अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 26/ मन्त्र 4
इ॒दं विष्णु॒र्वि च॑क्रमे त्रे॒धा नि द॑धे प॒दा। समू॑ढमस्य पांसु॒रे ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒दम् । विष्णु॑: । वि । च॒क्र॒मे॒ । त्रे॒धा । नि । द॒धे॒ । प॒दा । सम्ऽऊ॑ढम् । अ॒स्य॒ । पां॒सु॒रे ॥२७.४॥
स्वर रहित मन्त्र
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदा। समूढमस्य पांसुरे ॥
स्वर रहित पद पाठइदम् । विष्णु: । वि । चक्रमे । त्रेधा । नि । दधे । पदा । सम्ऽऊढम् । अस्य । पांसुरे ॥२७.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
व्यापक ईश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(विष्णुः) विष्णु सर्वव्यापी भगवान् ने (समूढम्) आपस में एकत्र किये हुए वा यथावत् विचारने योग्य (इदम्) इस जगत् को (वि चक्रमे) पराक्रमयुक्त [शरीरवाला] किया है, उसने (अस्य) इस जगत् के (पदा) स्थिति और गति के कर्मों को (त्रेधा) तीन प्रकार (पांसुरे) परमाणुओंवाले अन्तरिक्ष में (नि दधे) स्थिर किया है ॥४॥
भावार्थ
परमेश्वर ने इस जगत् को परमाणुओं से रचकर उत्पत्ति, स्थिति प्रलय द्वारा पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यु लोक, अर्थात् नीचे, मध्यम और ऊँचे स्थानों में धारण किया है ॥४॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।२२।१७; यजु० ५।१५, और साम० पू० ३।३।९। और उ० ८।२।८। भगवान् यास्क ने निरु० १२।१८, १९ में भी इस मन्त्र की व्याख्या की है ॥
टिप्पणी
४−(इदम्) परिदृश्यमानं जगत् (विष्णुः) व्यापकः परमेश्वरः (वि चक्रमे) विक्रान्तं पराक्रमयुक्तं सशरीरं कृतवान् (त्रेधा) त्रिप्रकारम् (निदधे) नियमेन स्थापयामास (पदा) पद स्थैर्ये गतौ च-अच्। स्थितिगतिकर्माणि (समूढम्) सम्+वह प्रापणे, ऊह वितर्के वा-क्त राशीकृतम्। सम्यग् वितर्कणीयमनुमीयं जगत् (अस्य) जगतः (पांसुरे) नगपांसुपाण्डुभ्यश्चेति वक्तव्यम्। वा० पा० ५।२।१०७। इति पांसु-रो मत्वर्थे। पांसुभी रजोभिः परमाणुभिर्युक्तोऽन्तरिक्षे ॥
विषय
विष्णु के पांसुर में लोकत्रय की स्थिति
पदार्थ
१. (विष्णुः) = उस सर्वव्यापक प्रभु ने (इदं विचक्रमे) = इस विश्व को विक्रान्त किया। इसे नाना प्रकार से बनाकर वह इसमें व्याप्त हुआ और (त्रेधा) = तीन प्रकार से (पदा निदधे) = अपने पदों को स्थापित किया। इन लोको को बनाया, इनका धारण किया और अन्त में पन: अपने में इनका लय कर लिया। २. (अस्य) = इस व्यापक प्रभु के पांसुरे-[पांसुभिः रजोभिः परमाणुभिः युक्ते] प्रकृतिरूप एक चरण में [परमाणुओं से बनी हुई प्रकृति में] (समूढम्) = ये लोक-लोकान्तर धारण किये गये हैं।
भावार्थ
प्रभु 'इन लोकों की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय' रूप तीन कदमों को रखते हैं। यह सारा ब्रह्माण्ड प्रभु के एक प्रकृतिरूप चरण में निहित है [पादोऽस्य विश्वा भूतानि]।
भाषार्थ
(विष्णुः) सर्वव्यापक परमेश्वर ने (इदम्) यह ब्रह्माण्ड (विचक्रमे) विक्रान्त किया है (त्रेधा) उसने तीन प्रकार से (पदा) पादों को (निदधे) स्थापित किया है (अस्य) इसके तीन पाद (पांसुरे) मानो धूली वाली भूमि में (समूढम्) छिपे हुए हैं। समूढम्, पदम् = पदजातम्, अन्तर्हितम्, अज्ञातरूपम्।
टिप्पणी
[अभिप्राय यह कि विष्णु है तो तीनों लोकों में व्यापक परन्तु अस्मदादि सामान्य मनुष्यों को उसकी सत्ता का स्पष्ट भान नहीं होता, ऐसा ही भान होता है जैसे धूलिधूसरित पाद का। “ऋषि दयानन्दकृत यजुर्वेदभाष्य में उन्होंने "त्रेधा पदा" का भाव दर्शाया है, प्रथम प्रकाश वाले सूर्यादि, दूसरा प्रकाशरहित पृथिवी आदि, और जो तीसरा परमाणु आदि अदृश्य जगत् है उस सब को कारण से रचकर अन्तरिक्ष में स्थापन किया है" (५।१५)। समूढम् = मोहसमन्वितम्, अज्ञातरूपम्। मूढम्= मुह वैचित्ये (दिवादिः) + क्तः (भावे)]।
विषय
व्यापक प्रभु की स्तुति।
भावार्थ
(विष्णुः) व्यापक परमेश्वर ने (इदम्) यह समस्त जगत् (वि चक्रमे) नाना प्रकार से बनाया है और उसमें स्वयं व्याप्त हुआ है और उसने (त्रेधा) तीन प्रकार से (पदा) पदों, ज्ञानसाधनों या विशेष शक्तियों को (नि दधे) संसार में स्थापित किया है (अस्य) इस परमेश्वर का निज स्वरूप (सम्-ऊढम्) छिपा पड़ा है जिस प्रकार कि (पांसुरे) मट्टी में कोई वस्तु छिपी पड़ी रहती है।
टिप्पणी
(द्वि०) ‘पदम्’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मेधातिथिर्ऋषिः। विष्णुर्देवता। १ त्रिष्टुप्। २ त्रिपदा विराड् गायत्री। ३ त्र्यवसाना षट्पदा विराट् शक्करी। ४-७ गायत्र्यः। ८ त्रिष्टुप्। अष्टर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Omnipresent Vishnu
Meaning
Vishnu created the threefold universe of mind, motion and matter through three steps of evolution of Pradhana, subtle elements and gross materials, shaped the materials into threefold form of heaven, skies and earth, and set the form, the mystery that it is, into space and time.
Translation
The omnipresent and the all powerful God dominates over all the three regions, earth, mid-region and the celestial. His one step is rooted in the deep dark mystery, beyond the knowledge of mankind. (Also Rg. X.22.17)
Comments / Notes
MANTRA NO 7.27.4AS PER THE BOOK
Translation
The All-pervading Divinity strides His undertakings in this world. He has arranged all the things of the universe in three order—Cosmos, Vedas, the Knowledge and the speech. He real nature lies hidden in the vast space.
Translation
The All-pervading God has created this world, and has established His dignity in three ways. His invisible form is hidden in space.
Footnote
See Yajur, 5-15, Rig, 1-22-17. त्रेधा refers to Satva, Rajas and Tamas. It may also refer to a earth, air and sky. It may also refer to sun full of brightness to earth devoid of light, and minute atoms.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(इदम्) परिदृश्यमानं जगत् (विष्णुः) व्यापकः परमेश्वरः (वि चक्रमे) विक्रान्तं पराक्रमयुक्तं सशरीरं कृतवान् (त्रेधा) त्रिप्रकारम् (निदधे) नियमेन स्थापयामास (पदा) पद स्थैर्ये गतौ च-अच्। स्थितिगतिकर्माणि (समूढम्) सम्+वह प्रापणे, ऊह वितर्के वा-क्त राशीकृतम्। सम्यग् वितर्कणीयमनुमीयं जगत् (अस्य) जगतः (पांसुरे) नगपांसुपाण्डुभ्यश्चेति वक्तव्यम्। वा० पा० ५।२।१०७। इति पांसु-रो मत्वर्थे। पांसुभी रजोभिः परमाणुभिर्युक्तोऽन्तरिक्षे ॥
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