ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 186/ मन्त्र 5
ऋषिः - अगस्त्यो मैत्रावरुणिः
देवता - विश्वेदेवा:
छन्दः - भुरिक्पङ्क्ति
स्वरः - पञ्चमः
उ॒त नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यो॒३॒॑ मय॑स्क॒: शिशुं॒ न पि॒प्युषी॑व वेति॒ सिन्धु॑:। येन॒ नपा॑तम॒पां जु॒नाम॑ मनो॒जुवो॒ वृष॑णो॒ यं वह॑न्ति ॥
स्वर सहित पद पाठउ॒त । नः॒ । अहिः॑ । बु॒ध्न्यः॑ । मयः॑ । क॒रिति॑ कः । शिशु॑म् । न । पि॒प्युषी॑ऽइव । वे॒ति॒ । सिन्धुः॑ । येन॑ । नपा॑तम् । अ॒पाम् । जु॒नाम॑ । म॒नः॒ऽजुवः॑ । वृष॑णः । यम् । वह॑न्ति ॥
स्वर रहित मन्त्र
उत नोऽहिर्बुध्न्यो३ मयस्क: शिशुं न पिप्युषीव वेति सिन्धु:। येन नपातमपां जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति ॥
स्वर रहित पद पाठउत। नः। अहिः। बुध्न्यः। मयः। करिति कः। शिशुम्। न। पिप्युषीऽइव। वेति। सिन्धुः। येन। नपातम्। अपाम्। जुनाम। मनःऽजुवः। वृषणः। यम्। वहन्ति ॥ १.१८६.५
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 186; मन्त्र » 5
अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 4; मन्त्र » 5
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अष्टक » 2; अध्याय » 5; वर्ग » 4; मन्त्र » 5
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनस्तमेव विषयमाह ।
अन्वयः
हे मनुष्या वयं येनाऽपां नपातं जुनाम मनोजुवो वृषणो यं वहन्ति स बुध्न्योऽहिः पिप्युषीव शिशुं न नोऽस्मान् वेति। उतापि सिन्धुर्मयः कः ॥ ५ ॥
पदार्थः
(उत) अपि (नः) अस्मान् (अहिः) व्याप्तिशीलो मेघः (बुध्न्यः) अन्तरिक्षस्थः (मयः) सुखम् (कः) (शिशुम्) बालकम् (न) इव (पिप्युषीइव) यथा वर्द्धयन्ती (वेति) व्याप्नोति (सिन्धुः) नदी (येन) (नपातम्) पातरहितम् (अपाम्) जलानाम् (जुनाम) बध्नीयाम (मनोजुवः) मनसो जूर्वेग इव वेगो येषान्ते विद्युदादयः (वृषणः) वृष्टिकर्त्तारः (यम्) (वहन्ति) प्राप्नुवन्ति ॥ ५ ॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः। यदि मेघो न स्यात्तर्हि मातृवत्प्राणिनः कः पालयेत् ? यदि सूर्यविद्युद्वायवो न स्युस्तर्ह्ये तं को धरेत् ? ॥ ५ ॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! हम लोग (येन) जिससे (अपाम्) जलों के (नपातम्) पतन को न प्राप्त पदार्थ को (जुनाम) बाँधें वा (मनोजुवः) मन के तुल्य वेग जिनका वे बिजुली आदि (वृषणः) वृष्टि करानेवाले (यम्) जिसको (वहन्ति) प्राप्त होते हैं वह (बुध्न्यः) अन्तरिक्षस्थ (अहिः) व्याप्तिशील मेघ (पिप्युषीव) बढ़ाती हुई वृद्धि देती उन्नति करती हुई स्त्री (शिशुम्) बालक को (न) जैसे वैसे (नः) हम लोगों को (वेति) व्याप्त होता (उत) और (सिन्धुः) नदी (मयः) सुख को (कः) करती है ॥ ५ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मेघ न हो तो माता के तुल्य प्राणियों की पालना कौन करे ? जो सूर्य, बिजुली और पवन न हों तो इस मेघ को कौन धारण करे ? ॥ ५ ॥
विषय
वह अक्षीण आधार -
पदार्थ
१. (उत) = और (नः) = हमारे लिए (अहिर्बुध्न्यः) = अहीन आधारवाला-जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कभी क्षीण न होनेवाला आधार है वह प्रभु (मयः कः) = सुख प्रदान करे। वस्तुतः वह (सिन्धुः) = ज्ञान व आनन्द का समुद्रभूत प्रभु (वेति इव) = उसी प्रकार प्राप्त होता ही है [इव एवार्थे] (न) = जैसे कि (शिशुम्) = एक बालक को (पिप्युषी) = उसका दूध से आप्यायन करनेवाली माता प्राप्त होती है। वे प्रभु हम सबकी माता हैं। वे प्रभु ही ज्ञानदुग्ध से हमारा आप्यायन करते हुए हमें सुखी करते हैं। २. वे प्रभु हमें सुखी करें (येन) = जिससे हम (अपाम्) = रेत: कणों के (नपातम्) = नष्ट न होने = देनेवाले शरीर को (जुनाम) = प्राप्त करते हैं [जुन्- to go] । प्रभु-स्मरण से वासना का विनाश होता है और हम शक्ति का रक्षण कर पाते हैं । ३. ये प्रभु वे हैं (यम्) = जिनको (मनोजुवः) = मन को प्रेरित करनेवाले, न कि मन से प्रेरित होनेवाले (वृषण:) = शक्तिशाली पुरुष (वहन्ति) = प्राप्त करते हैं । मन को स्वाधीन करके इष्ट-दिशा में ले-चलनेवाले लोग 'मनोजुव' हैं। इन्हें मन इधर-उधर भटकानेवाला नहीं होता। ये मन को प्रेरित करते हैं। प्रभु इनके लिए आनन्द प्रदान करते हैं ।
भावार्थ
भावार्थ - प्रभु हमारे न क्षीण होनेवाले आधार हैं। वे ही हमारा आप्यायन करते हैं । वे ही हमारी वासनाओं का विनाश करते हैं। चित्तवृत्ति का निरोध करके हम प्रभु को जीवन में धारण करें। -
विषय
उत्तम विद्वान् अधिकारियों के कर्त्तव्य ।
भावार्थ
(उत) और जिस प्रकार (पिप्युषी) दूध आदि से बढ़ाने वाली माता (शिशुं न) बालक के समीप आती है उसी प्रकार (सिन्धुः) वेग से बहने वाली जलधारा, नदी, प्रजागण, या लेटी हुई इसी भूमि को मानो तृप्त करने वाली होकर (वेति) आती है। और ( येन ) जिस मेघ के द्वारा (अपां) जलों के (नपातं) न गिरने देने वाले या व्यर्थ न बहने देने वाले, बन्ध, सेतु आदि को (जुनाम) जलों से भर कर प्राप्त हों उसका सेवन करते हैं अथवा (येन) जिसके वरस जाने पर (अपां मध्ये नपातम्) जलों से हमें न गिरने देने वाले नाव आदि को (जुनाम) जल में चलाते हैं और ( यं ) जिस मेघ को सर्वाश्रय (वृषणः) वृष्टि करने वाले बलवान् (मनोजुवः) मन के समान वेग वाले वायुगण (वहन्ति) आकाश में उड़ा ले जाते हैं वह (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में स्थित (अहिः) मेघ (नः) हमें (मयः कः) सुख प्रदान करें । इसी प्रकार ( बुध्न्यः) सब के परम मूल में स्थित (अहिः) वह अविनाशी, सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर (नः मयः कः) हमें सुखी करे। जो ( सिन्धुः ) सब को व्यवस्था में बांधने वाला, परमेश्वर (पिप्युषी इव शिशुं न) दूध पिलाने वाली माता के समान हम सुख की नींद सोने वाले बालकों को (वेति) सदा प्राप्त होता वा रक्षा करता है । (येन) जिसके बल से (अपां नपातम्) प्राणों को न गिरने देने वाले देह को, वा प्रजाओं को न गिराने वाले राजा को हम (जुनाम) अपने वश करते और (यं) जिसको (वृषणः) बलवान् (मनोजुवः) मन की गति से चलने वाले जीवगण या इन्द्रियगण आत्मा रूप से अपने ऊपर धारण करते हैं । इति चतुर्थों वर्गः ॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अगस्त्य ऋषिः॥ विश्वेदेवा देवताः॥ छन्दः– १, ८, ९ त्रिष्टुप्। २, ४ निचृत त्रिष्टुप्। ११ भुरिक त्रिष्टुप्। ३, ५, ७ भुरिक् पङ्क्तिः। ६ पङ्क्तिः। १० स्वराट् पङ्क्तिः। एकादशर्चं सूक्तम्॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. जर मेघ नसतील तर आईप्रमाणे प्राण्यांचे पालन कोण करील? जर सूर्य, विद्युत व वायू नसतील तर मेघांना कोण धारण करणार? ॥ ५ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
And let the cloud of the sky do us good. The river flows for us like the mother’s milk for the baby. Let us then control and bind the rain storm and the river flow, grand child of the spatial waters, which the lightning energies fast as mind bring to us, by which then we may produce and use heat and electric energy, child of earthly waters.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The clouds, sun, air and lightning are essentials.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O men ! the cloud in the firmament is accompanied by lightning, which is swift like the mind. It brings rains which may utilize properly and never wasting its water. It gives us happiness, like mother who develops her child growing in every way and it delights her. The river also gives happiness to us.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
NA
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
If there were no clouds, who would feed all beings like the mother? Had there been no sun, lightning and the wind, who would uphold it (the cloud) ?
Foot Notes
(अहि:) व्याप्तिशीलो मेघः । अहिरिति मेघनाम (N.G. 1-10) = Pervading the cloud. (बुध्न्यः) अन्तरिक्षस्थः । बुघ्नमन्तरिक्षं बद्धा अस्मिन् घृता आप इति ( N.T. 1C-4-44 ) = The cloud dwelling in the firmament. (पिप्युषीव) यथा वर्धयन्ती माता । पिप्युषी is from (ओ / प्यायी वृद्धौ भ्वा० ) = Like the mother who tries to make her child grow in every way. (सिन्धु:) नदी = River.
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