अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 7
ऋषिः - अथर्वा
देवता - अग्न्यादयः
छन्दः - पञ्चपदातिशक्वरी
सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
83
त्र्या॑यु॒षं ज॒मद॑ग्नेः क॒श्यप॑स्य त्र्यायु॒षम्। त्रे॒धामृत॑स्य॒ चक्ष॑णं॒ त्रीण्यायूं॑षि तेऽकरम् ॥
स्वर सहित पद पाठत्रि॒ऽआ॒यु॒षम् । ज॒मत्ऽअ॑ग्ने: । क॒श्यप॑स्य । त्रि॒ऽआ॒यु॒षम् । त्रे॒धा । अ॒मृत॑स्य । चक्ष॑णम् । त्रिणि॑ । आयूं॑षि । ते॒ । अ॒क॒र॒म् ॥२८.७॥
स्वर रहित मन्त्र
त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्। त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूंषि तेऽकरम् ॥
स्वर रहित पद पाठत्रिऽआयुषम् । जमत्ऽअग्ने: । कश्यपस्य । त्रिऽआयुषम् । त्रेधा । अमृतस्य । चक्षणम् । त्रिणि । आयूंषि । ते । अकरम् ॥२८.७॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रक्षा और ऐश्वर्य का उपदेश।
पदार्थ
(जमदग्नेः) प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी पुरुष के [अथवा, नेत्र अर्थात् नेत्र आदि इन्द्रियों के] (त्र्यायुषम्) तीन जीवनसाधन म० १। [अथवा, शुद्धि, बल और पराक्रमयुक्त तीन गुण आयु], और (कश्यपस्य) तत्त्वदर्शी ऋषि के [अथवा, ईश्वर की व्यवस्था से सिद्ध] (त्र्यायुषम्) बालकपन, यौवन और बुढ़ापा, तीन प्रकार की आयु [अथवा, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमों का सुखकारक तीन गुण आयु], (त्रेधा) तीन प्रकार से [अर्थात् विद्या, शिक्षा और परोपकार सहित तीन गुण आयु से] (अमृतस्य) अमरपन वा मोक्ष का (चक्षणम्) दर्शक होवे। [हे पुरुषार्थी ! वे ही] (त्रीणि) तीन (आयूंषि) जीवनसाधन (ते) तेरे लिये (अकरम्) मैंने किये हैं ॥७॥
भावार्थ
प्रतापी, दूरदर्शी मनुष्य तीन जीवनसाधन अर्थात् पुरुषार्थ, प्रबन्ध और कर्म को [म० १], तथा शारीरिक और आत्मिक बल से तीन पदार्थ अर्थात् अन्न, पुरुष, और गौ आदि पशुओं को [म० ३] प्राप्त करके परोपकार करते हुए सदा सुखी रहें ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है−अ० ३ म० ६२। कोष्ठ के भीतर महर्षि दयानन्द भाष्य का अर्थ है, उनका मत है−उस मन्त्र में [त्र्यायुषम्] चार बार होने से यह तात्पर्य है कि विद्वान् पुरुष तिगुणी अर्थात् तीन सौ वर्ष से अधिक चार सौ वर्ष पर्यन्त भी आयु भोग सकता है ॥
टिप्पणी
७−(त्र्यायुषम्) अचतुरविचतुरसुचतुर०। पा० ५।४।७७। इति त्रि+आयुस्−अच् समासान्तः समाहारे। त्रयाणामायुषां जीवनसाधनानां समाहारः−म० १। [अथवा, शुद्धिबलपराक्रमयुक्तं त्रिगुणमायुः] (जमदग्नेः) अ० २।३२।३। प्रज्वलिताग्नेरिव तेजस्विनः पुरुषस्य [अथवा, चक्षुषः=चक्षुरादीन्द्रियाणाम्] (कश्यपस्य) अ० २।३३।७। पश्यकस्य। तत्त्वदर्शिपुरुषस्य [अथवा, आदित्यस्येश्वरस्य व्यवस्थासिद्धम्] (त्र्यायुषम्) त्रयाणां बाल्ययौवनस्थाविराणामायुषां समाहारः [अथवा, ब्रह्मचर्यगृहस्थवानप्रस्थाश्रमसुखसंपादकं त्रिगुणमायुः] (त्रेधा) त्रिप्रकारेण [अथवा, विद्याशिक्षापरोपकारसहितेन त्रिगुणायुषा] (अमृतस्य) नास्ति मृतं मरणं यस्मात् तस्य। अमरणस्य मोक्षस्य (चक्षणम्) दर्शकम् (त्रीणि) (आयूंषि) जीवनसाधनानि−म० १ तथा ३ (ते) तुभ्यम् (अकरम्) अहं कृतवान् ॥
विषय
जमदग्नि व कश्यप का आयुष्य
पदार्थ
१. (जमदने: त्र्यायुषम्) = प्रज्वलित जाठराग्निवाले नीरोग जमदग्नि की त्रिगुणा [३०० वर्ष की] आयु होती है। (कश्य-पस्य) = [कश्य-ज्ञान, वीर्य] ज्ञान व वीर्य का रक्षण करनेवाले की भी (त्र्यायुषम्) = त्रिगुण आयु होती है। २. (त्रेधा) = तीन प्रकार से (अमृतस्य) = नीरोगता के साधन शरीरस्थ वीर्य का [मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्], (चक्षणम्) = दर्शन होता है। यह शरीर को नीरोग, मन को निर्मल व बुद्धि को दीप्त बनाता है। इसके द्वारा मैं [प्रभु] (ते) = तुझ जीव के लिए त्रीणि आयूंषि-सौ वर्ष के तौन जीवनों को-तीन सौ वर्ष के जीवन को (अकरम्) = करता हूँ।
भावार्थ
दीर्घजीवन के लिए आवश्यक है कि जाठराग्नि को मन्द न होने दिया जाए तथा वीर्य का रक्षण किया जाए। इस वीर्य-रक्षण का शरीर में त्रिविध परिणाम है-नीरोगता, निर्मलता और दीप्ति।
भाषार्थ
(जमदग्नेः) आँखों में चमकती ज्योतिवाले ब्रह्मचारी का (त्र्यायुषम्) तीन आयुधों का समूह, (कश्यपस्य) परमेश्वर के द्रष्टा का (त्र्यायुषम् ) तीन आयुधों का समूह, (अमृतस्य) अविनाशी परमेश्वर की ( त्रेधा) त्रिविध (चक्षणम्) कृपा दृष्टि और (त्रीणि) तीन (आयूंषि) आयुएँ (ते) तेरी (अकरम् ) मैंने नियत कर दी हैं।
टिप्पणी
[निर्वल रोगी के प्रति तीन धातुओं के प्रयोक्ता का कथन है। त्र्यायुष= सुखी कौमारावस्था, यौवनावस्था तथा वृद्धावस्था। कश्यपः =पश्यतीति । वर्ण व्यत्यास । त्रेधाचक्षण= शरीर की तीन अवस्थाओं में परमेश्वर की कृपादृष्टि। चक्षणम्= चष्टे पश्यतिकर्मा (निघं० ३।११)।]
विषय
दीर्घ जीवन का उपाय और यज्ञोपवीत की व्याख्या।
भावार्थ
(जमदग्नेः) प्रज्वलित है जाठर अग्नि जिसकी ऐसे निरोग पुरुष की (त्रि-आयुषम्) त्रिगुण आयु होती है। और (कश्यपस्य) कश्य = अमृत बिन्दु या ज्ञान या वीर्य का पान या पालन करने वाले परमनिष्ठ ब्रह्मचारी की भी (त्रि-आयुषम्) त्रिगुण आयु होती है। (अमृतस्य) अमृतस्वरूप वीर्य का (त्रेधा) तीन प्रकार का (चक्षाणं) साक्षात्कार होता है उनके बल पर मैं (ते) तुझ साधक के भी (त्रीणि) तीन (आयूंषि) आयुधों को (अकरम्) उत्पन्न करता हूं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। त्रिवृत देवता। १-५, ८, ११ त्रिष्टुभः। ६ पञ्चपदा अतिशक्वरी। ७, ९, १०, १२ ककुम्मत्यनुष्टुप् परोष्णिक्। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Longevity and the Sacred thread
Meaning
Triple and thrice brilliant is the life of Jamadagni, the man of fiery tempered vitality of Brahmacharya. Triple and thrice far reaching is the life of Kashyapa, the man of universal vision and wisdom. Threefold is the voice of the Lord of Immortality: “I have created and ordained triple threefold span of life for you”, life of knowledge, action and worship for three to four hundred years.
Translation
Men full of vital heat (jamdagneh); live three spans of life (trya-yusam); men of vision (kasyapasya); also live three spans of life. This is the three-fold taste (view) of immortality (amrtasya caksanam). I have made three span of life for you.
Translation
Let the heat of your body, O man! attain three lives (i.e. three hundred autumns), let your vitality attain three lives, the immortality has three visions and therefore I prepare you for three lives.
Translation
A healthy person with a good digestion lives for three hundred years. A Brahmchari who possesses knowledge and control over his passions lives forthree hundred years. Salvation is obtainable through three things. I grantthee, the worshipper and devotee, a life of three hundred years.
Footnote
I: God. Three things:-(1) Knowledge (2) Training (3) Self-abnegation.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
७−(त्र्यायुषम्) अचतुरविचतुरसुचतुर०। पा० ५।४।७७। इति त्रि+आयुस्−अच् समासान्तः समाहारे। त्रयाणामायुषां जीवनसाधनानां समाहारः−म० १। [अथवा, शुद्धिबलपराक्रमयुक्तं त्रिगुणमायुः] (जमदग्नेः) अ० २।३२।३। प्रज्वलिताग्नेरिव तेजस्विनः पुरुषस्य [अथवा, चक्षुषः=चक्षुरादीन्द्रियाणाम्] (कश्यपस्य) अ० २।३३।७। पश्यकस्य। तत्त्वदर्शिपुरुषस्य [अथवा, आदित्यस्येश्वरस्य व्यवस्थासिद्धम्] (त्र्यायुषम्) त्रयाणां बाल्ययौवनस्थाविराणामायुषां समाहारः [अथवा, ब्रह्मचर्यगृहस्थवानप्रस्थाश्रमसुखसंपादकं त्रिगुणमायुः] (त्रेधा) त्रिप्रकारेण [अथवा, विद्याशिक्षापरोपकारसहितेन त्रिगुणायुषा] (अमृतस्य) नास्ति मृतं मरणं यस्मात् तस्य। अमरणस्य मोक्षस्य (चक्षणम्) दर्शकम् (त्रीणि) (आयूंषि) जीवनसाधनानि−म० १ तथा ३ (ते) तुभ्यम् (अकरम्) अहं कृतवान् ॥
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