Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 186 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 186/ मन्त्र 10
    ऋषिः - अगस्त्यो मैत्रावरुणिः देवता - विश्वेदेवा: छन्दः - स्वराट्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    प्रो अ॒श्विना॒वव॑से कृणुध्वं॒ प्र पू॒षणं॒ स्वत॑वसो॒ हि सन्ति॑। अ॒द्वे॒षो विष्णु॒र्वात॑ ऋभु॒क्षा अच्छा॑ सु॒म्नाय॑ ववृतीय दे॒वान् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रो इति॑ । अ॒श्विनौ॑ । अव॑से । कृ॒णु॒ध्व॒म् । प्र । पू॒षण॑म् । स्वत॑वसः । हि । सन्ति॑ । अ॒द्वे॒षः । विष्णुः॑ । वातः॑ । ऋ॒भु॒क्षाः । अच्छ॑ । सु॒म्नाय॑ । व॒वृ॒ती॒य॒ । दे॒वान् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रो अश्विनाववसे कृणुध्वं प्र पूषणं स्वतवसो हि सन्ति। अद्वेषो विष्णुर्वात ऋभुक्षा अच्छा सुम्नाय ववृतीय देवान् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रो इति। अश्विनौ। अवसे। कृणुध्वम्। प्र। पूषणम्। स्वतवसः। हि। सन्ति। अद्वेषः। विष्णुः। वातः। ऋभुक्षाः। अच्छ। सुम्नाय। ववृतीय। देवान् ॥ १.१८६.१०

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 186; मन्त्र » 10
    अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 5; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथाध्यापकोपदेशकविषयमाह ।

    अन्वयः

    हे राजप्रजाजना यूयं ये हि स्वतवसोऽद्वेषो विद्वांसस्सन्ति तान् यावश्विनावध्यापकोपदेशकौ मुख्यौ परीक्षकौ स्तस्तौ विद्याया अवसे प्रकृणुध्वम्। यथा वातइव विष्णुर्ऋभुक्षा अहं सुम्नाय देवानच्छ ववृतीय तथा यूयं पूषणं प्रो कृणुध्वम् ॥ १० ॥

    पदार्थः

    (प्रो) प्रकर्षे (अश्विनौ) विद्याव्याप्ताऽध्यापकोपदेशकौ (अवसे) रक्षणादिने (कृणुध्वम्) (प्र) (पूषणम्) पोषकम् (स्वतवसः) स्वकीयं तवो बलं येषान्ते (हि) निश्चये (सन्ति) (अद्वेषः) द्वेषभावरहिताः (विष्णुः) व्यापकः (वातः) वायुः (ऋभुक्षाः) मेधावी (अच्छ) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (सुम्नाय) सुखाय (ववृतीय) वर्त्तेयम् (देवान्) विदुषः ॥ १० ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये रागद्वेषरहिता विद्याप्रचारप्रियाः पूर्णशरीरात्मबला धार्मिका विद्वांसः सन्ति तान् सर्वे विद्याप्रचाराय संस्थापयन्तु येन सुखं वर्द्धेत ॥ १० ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    अब अध्यापक और उपदेशकों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे राजा प्रजाजनो ! तुम जो (हि) ही (स्वतवसः) अपना बल रखनेवाले (अद्वेष) निर्वैर विद्वान् जन (सन्ति) हैं उनको जो (अश्विनौ) विद्याव्याप्त अध्यापक और उपदेशक मुख्य परीक्षक हैं वे विद्या की (अवसे) रक्षा, पढ़ाना, विचारना, उपदेश करना इत्यादि के लिये (प्र, कृणुध्वम्) अच्छे प्रकार नियत करें और जैसे (वातः) पवन के समान (विष्णुः) गुण व्याप्तिशील (ऋभुक्षाः) मेधावी मैं (सुम्नाय) सुख के लिये (देवान्) विद्वानों को (अच्छ, ववृतीय) अच्छा वर्त्ताऊँ वैसे तुम (पूषणम्) पुष्टि करनेवाले को (प्रो) उत्तमता से नियत करो ॥ १० ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो रागद्वेषरहित, विद्याप्रचार के प्रिय, पूरे शारीरिक-आत्मिक बलवाले धार्मिक विद्वान् हैं, उनको सब लोग विद्याप्रचार के लिये संस्थापन करें, जिससे सुख बढ़े ॥ १० ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    देवों का अभिमुखीकरण

    पदार्थ

    १. (अश्विनौ) = प्राणापान को (उ) = निश्चय से (अवसे) = रक्षण के लिए (प्रकृणुध्वम्) = खूब ही स्तवन करो। प्राण के सब भेदों का जहाँ विचार होता है वहाँ 'मरुतः ' शब्द का प्रयोग होता है। 'प्राण और अपान' का ही मुख्यरूप से संकेत होने पर 'अश्विनौ' शब्द प्रयुक्त होता है । इन प्राणापान का स्तवन यही है कि प्राण की अपान में आहुति दी जाए और अपान की प्राण में । इस प्रकार प्राणायाम करना ही प्राणस्तवन है। (पूषणम्) = पोषण की देवता का (प्र) = प्रकर्षण स्तवन करो । अङ्ग-प्रत्यङ्गों को पुष्ट करने का हम प्रयत्न करें। ऐसा करनेवाले व्यक्ति-प्राणापान व पूषा के स्तोता लोग (हि) = निश्चय से (स्वतवस:) = आत्मा के बलवाले सन्ति हैं, अर्थात् इनका आत्मिक बल बढ़ता है। २. (अद्वेषः) = यह स्तोता द्वेष से रहित होता है, (विष्णुः) = व्यापक मनोवृत्तिवाला होता है [विष् व्याप्तौ], (वातः) = वायु के समान सतत क्रियाशील होता है, (ऋभुक्षाः) = उस देदीप्यमान [उरु भाति] प्रभु में निवास करनेवाला होता है [क्षि निवासे] । ३. मैं भी (सुम्नाय) = सुखप्राप्ति के लिए (देवान् अच्छ ववृतीय) = सब देवों को अपनी ओर आवृत्त करनेवाला बनूँ। देवों को अपने अभिमुख करके ही मैं जीवन को सुखी बना पाता हूँ ।

    भावार्थ

    भावार्थ - हम प्राणापान की साधना करें और अङ्ग-प्रत्यङ्गों को पुष्ट करें। आत्मिक बलवाले होकर हम सब देवों को स्वाभिमुख करें। यही सुख प्राप्ति का मार्ग है। -

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    उत्तम विद्वान् अधिकारियों के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    हे राजा, प्रजा जनो ! आप सब लोग ( अश्विनौ ) राष्ट्र में व्यापक अधिकार वाले सभापति, सेनापति, राजा प्रजा, एवं उत्तम स्त्री पुरुषों को ( अवसे ) राष्ट्र के पालन आदि कार्यों के लिये (प्रो कृणुध्वम्) उत्साहित करें । (पूषणं) सब प्रजा को पोषण करने वाले राजा को और जो (स्वतवसः हि सन्ति) स्वयं बलशाली हैं और (अद्वेषः विष्णुः) द्वेष रहित व्यापक, बलवान् और पर्वतों व देश के प्रकोटों का स्वामी, (वातः) चायु के समान बलवान् (ऋभुक्षाः) ज्ञानवान् पुरुष इन सभी को (प्रो कृणुध्वं) आगे २, उत्तम पदों पर रखो। इन सब (देवान्) देव अर्थात् विद्वान् पुरुषों को मैं राष्ट्रपति (सुम्नाय) प्रजा के सुख की वृद्धि के लिये (अच्छा ववृतीय) राष्ट्र कार्य में लगाता हूं ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अगस्त्य ऋषिः॥ विश्वेदेवा देवताः॥ छन्दः– १, ८, ९ त्रिष्टुप्। २, ४ निचृत त्रिष्टुप्। ११ भुरिक त्रिष्टुप्। ३, ५, ७ भुरिक् पङ्क्तिः। ६ पङ्क्तिः। १० स्वराट् पङ्क्तिः। एकादशर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे रागद्वेष रहित, विद्याप्रचार प्रिय, पूर्ण शारीरिक आत्मिक बल असणारे धार्मिक विद्वान आहेत त्यांचे सर्व लोकांनी विद्याप्रचारासाठी संस्थापन करावे, ज्यामुळे सुख वाढावे. ॥ १० ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    All ye men and women of the world, for the sake of all round protection and advancement, take to, serve and honour the Ashvins, powers that give and take, teach and test. Take to, honour and value, and worship Pusha, agents of nourishment and growth. Self-potent are the divinities of nature and humanity, all free from hate and enmity, Vishnu, all-pervasive spirit of the universe, Vayu, universal breath of the living world, Rbhuksha, Indra, universal ruling lord of power, intelligence and expertise, and knowledge. Let us all, you and I, elect, select, choose, appoint, honour and consecrate our powers of humanity and divinity well for the sake of common good.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    About the teachers and preachers.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O officers of the State and the men representatives of the public! you should appoint highly renewed and enlightened teachers and preachers for to act as supervisors over the group of other learned men. They should hold independents powers (depending upon their inherent qualities, and not the persons who get job on mere recommendation and by flattery). The appointees should be free from bias and hatred. I am active and mighty like the wind, pervading in good virtues and possess great, pure and subtle intellect by God's grace. I deal with wise men reverentially for happiness. You should also likewise make appointment of promoters of noble causes and supporters of men committed to all-round progress and advancement of the State.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    NA

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those highly learned righteous persons who are blessed with perfect physical and spiritual powers are fond of propagating the acquired knowledge, and are free from all attachment and aversion should be appointed for the preaching work. Thus real happiness shall grow more and more.

    Foot Notes

    (अश्विनौ ) विद्याव्यापिनौ अध्यापकोपदेशकौ = Teachers and preachers! pervading (or experts in) all sciences. ( स्वतवसः) स्वकीयं तवः बलं येषां ते । तव इति बलनाम (N-G 2-9) = Those who possess their own inherent powers, not dependent upon others' recommendation, particularly based upon flattery etc. (विष्णु:) व्यापकः ( गुणेषु ) | सः यः स विष्णुर्यज्ञः । स यज्ञो असौ स आदित्यः ( Shatph. 14.1.1.6) यदह दीक्षते तद्विष्णुर्भवति (Shatph 3.2.1.17) = Pervading in good virtues. So the word विष्णु: permanently and primarily used for God, may also be used for a man who is full of splendor like the sun and who has taken initiation ( दीक्षा ) in truth etc. (ऋभुक्षा:) मेधावी | ऋभुरिति मेधावि नाम (N. G. 3.15) ऋभुक्षा इति महन्नाम ( N. G. 3.3 ) = A wise man possessing pure and subtle intellect or great genius.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top