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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 28 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 28/ मन्त्र 13
    ऋषिः - अथर्वा देवता - अग्न्यादयः छन्दः - पुरउष्णिक् सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    34

    ऋ॒तुभि॑ष्ट्वार्त॒वैरायु॑षे॒ वर्च॑से त्वा। सं॑वत्स॒रस्य॒ तेज॑सा॒ तेन॒ संह॑नु कृण्मसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ऋ॒तुऽभि॑: । त्वा॒ । आ॒र्त॒वै: । आयु॑षे । वर्च॑से । त्वा॒। स॒म्ऽव॒त्स॒रस्य॑। तेज॑सा । तेन॑ । सम्ऽह॑नु । कृ॒ण्म॒सि॒ ॥२८.१३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ऋतुभिष्ट्वार्तवैरायुषे वर्चसे त्वा। संवत्सरस्य तेजसा तेन संहनु कृण्मसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ऋतुऽभि: । त्वा । आर्तवै: । आयुषे । वर्चसे । त्वा। सम्ऽवत्सरस्य। तेजसा । तेन । सम्ऽहनु । कृण्मसि ॥२८.१३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 28; मन्त्र » 13
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रक्षा और ऐश्वर्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (ऋतुभिः) ऋतुओं से (त्वा) तुझ परमेश्वर को, (आर्तवैः) ऋतुओं के विभागों से (त्वा) तुझ को और (संवत्सरस्य) सब के निवास देनेवाले सूर्य के (तेन) उस (तेजसा) तेज से (आयुषे) अपने जीवन के लिये और (वर्चसे) तेज के लिये (संहनु) संयुक्त (कृण्मसि) हम करते हैं ॥१३॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग ऋतु, मास आदि काल और सूर्य आदि रचनाओं के विचार से परमेश्वर की महिमा साक्षात् करते हैं ॥१३॥

    टिप्पणी

    १३−(ऋतुभिः) वसन्तादिकालविशेषैः (त्वा) ब्रह्म। परमेश्वरम् (आर्तवैः) ऋतुविभागैः (आयुषे) जीवनवर्धनाय (वर्चसे) तेजःप्राप्तये (त्वा) (संवत्सरस्य) अ० १।३५।४। सम्यग्निवासकस्य सूर्यस्य (तेजसा) प्रकाशेन (तेन) प्रसिद्धेन (संहनु) शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। इति हन हिंसागत्योः−उ। संगतम्। संयुक्तम् (कृण्मसि) कुर्मः ॥

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    विषय

    आयुषे वर्चसे

    पदार्थ

    १. (ऋतुभिः आर्तवै:) = ऋतुओं व ऋतुओं में होनेवाली वनस्पतियों द्वारा (त्वा) = तुझ-'अर्यमा, पूषा, बृहस्पति' [मन्त्र १२] को (आयुषे) = आयु के लिए तथा (वर्चसे) = वर्चस् [भास्वर शक्ति] के लिए (कृण्मसि) = करते हैं। २. संवत्सरस्य सम्पूर्ण वर्ष के तेन तेजसा उस तेज से-सम्पूर्ण वर्ष नीरोगता व तेजस्विता से (त्वा) = तुझे (संहनु) = संगत [हन् गती] करते हैं।

    भावार्थ

    समयानुसार उस-उस ऋतु में उत्पन्न होनेवाली वनस्पतियों के प्रयोग से हम दीर्घायु व वर्चस्वी हों, सम्पूर्ण वर्ष तेजस्वी व नीरोग बनें।

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    भाषार्थ

    (त्वा) तुझे (ऋतुभिः) ऋतुओं के द्वारा, (आर्तवै) ऋतुओं के अवयवरूप मासों या ऋतुओं के समूह द्वारा और (संवत्सरस्य तेन तेजसा) संवत्सर के उस तेज द्वारा (त्वा) तुझे (आयुषे) दीर्घ आयु के लिए, ( वर्चसे) और वर्चस् की प्राप्ति के लिए, (संहनु) मिले जबाड़ोंवाला अर्थात् मौनधारी (कृण्मसि) हम करते हैं। अभिप्राय यह कि एक वर्ष भर तू मौन रह, ताकि तू दीर्घायु तथा वर्चस् को प्राप्त कर सके। मौनधारी मुनि होते हैं। संहनु क्रियाविशेषण है 'कृण्मसि' का।

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    विषय

    दीर्घ जीवन का उपाय और यज्ञोपवीत की व्याख्या।

    भावार्थ

    हे पुरुष ! (ऋतुभिः) ऋतुओं से और (आर्त्तवैः) ऋतु के मास रूप भागों से जिस प्रकार यह प्रजापति का विशाल रूप बद्ध है उसी प्रकार इन ऋतुओं और ऋतु-भागों से (त्वा) तुझको, (आयुषे) दीर्घ जीवन और (वर्चसे) ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति के लिये, (सं-वत्सरस्य तेजसा) संवत्सर = वर्ष के प्रकाश के या सूर्य के समान सुवर्ण रूप तेज से (सं हनु) खूब मजबूत, दृढ (कृण्मसि) करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। त्रिवृत देवता। १-५, ८, ११ त्रिष्टुभः। ६ पञ्चपदा अतिशक्वरी। ७, ९, १०, १२ ककुम्मत्यनुष्टुप् परोष्णिक्। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Longevity and the Sacred thread

    Meaning

    For the light of life and a long age of health and refinement in accord with the seasons, with all gifts of the seasons, we strengthen you and temper you with that splendour of the yearly course of the sun which would make you inviolable against all injustice and opposition.

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    Translation

    With the seasons, with the parts of the seasons, and with the splendour of the whole year, we hereby unite you for long life and lustre.

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    Translation

    We unite you, O man 1 with seasons, with the months of the year and with that splendor sun for long life and vigor.

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    Translation

    O Brahmchari, we firmly unite thee, for vigour and extended life, withseasons, months, and all the splendor of the sun!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १३−(ऋतुभिः) वसन्तादिकालविशेषैः (त्वा) ब्रह्म। परमेश्वरम् (आर्तवैः) ऋतुविभागैः (आयुषे) जीवनवर्धनाय (वर्चसे) तेजःप्राप्तये (त्वा) (संवत्सरस्य) अ० १।३५।४। सम्यग्निवासकस्य सूर्यस्य (तेजसा) प्रकाशेन (तेन) प्रसिद्धेन (संहनु) शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। इति हन हिंसागत्योः−उ। संगतम्। संयुक्तम् (कृण्मसि) कुर्मः ॥

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