अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 22/ मन्त्र 6
इन्द्रा॑य॒ गाव॑ आ॒शिरं॑ दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑। यत्सी॑मुपह्व॒रे वि॒दत् ॥
स्वर सहित पद पाठइन्द्रा॑य । गाव॑: । आ॒ऽशिर॑म् । दु॒दु॒ह्रे । व॒ज्रिणे॑ । मधु॑ । यत् । सी॒म् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । वि॒दत् ॥२२.६॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु। यत्सीमुपह्वरे विदत् ॥
स्वर रहित पद पाठइन्द्राय । गाव: । आऽशिरम् । दुदुह्रे । वज्रिणे । मधु । यत् । सीम् । उपऽह्वरे । विदत् ॥२२.६॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 22; मन्त्र » 6
भाषार्थ -
(वज्रिणे इन्द्राय) न्यायवज्रधारी परमेश्वर के लिए, (गावः) स्तुतियाँ करनेवाले उपासकों ने (मधु) मधुर, (आशिरम्) तथा परिपक्व भक्तिरसरूपी-दुग्ध का (दुदुह्रे) दोहन किया है। (यत्) जिस भक्तिरस को उपासकों ने (उपह्वरे) पर्वतों की गुफाओं में अभ्यास द्वारा (विदत्) पाया है। (सीम्) और जो भक्तिरस उपासकों के जीवन में फैल गया है।
टिप्पणी -
[गावः=गौः=स्तोता (निघं০ ३.१६)। उपह्वरे=“उपह्वरे गिरीणाम्” (साम, प्र০ १, अर्ध प्र০ १, द০ ५, मं০ ९)।]