्यं॒ य आ॑बे॒धे प्र॑थ॒मो दे॒वो अग्रे॑। तस्मै॒ नमो॒ दश॒ प्राचीः॑ कृणो॒म्यनु॑ मन्यतां त्रि॒वृदा॒बधे॑ मे ॥
स्वर सहित पद पाठपुर॑म् । दे॒वाना॑म् । अ॒मृतम् । हिर॑ण्यम् । य: । आ॒ऽवे॒धे । प्र॒थ॒म: । दे॒व: । अग्रे॑ । तस्मै॑ । नम॑: । दश॑ । प्राची॑: । कृ॒णो॒मि॒ । अनु॑ । म॒न्य॒ता॒म् । त्रि॒ऽवृत् । आ॒ऽवधे॑ । मे॒ ॥२८.११॥
स्वर रहित मन्त्र
पुरं देवानाममृतं हिरण्यं य आबेधे प्रथमो देवो अग्रे। तस्मै नमो दश प्राचीः कृणोम्यनु मन्यतां त्रिवृदाबधे मे ॥
स्वर रहित पद पाठपुरम् । देवानाम् । अमृतम् । हिरण्यम् । य: । आऽवेधे । प्रथम: । देव: । अग्रे । तस्मै । नम: । दश । प्राची: । कृणोमि । अनु । मन्यताम् । त्रिऽवृत् । आऽवधे । मे ॥२८.११॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रक्षा और ऐश्वर्य का उपदेश।
पदार्थ
(यः) जिस (प्रथमः) प्रख्यात (देवः) प्रकाशमय परमेश्वर ने (अग्रे) पहिले काल में (देवानाम्) विद्वानों के (पुरम्) आगे चलनेवाले (अमृतम्) अमर (हिरण्यम्) कमनीय तेज को (आबेधे) सब ओर से बाँधा था। (तस्मै) उस परमेश्वर को (दश) दस (प्राचीः) फैली हुई दिशाओं में (नमः) नमस्कार (कृणोमि) मैं करता हूँ। (त्रिवृत्) त्रिवृति [म० १, २] (अनु मन्यताम्) अनुकूल होवे [जिसे] (मे) अपने लिये (आबधे) मैं बाँधता हूँ ॥११॥
भावार्थ
जो अनादि, तेजोमय परमात्मा विद्वानों का मुक्तिदाता है, उसी को मनुष्य सब स्थान में साक्षात् करके (त्रिवृत् म० १, २) पुरुषार्थ आदि तीनों गुणों द्वारा आनन्द भोगे ॥११॥
टिप्पणी
११−(पुरम्) पुर अग्रगतौ−क। अग्रगम् (देवानाम्) विदुषाम् (अमृतम्) अमरम् (हिरण्यम्) कमनीयं तेजः (यः) (आबेधे) बध बन्धने लिट्। अहं समन्ताद् बबन्ध (प्रथमः) प्रख्यातः (देवः) प्रकाशमयः परमेश्वरः (अग्रे) पूर्वकाले (तस्मै) सर्वेश्वराय (नमः) सत्कारः (दश) (प्राचीः) अत्यन्तसंयोगे द्वितीया। विस्तीर्णा दिशाः (कृणोमि) करोमि (अनुमन्यताम्) अनुमतमनुकूलं भवतु (त्रिवृत्) म० २। त्रिवृतिः (आबधे) बध बन्धने−लट्। सम्यग्बध्नामि (मे) मह्यम्। आत्मने ॥
विषय
इन्द्रिय-संयम
पदार्थ
१. (देवानाम्) = देववृत्तिवाले व्यक्तियों का (पुरम्) = यह अग्र-गमन (हिरण्यम्) = हितरमणीय है ज्योतिर्मय है। यह (अमृतम्) = हमें नीरोग बनानेवाला है। (य:) = जो भी इस अग्र-गमन को आबेधे-अपने में बाँधता है, वह प्रथम:-प्रथम होता है-ब्रह्मा बनता है [ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव], (देव:) = देव होता है, (अग्ने) = आगे-और-आगे बढ़ता है। २. (तस्मै) = उस 'उग्न गतिवाले प्रथम देव' के लिए (नमः) = नमस्कार हो। मैं भी (दश) = दसों इन्द्रियों को (प्राची) = [प्र अञ्ब] अग्रगतिवाला (कृणोमि) = करता है। (त्रिवृत्) = 'हरित, अर्जुन [रजत] व अयस्' में विष्ठित इन्द्रिय-त्रिक के (आबधे) = समन्तात् बन्धन में, वशीकरण में में (अनुमन्यताम्) = मुझे अनुमति देनेवाला हो-मैं इन सब इन्द्रियों को वश में कर सकूँ।
भावार्थ
इन्द्रियों को वश में करके हम देवों की भाँति अग्रगतिवाले हों। उन देवों का हम आदर करें और स्वयं भी इन्द्रियों को संयत करनेवाले हों।
भाषार्थ
(हिरण्यम्) वीर्यरूपी हिरण्य को, जोकि (देवानाम् अमृतम् पुरम् ) दिव्यगुणों का अक्षय नगररूप है, उसे (यः) जो ( प्रथमः देवः ) प्रथम आयुवाला दिव्य ब्रह्मचारी, (अग्रे) अग्रिम अर्थात् प्राथमिक आयु में (आबेधे) बाँधता है, निजशरीर में दृढ़-बद्ध कर लेता है, ( तस्मै ) उसके लिए (नम:) नमस्कार, (दश प्राची:) १० आगे बढ़ी अंगुलियों को करके अर्थात् दोनों हाथ जोड़कर (त्रिवृत् कृणोमि ) तीन बार मैं करता हूँ; (त्रिवृत्) तीन लोकों में वर्तमान परमेश्वर (मे) मुझे (आवधे) इस हिरण्य अर्थात् वीर्य को, ब्रह्मचारी में दृढ़-बद्ध करने की (अनुमन्यताम् ) स्वीकृति प्रदान करे ।
टिप्पणी
[सुक्त २८ में, मन्त्रों में, त्रिवृत् पद का प्रयोग नाना स्थानों में, नाना अर्थों में हुआ है। मन्त्र ११ में भी उसका प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में हुआ है । यह इस सूक्त की रचना में वैशिष्ट्य है।]
विषय
दीर्घ जीवन का उपाय और यज्ञोपवीत की व्याख्या।
भावार्थ
(देवानां) देवगण, इन्द्रियों महद् आदि २१ विकारों का (पुरं) पालन पोषण एवं निवास का स्थान (अमृतम्) अमृत, शुक्र है। अथवा वह अमर पद है इसका दूसरा नाम (हिरण्यम्) ‘हिरण्य’ या परम ज्योति या आत्मा है (यः) जो (प्रथमः) सबसे प्रथम या सबसे श्रेष्ठ है, (देवः) जो परमप्रकाश स्वरूप है, सर्व विजयी है, (अग्रे) जो सबसे पूर्व (आ-वेधे) सबको नियमों में बांधता है, (तस्मै) उसी परम प्रभु को मैं (दश प्राचीः) दशों दिशाओं में उत्कृष्ट रूप में व्यापक जान कर (नमः कृणोमि) नमस्कार करता हूं। वह (त्रिवृत्) त्रि-मात्र ओंकार, त्रिगुण शक्तिमय, प्रभु (अनु मन्यताम्) मेरे विनय को स्वीकार करे, उसी को (मे) मैं अपने लिये (आबधे) यज्ञोपवीत रूप में त्रिसूत्र करके बांधता हूं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। त्रिवृत देवता। १-५, ८, ११ त्रिष्टुभः। ६ पञ्चपदा अतिशक्वरी। ७, ९, १०, १२ ककुम्मत्यनुष्टुप् परोष्णिक्। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Longevity and the Sacred thread
Meaning
That eternal and immortal Spirit of the universe wrapped in golden mystery is the seat of divinities which the prime cause of the universe, self-refulgent and self¬ manifest Brahman, brings into manifestation, first. To that Spirit omnipresent in all ten directions, I do homage. May the Spirit of three-matras, OM, graciously accept me as I bind myself to the discipline of the threefold sacred thread. Pray, bless me and my resolution.
Translation
This golden (thread) is the immortal stronghold of the enlightened ones. To that enlightened one, who fastened it in the beginning, I pay my homage joining all the ten fingers. May he approve this triple-fastening of mine.
Translation
This gold is the immortal castle of organs which the first divine power(God) bound on in the beginning. I saluting him(God) with ten folded fingers of my hands. My Lord Om who has three syllables accept it. I bind the triple thread for me.
Translation
I salute in ten vast directions the Illustrious God, who established intimes immemorial for the guidance of the learned, the immortal light of theVedas. May the three-threaded yajnopavit be blest, which I bind upon myself.
Footnote
‘Bind' means wear त्रिवृत may also mean Om, which consists of three letters, अ, उ, म्. I ever remember Om in my heart; may this grand name of God ever bless me with good fortune.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
११−(पुरम्) पुर अग्रगतौ−क। अग्रगम् (देवानाम्) विदुषाम् (अमृतम्) अमरम् (हिरण्यम्) कमनीयं तेजः (यः) (आबेधे) बध बन्धने लिट्। अहं समन्ताद् बबन्ध (प्रथमः) प्रख्यातः (देवः) प्रकाशमयः परमेश्वरः (अग्रे) पूर्वकाले (तस्मै) सर्वेश्वराय (नमः) सत्कारः (दश) (प्राचीः) अत्यन्तसंयोगे द्वितीया। विस्तीर्णा दिशाः (कृणोमि) करोमि (अनुमन्यताम्) अनुमतमनुकूलं भवतु (त्रिवृत्) म० २। त्रिवृतिः (आबधे) बध बन्धने−लट्। सम्यग्बध्नामि (मे) मह्यम्। आत्मने ॥
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